विदेशों से आने वाले खाद्य पदार्थ की रैंडम और रिस्क के आधार पर जांच की जाएगी. माना जा रहा है कि इम्पोर्ट किये जाने वाले सरे खाद्य पदार्थ लैब में ले बच सकते हैं. दूसरे तमाम देशों में लैब की लम्बी लाइनो से खाद्य पदार्थो को बचाया जाता है. सूत्रों का कहना है कि पीएमओ और कैबिनेट सचिव ने इस मामले से जुड़े विभागों और मंत्रालयों से यह बात कही है.
कानूनी दांवपेच?
कस्टम विभाग के अधिकारी का कहना है कि हर कंसाइनमेंट की जांच इक पेचीदा और लम्बी प्रक्रिया है और इसे खत्म करने की जरूरत है. उन्होंने बताया कि स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस बारे में कानून मंत्रालय की राय मांगी है. यह कदम इसलिए उठाया गया है ताकि बंदरगाहों पर विदेश से आये खाद्य पदार्थो को क्लीयरेंस देने में देरी न हो. यह सरकार की 'ईज ऑफ डुइंग बिजनेस' की कोशिशों को और मजबूत करने को लेकर बड़ा कदम है. गौरतलब रहे कि क्लियरेंस मिलने तक स्विस चॉकलेट्स और ईरान के खजूर समेत दुनिया के कई पॉपुलर फूड ब्रांड्स भारतीय बंदरगाहों पर कई दिनों तक बेमतलब ढेर लगाये रहते है.
केंद्रीय उत्पाद एवं सीमा शुल्क बोर्ड (CBEC) भी चाहता है कि FSSAI, ड्रग कंट्रोलर ऑफ इंडिया और दूसरी एजेंसियों की जांच की समय सीमा तय की जाए.
ईज ऑफ डुइंग बिजनेस की तरफ बढे कदम?
मोदी गुजरात की तर्ज पर देश में बिज़नेस के लिए जबरदस्त माहौल तैयार करना चाहते है. 'मेक इन इंडिया' से लेकर सिंगल विंडो सिस्टम के लिए सरकार आपने आपको पूरी तरह से प्रतिबद्ध बताती है. ऐसे में विभागों को साफ़ निर्देश है कि वो व्यापार के नियमों को ज्यादा से ज्यादा सुगम बनाये. भारत में ये पहली बार होगा कि सिंगल विंडो सिस्टम की तर्ज पर 'कार्गो क्लीयरेंस'का एक सिस्टम बनेगा.
मोदी सरकार ईज ऑफ डुइंग बिजनेस में देश की रैंकिंग को सुधार कर दुनिया में भारत के पक्ष में माहौल बनाना चाहती है. पर इंडस्ट्री के लोग अभी भी खुश नहीं है. वो सभी 100 फीसदी फिजिकल टेस्टिंग को खत्म करने की भी मांग कर रहे है.