11 अगस्त 1966. अमेरिका की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी (Stanford University) में पढ़ रहे एक लड़के ने अभी पिछले महीने ही अपना 21वां जन्मदिन मनाया था. अगले छह महीने में वो ग्रेजुएट होने वाला था. लेकिन इस दिन आए एक फोन कॉल ने सबकुछ बदल कर रख दिया. फोन कॉल की दूसरी तरफ लड़के की मां थीं, जिन्होंने उसके पिता की मृत्यु की खबर सुनाई थी. उसे तुरंत वापस भारत लौटना था. भारत में उसे अपने पिता के डूबते कारोबार की जिम्मेदारी संभालनी थी.
Happy Birthday Azim Premji: आज अजीम प्रेमजी का जन्मदिन है, वे 77 साल के हो गए हैं. लेकिन अभी वे भी बेहद सक्रिय रहते हैं. उनका जन्म 24 जुलाई 1945 को हुआ था.
21 वर्षीय लड़का भारत लौटा, घाटे में डूबी पिता की कंपनी की कमान संभाली. फिर उसे सफलता के आसमान में चमकते सितारों के बीच स्थापित कर दिया. कई कारोबार में हाथ आजमाएं कुछ सफल हुए कुछ असफल, लेकिन एक आधुनिक बिजनेस ने उसे भारत के टॉप रईसों में शामिल करा दिया. आज वो दुनिया में अपने कारोबार के अलावा अपने परोपकार के लिए विख्यात है. नाम है अजीम हाशिम प्रेमजी (Azim Hashim Premji). दुनिया इन्हें आईटी बिजनेस के सम्राट अजीम प्रेम जी (Azim Premji) के नाम से जानती है, आज वो अपना 77वां जन्मदिन मना रहे हैं.
बर्मा से भारत आए थे अजीम प्रेमजी के पिता
दुनिया की प्रमुख आईटी कंपनियों में से एक विप्रो (Wipro) की शुरुआत उसी साल हुई थी, जिस वर्ष अजीम प्रेमजी का जन्म हुआ था. साल था 1945, जब बर्मा से आए अजीम प्रेमजी के पिता हुसैन हाशिम प्रेमजी को अपना वर्षों पुराना चावल के व्यापार को बंद करना पड़ा. इसके पीछे अंग्रेजी हुकूमत के कुछ नियम थे. बर्मा में उन्हें राइस किंग कहा जाता था, जिसे उन्होंने भारत में भी बरकरार रखा था. लेकिन अब चावल का व्यापार बंद करना पड़ा था. लिहाजा हाशिम प्रेमजी नए कारोबार की शुरुआत की कोशिश में जुट थे और अवसर की तलाश में थे.
इस दौरान वो मुंबई से करीब साढ़े तीन सौ किलोमीटर दूर अमलनेर पहुंचे. वहां वो वनस्पति तेल की एक छोटी मिल मालिक को दिए गए कर्ज के सिलसिले में मिलने गए थे. मिल मालिक कर्ज चुकने में असमर्थ था और उसने हाशिम प्रेमजी से कहा की कर्ज के बदले में वो तेल मिल को खरीद लें. यही वो अवसर था जिसकी तलाश हाशिम प्रेमजी जो थी. इसके बाद वो चावल के व्यापार से वनस्पति तेल के कारोबार में उतर गए.
1945 में शुरू हुआ तेल का कारोबार
अमलनेर में बिजनेस का फॉर्मेट में सरल था. इस इलाके के किसान बड़ी मात्रा में मूंगफली की खेती करते थे. उनकी उपजाई मूंगफली मिल द्वारा खरीदी जाती थी और उसे प्रोसेस कर उपभोक्ताओं को बेचा जाता था. हाशिम प्रेम जी ने मिल को खरीद लिया और नाम रखा वेस्टर्न इंडिया वेजिटेबल प्रोडक्ट लिमिटेड. 25 दिसंबर 1945 को कंपनी रजिस्टर्ड हुई. दो महीने के भीतर फरवरी 1946 में कंपनी की बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) में लिस्टिंग भी हो गई. कंपनी तो चल पड़ी, लेकिन इसका प्रदर्शन स्थिर नहीं रहा. साल 1950 में कंपनी को पहला शुद्ध घाटा हुआ. हालांकि दो साल बाद वो मुनाफे में जरूर लौटी. खैर, बात अब अजीम प्रेमजी की.
