भारत और फ्रांस ने आपसी रणनीतिक संबंधों का विस्तार करते हुए रक्षा, परमाणु ऊर्जा, सुरक्षा और गोपनीय सूचनाओं के संरक्षण सहित प्रमुख क्षेत्रों में14 समझौतों पर हस्ताक्षर किए. इसके साथ ही दोनों देशों ने भारत- प्रशांत क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने का भी संकल्प लिया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि दोनों देशों के बीच आपसी सहयोग अब' जमीन से आसमान' तक पहुंच चुका है. वहीं राष्ट्रपति मैक्रों ने समुद्री सुरक्षा पर दावा किया कि हिंद महासागर और प्रशांत क्षेत्र में शांति और स्थिरता के लिए दोनों देशों के बीच सहयोग का स्तर "अभूतपूर्व " होगा. दोनों देशों के बीच इस विस्तृत मुलाकात और समझौतों से साफ है कि फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों का पहला भारत दौरा दोनों देशों के आपसी सहयोग की नई स्क्रिप्ट लिखने के लिए तैयार है.
भारत-फ्रांस रिश्तों पर क्या कहा मोदी और मैक्रों ने
मोदी ने मैक्रों के साथ ज्वाइंट मीडिया ब्रीफिंग में कहा, " हमारा रक्षा सहयोग बहुत मजबूत है और हम फ्रांस को सबसे भरोसेमंद रक्षा सहयोगियों के रूप में देखते हैं. उन्होंने कहा कि हमारी सेनाओं के बीच पारस्परिक लॉजिस्टिक सहयोग पर हुआ समझौता रक्षा संबंधों में एक" स्वर्णिम कदम" है.
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मैक्रों ने भी ज्वाइंट ब्रीफिंग के दौरान कहा, ‘‘हम यहां भारत को अपना पहला रणनीतिक साझेदार बनाना चाहते हैं और हम यूरोप में ही नहीं बल्कि पश्चिमी दुनिया में भारत के पहले रणनीतिक भागीदार बनना चाहते हैं.’’ मैक्रों ने कहा "हिन्द्र महासागर और भारत-प्रशांत क्षेत्र में शांति और स्थिरता सुनिश्चित करने के मामले में दोनों देशों के बीच सहयोग का स्तर ‘‘अप्रत्याशित’’ होगा."
यूरोप की राजनीति के केन्द्र में मैक्रों
इमैनुएल मैक्रों ने मई 2017 में फ्रांस की सत्ता संभालने के बाद देश में बड़े आर्थिक सुधारों का रुख करने का साफ संकेत दिया है. यूरोप की राजनीति में मैक्रों को एक मजबूत और दबंग नेता के तौर पर देखा जा रहा है. वहीं ब्रेक्जिट और जर्मनी में एंजेला मर्केल की स्थिति कमजोर होने के बाद माना जा रहा है कि मैक्रों यूरोप के सबसे महत्वपूर्ण खिलाड़ी बनने जा रहे हैं. इसके चलते भी मैक्रों का यह भारत दौरा बेहद अहम माना जा रहा है.
ट्रंप की नीतियों का असर
यूरोप विश्व युद्ध के बाद से अमेरिका की आर्थिक और सामरिक नीतियों के प्रभाव में रहने वाला क्षेत्र बना रहा है. लेकिन मौजूदा समय में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की विध्वंसकारी नीतियों से यूरोप के सामने अपने आर्थिक और सामरिक हितों की रक्षा खुद करने की कड़ी चुनौती है. एक तरफ जहां डोनाल्ड ट्रंप ने चीन के खिलाफ ट्रेड वॉर का ऐलान करके यूरोप को सकते में डाल दिया है वहीं चीन की वन बेल्ट वन रोड परियोजना यूरोप के लिए भविष्य का खतरा बन कर खड़ा हो रहा है. ऐसी स्थिति में जहां पूरे यूरोप को चीन से मुकाबला करने के लिए मैक्रों के नेतृत्व का एक मात्र विकल्प दिखाई दे रहा है वहीं भारत के लिए भी यूरोप की यह स्थिति अपनी आर्थिक और सामरिक नीति को मजबूत करने का बेहतर मौका है.
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हिंद महासागर में मजबूत होगा भारत
मौक्रों की इस भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों ने नेविगेशन, विमानों की उड़ान में स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के वास्ते सहयोग को मजबूत करने पर सहमति दर्ज कराई है. दरअसल दोनों देशों का मानना है कि हिंद महासागर क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को बनाए रखने में यह समझौते बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा. फ्रांस से भारतीय नौसेना के लिए स्कॉर्पीन पनडुब्बी परियोजना और वायुसेना के लिये लड़ाकू जेट सौदे दोनों देशों के बीच रक्षाक्षेत्र के सहयोग में "नये महत्व" वाला माना जा रहा है. गौरतलब है कि भारत ने 2016 में फ्रांस से 58,000 करोड़ रुपये की लागत से 36 राफेल लड़ाकू विमानों खरीदने के लिये सौदा किया था. डिफेंस मैन्यूफैक्चरिंग में मेक इन इंडिया के लिए इस समझौते को बेहद खास मानने के साथ-साथ भारत की रक्षों जरूरतों में इस डील को गेमचेंजर भी माना जा रहा है.