23 साल की उम्र में बने कंपनी के निदेशक
अजीम प्रेमजी जब 1963 में विदेश पढ़ने के लिए रवाना हुए, उस वक्त उनके बड़े भाई फारूख एम एच प्रेमजी वेस्टर्न इंडिया वेजिटेबल प्रोडक्ट लिमिटेड के बोर्ड में शामिल हो गए. बाद में 1965 में इस्तीफा देकर फारूख पाकिस्तान चले गए. पिता के निधन के बाद जब अजीम प्रेमजी ने वेस्टर्न इंडिया वेजिटेबल प्रोडक्ट लिमिटेड के काम को देखना समझना शुरू किया, उस वक्त कंपनी बड़े कर्ज में डूब चुकी थी. अजीम प्रेमजी इस कारोबार को शुरू करने की कोशिश में जुट गए. इसमें लंबा समय गुजर गया. इतने वक्त में प्रेम जी को एक बात समझ में आ गई थी कि मिल को चलाने के लिए योग्य और कुशल लोगों की जरूरत है.
साल 1968 में 23 वर्ष की उम्र में अजीम प्रेमजी वेस्टर्न इंडिया वेजिटेबल प्रोडक्ट लिमिटेड के प्रबंधक निदेशक बने. गुजरते समय के साथ अजीम प्रेमजी समझ गए कि मुंबई के घोगा स्ट्रीट स्थित हाशिम प्रेमजी हाउस के दफ्तर से मिल नहीं चलाई जा सकती. इसके लिए उन्हें मुंबई से 370 किलोमीटर दूर अमलनेर में ही रहना होगा. लिहाजा वो महीने में तीन बार अमलनेर जाने लगे और हर दौरे पर तीन दिन रुकते. मिल के कामकाज को देखते और समझते.
कारोबार ने पकड़ी रफ्तार
वेस्टर्न इंडिया वेजिटेबल प्रोडक्ट लिमिटेड कोई आधुनिक फैक्टरी नहीं थी. इसलिए शायद स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़कर लौटे युवा प्रेमजी के लिए शुरुआती साल फैक्टरी में बिताना कठिन रहा. प्रेमजी ने कारोबार को बढ़ाने के लिए एक ट्रेडिंग रूम की स्थापना की. इसके तहत तेल की बिक्री की जाने लगी. कारोबार ने रफ्तार पकड़ी, लेकिन प्रेम जी खुश नहीं थे. वो किसी और व्यवसाय की तरफ रुख करना चाहते थे. तेल के कारोबार में कच्चे माल की आपूर्ति कम थी. दूसरी ओर वनस्पति तेल के विकल्प के रूप में पाम ऑयल का आयात किया जाता था. आयात की मात्रा भी लाइसेंसों द्वारा प्रतिबंधित की जाती थी.
कंपनी का पहला विस्तार
प्रेमजी इस तरह की तमाम मुश्किलों से नाखुश थे. लेकिन तेल के कारोबार से ही कंपनी को राजस्व हासिल होता था. इसलिए इस बिजनेस को छोड़ना आसान नहीं था. लेकिन प्रेमजी कारोबार के विस्तार का मन बना चुके थे. वो वनस्पति तेल और साबुन बनाने के कारोबार से आगे बढ़ना चाहते थे. साल 1975 में वेस्टर्न इंडिया वेजिटेबल प्रोडक्ट लिमिटेड ने अपना पहला विस्तार किया. प्रेमजी ने भवन निर्माण उपकरणों के लिए हाइड्रोलिक कंपोनेंट्स बनाने के बिजनेस में कदम रखा. इसका नाम रखा गया फ्लूइड पावर. हालांकि ये तबतक शुरू नहीं हो पाया, जब तक 1976 तक कंपनी के नए व्यवसाय विंट्रोल इंजीनियरिंग ने अपना उत्पादन नहीं शुरू किया.
इस कारोबार में उन्हें सफलता हाथ लगी. अजीम प्रेमजी का पहला बड़ा विस्तार विप्रो इंफ्रास्ट्रक्चर इंजीनियरिंग 2019 में करीब आधा अरब डॉलर का हो गया था. ये हाइड्रोलिक्स, एयरोस्पेस और वाटर ट्रीटमेंट के क्षेत्र में औद्योगिक समाधान उपलब्ध कराता है. विंट्रोल इंजीनियरिंग के उड़ान भरते ही कंपनी स्कूटर बनाने पर विचार करने लगी. लेकिन स्कूटर बनाने के लिए पूंजी और आईटी बिजनेस में दिख रहे अवसर की वजह से कंपनी ने इस प्रोजेक्ट को छोड़ दिया.
आईबीएम ने समेटा भारत से कारोबार
जिस समय अजीम प्रेमजी आईटी बिजनेस की तरफ रुख करने की योजना बना रहे थे. उस वक्त देश में इमरजेंसी लगी हुई थी. इमरजेंसी खत्म होने के बाद बनी नई सरकार ने एक ऐसा फैसला किया, जिससे अमेरिकी आईटी कंपनी आईबीएम को भारत छोड़कर जाना पड़ा. दरअसल, 1977 में प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई की कैबिनेट में उद्योग मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस ने विदेशी कंपनियों को फेरा कानून का पालन करने को कहा. जॉर्ज ने सभी विदेशी कंपनियों को नोटिस थमा दिया. कंपनियों के लिए 1973 में हुए FERA संशोधन का पालन अनिवार्य बना दिया गया. बाकी कंपनियां तो तैयार हो गई. लेकिन IBM और कोका कोला इसके लिए तैयार नहीं हुए.
कंप्यूटर बिजनेस का मिला लाइसेंस
इसके तहत भारत में कारोबार करने के लिए विदेशी कंपनियों में बहुसंख्यक हिस्सेदारी भारतीय की होनी चाहिए थी या फिर कंपनी को अपनी तकनीक साझा करनी होती. इस फैसले के बाद आईबीएम और कोका कोला ने भारत से अपना कारोबार समेट लिया. अजीम प्रेमजी ने इसे अवसर की तरह देखा और कंप्यूटर के क्षेत्र में उतरने के लिए लाइसेंस के लिए अप्लाई कर दिया. साल 1979 के आखिर तक प्रेमजी की कंपनी को इसका लाइसेंस मिल गया. दशक के समाप्त होते होते वेस्टर्न इंडिया वेजिटेबल प्रोडक्ट लिमिटेड कंप्यूटर बनाने के बिजनेस में उतर गई. साल 1982 में कंपनी का नाम बदलकर विप्रो कर दिया गया.
अधिकारियों को दी खुली छूट
इसके बाद कंपनी ने तकनीक के जानकारों को अपने साथ जोड़ने की शुरुआत की. तब इलेक्ट्रॉनिक सिटी के रूप में बैंगलोर उभर रहा था. विप्रो यहां दाखिल हुई और इंडियन इंस्ट्यूट ऑफ साइंस के प्रोफेसर केजी राव को अपना सलाहकार नियुक्त किया. इस तरह विप्रो इंफोटेक का जन्म हुआ. अजीम प्रेमजी ने अधिकारियों को खुली छूट दी. कंपनी को अपने सिद्धांतों के अनुपरूप चलाया. वक्त के साथ विप्रो के सॉफ्टवेयर का काम उसके हार्डवेयर के काम से आगे निकल गया. विदेशों से काम मिलने लगे. अगले चार दशकों में विप्रो 10 अरब डॉलर से अधिक के राजस्व के साथ अलग अलग करोबार में उतरकर एक दिग्गज बिजनेस ग्रुप बनकर उभरी.
दोबारा शुरू की पढ़ाई
साल 1995 में अजीम प्रेमजी ने दोबारा से पढ़ाई शुरू की. उसी स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की, जहां से करीब 30 साल पहले पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी. प्रेमजी ने कंपनी की तकनीक और प्रोडक्ट को बेहतर करने पर ध्यान दिया. साल 2000 में विप्रो न्यू यॉर्क स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टेड हो गई और इसी साल खुला अजीम प्रेमजी फाउंडेशन. आज विप्रो का करोबार दुनिया के 110 देशों में फैला है. अजीम प्रेमजी विप्रो के चेयरमैन पद से रिटायर हो चुके हैं. 2019 में उनके बेटे रिशद प्रेमजी ने उनकी जगह ली. हालांकि, अजीम प्रेमजी 2024 तक विप्रो में गैर कार्यकारी निदेशक बने रहेंगे. जुलाई 2021 तक उनकी अनुमानित कुल संपत्ति 32.5 बिलियन डॉलर थी.
दान किए अपने शेयर
अजीम प्रेमजी ने अपना सारा कारोबार अपने बेटे को सौंप दिया है. 2019 में अजीम प्रेमजी ने 52,750 करोड़ रुपये के अपने शेयर अजीम प्रेमजी फाउंडेशन को दान कर दिया था. ये पैसा गरीबो के कल्याण और धर्माध कार्यों में लगाया जाएगा. वो देश के सबसे बड़े दानदातओं में से एक हैं. फाउंडेशन के अनुसार, 2019 में प्रेमजी द्वारा परोपकार कार्य के लिए दान की गई कुल रकम 145,000 करोड़ रुपये (21 अरब डॉलर) हो गई थी. ये विप्रो लिमिटेड के आर्थिक स्वामित्व का 67 फीसदी है.
मां से मिली सेवा करने की प्रेरणा
कहा जाता है कि गरीबों की सेवा करने की प्रेरणा अजीम प्रेमजी को अपनी मां से मिली है. जब वो बड़े हो रहे थे, तो उन्होंने अलमनेर की बजाय अपनी डॉक्टर मां के साथ मुंबई के चिल्ड्रन ऑर्थोपेडिक अस्पताल में अधिक समय बिताया. उनकी मां यहां स्वैच्छिक सेवाएं देती थीं. इसी अस्पताल में प्रेमजी ने दूसरों की देखभाल करने के अपने शुरुआती सबक सीखे.
प्रेमजी को 30 वर्षों से अधिक समय से जानने वाले एन वाघुल कहते हैं कि उनपर अपनी मां का गहरा असर है. खासकर परोपकार के मामले में. प्रेमजी की मां गुलबानू प्रेमजी एक प्रशिक्षित बाल रोग विशेषज्ञ थीं. उन्होंने बच्चों के लिए अस्पताल निर्माण और विकास के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया. युवा प्रेमजी अक्सर अपनी मां के साथ अस्पताल जाते थे. असुखद वातावरण और बच्चों की पीड़ा के बीच वो अपने भीतर दयालुता को समेटते जा रहे थे, जो साल 2000 में अजीम प्रेमजी फाउंडेशन रूप में फलीभूत हुए.
मुंबई से स्टैनफोर्ड और फिर पढ़ाई अधूरी छोड़कर वापस छोटे से शहर अमलनेर में पिता के कारोबार को संभालना. कॉलेज से निकले एक युवा के मन में शायद ये ख्याल कभी ना कभी तो जरूर ही आया होगा कि आखिर भाग्य ने उसे कहां ला पटका. लेकिन शायद उनका दृढ़ संकल्प ही था, जिसने वेस्टर्न इंडिया वेजिटेबल प्रोडक्ट को विप्रो के रूप में अरबों डॉलर का पावर हाउस बिजनेस खड़ा कर दिया.
लाइट और पंखे बंद करते हैं प्रेमजी
अजीम प्रेमजी पैसे खर्च करने के मामले में सतर्क रहते हैं. एक ऐसे व्यक्ति के लिए धन का वास्तव में क्या अर्थ है, जो सभी लोगों के दफ्तर से जाने के बाद लाइट और पंखे बंद करने के लिए पूरी कंपनी में जाना जाता है. जिसने अमेरिका की यात्रा पर अपने सहयोगियों को एक स्थानीय बर्गर किंग में 10 डॉलर में तीन लोगों के लिए भोजन का प्रबंध करने पर उनकी तारीफ की हो.
अधिकारी को दी सलाह
'अजीम प्रेमजी एक विराट व्यक्तिव' नाम की किताब में एक घटना का जिक्र है. कुछ साल पुरानी बात है. विप्रो ने अपने इंटरनेशनल कस्टमर्स की मेजबानी में डिनर रखा था. प्रेमजी उसकी व्यवस्था को देखने गए. शाम के आयोजन के लिए नियुक्त एक अधिकारी ने उन्हें आश्वस्त किया कि सबकुछ व्यवस्थित तरीके से चल रहा है. खाना बेंगलुरु के फाइव स्टार होटल ताज से मंगाया गया है. प्रेमजी ने सहमती में अपना सिर हिला दिया. लेकिन जब वो वहां से जाने लगे थे उस अधिकारी से कहा कि अगर हमारे कैफेटेरिया का खाना हमारे लोगों के लिए अच्छा है, तो यह किसी और के लिए भी अच्छा होना चाहिए. कुछ ऐसे स्वभाव के हैं अजीम हाशिम प्रेमजी. वो कहते हैं ये धन तो लोगों का है हम तो इसके ट्रस्टी मात्र हैं.