
देश में गरीब परिवारों को चूल्हे के धुएं से आजादी दिलाने वाली बड़ी स्कीम उज्ज्वला योजना के दूसरे हिस्से (ujjwala yojana 2.0) की मंगलवार को पीएम मोदी ने शुरुआत की है. लेकिन क्या मुफ्त में सिलेंडर पाने के बाद दोबारा महंगी गैस भराने का पैसा जनता के पास होता है? पहली स्कीम में सिलेंडर हासिल करने वाली बहुत-सी महिलाओं के चौके में फिर क्यों धुएं वाले चूल्हे की एंट्री हो गई है?
पांच साल पहले उज्ज्वला योजना की शुरुआत यूपी में विधानसभा चुनावों से पहले हुई थी. ऐसी योजना जो गरीब महिलाओं को लकड़ी-कंडे-उपले के धुएं में खाना बनाने से बचाने की आजादी देती है. लेकिन प्रधानमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्ट में शामिल उज्ज्वला योजना पार्ट-2 जब फिर उत्तर प्रदेश में आगे आने वाले चुनावों से पहले शुरु की जाती है. तो एक पक्ष ये भी है कि अच्छी योजना में महंगाई रुला रही है. मुफ्त का सिलेंडर पाकर भी दोबारा चूल्हे के धुएं ने एंट्री कर ली है.
महिलाओं को चूल्हे के धुएं से आजादी दिलाने के लिए प्रधानमंत्री ने उज्जवला योजना की शुरुआत उत्तर प्रदेश के बलिया से की थी. पहले पांच करोड़ घरों को चूल्हे से आजादी देने का लक्ष्य और फिर 8 करोड़ घरों में उज्ज्वला का सिलेंडर पहुंचाने का टारगेट सरकार ने तय वक्त से पहले पूरा किया.
प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना 2.0 की शुरुआत
उज्ज्वला योजना के 5 साल बाद अब दोबारा उत्तर प्रदेश में ही महोबा से गरीब महिलाओं को मुफ्त सिलेंडर देने वाली प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के दूसरे हिस्से की शुरुआत की गई.
इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि साल 2014 में जितने गैस कनेक्शन थे, उससे ज्यादा पिछले वर्षों में दिए गए. यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा कि पीएम मोदी की वजह से 50 करोड़ लोग अपने जीवन को नई दिशा दे रहे हैं.
महोबा जहां से उज्ज्वला योजना का दूसरा हिस्सा शुरु हो रहा है और बलिया जहां से देश में उज्ज्वला योजना की सबसे पहले शुरुआत हुई, वहां से लेकर पश्चिमी यूपी में एटा और फिरोजाबाद तक आजतक ने इस बात को सरकारों के लिए ही पता किया है कि आखिर एक अच्छी योजना में सब तक सिलेंडर पहुंचाकर भी क्यों धुएं से मुक्ति नहीं दिला पा रही है.
क्यों नहीं भरवा रहे सिलेंडर
उत्तर प्रदेश के एटा में एक महिला राधा देवी का ही उदाहरण लीजिए. घर में आठ सदस्य हैं. बाहर उज्ज्वला योजना का सिलेंडर खड़ा कहें या कहें कि पड़ा हुआ नजर आता है और दोबारा फेफड़े धुएं के कब्जे में हैं. तो इसका कारण क्या है ? क्या सिलेंडर की महंगाई ने फुंकनी से परेशानी की आग को भड़काया है ?
राधा देवी ने कहा, 'महीना दो महीना भरवा सके फिर तेज हो गया. जब तक सस्ता रहा तब तक भरवाया फिर महंगा हो गया तो नहीं भरवाया. पिछले 1 साल से नहीं भरवा पा रहे.'
एटा की ही शकुंतला देवी के घर में चूल्हा उज्ज्वला योजना का बाहर है, सिलेंडर बाहर है. धुआं घर के औऱ शरीर के भीतर जा रहा है. इनके घर में भी उज्ज्वला के सिलेंडर को किनारे करने की वजह महंगाई की वो आग है जहां आर्थिक कमजोरी की ज्वलनशीलता सबसे पहले गरीब के घर को पकड़ती है. उज्ज्वला योजना की लाभार्थी शकुंतला देवी ने कहा, 'कई महीने हो गए गैस भराया नहीं है, बच्चों की पढ़ाई कराएं या साग सब्जी लाएं, कहां से पैसे लाएंगे.'
कितना महंगा हुआ सिलेंडर
तो पहला सवाल सिलेंडर कितना महंगा हुआ है कि पहली योजना के लाभार्थी ही सिलेंडर भरा नहीं पा रहे, जबकि इस अच्छी योजना का पार्ट-2 शुरु हो चुका है. 1 मई 2020 को 581 रुपए का मिलने वाला गैस सिलेंडर 1 जून 2021 को 800 रुपए के पार हो चुका है. यानी एक साल के भीतर 220 रुपए की महंगाई.
सिलेंडर की इसी महंगाई के कारण फिरोजाबाद में श्रीमती देवी के घर में भी उज्ज्वला का सिलेंडर उदास किनारे खड़ा दिखता है और घर के भीतर खरीदकर लाए गए कंडे उपले, लकड़ी का ढेर नजर आता है. सिलेंडर बाहर हैं उज्ज्वला वाले और धुएं वाला चूल्हा रिटर्न कर चुका है घर के भीतर. क्या चाय में उबाल की तरह महंगाई के उबाल ने उज्ज्वला योजना को धुएं में गुम किया है ? उज्ज्वला योजना की लाभार्थी श्रीमती देवी ने कहा, '1000 रुपए या 900 रुपए का गैस भराएंगे तो कहां से खाएंगे, लकड़ी मंदी है, तीन महीना चल जाता है.'
देश में 5 साल के भीतर 8 करोड़ गरीब परिवारों को उज्ज्वला योजना का सिलेंडर दिया गया है. लेकिन क्या वो सभी परिवार एक महीने के सिलेंडर की कीमत में तीन महीने की लकड़ी खरीदना अपने आर्थिक हालात के कारण चुन रहे हैं और धुएं में ही खाना बना रहे हैं? शायद इसलिए क्योंकि 2018 के NSSO सर्वे के मुताबिक 20 फीसदी गरीब परिवारों की औसत आय 1065 रुपए मासिक है.
गैस रिफिल कराने नहीं आ रहे लोग
भले देश में 8 करोड़ लोगों के पास उज्ज्वला का सिलेंडर पहुंच गया हो लेकिन पेट्रोलियम मंत्रालय का ही आंकड़ा बताता है कि 2019-20 में 1,32,67,343 (एक करोड़ 32 लाख 67 हजार 343) महिलाएं एक बार ही दोबारा सिलेंडर भराने आईं, जबकि एक करोड़ 9 लाख 29 हजार 440 लोगों ने ही कम से कम दो रीफील कराया. सिलेंडर मिलने के बाद कम से कम तीन बार साल में गैस भराने वालों की संख्या और घटकर 82 लाख 24 हजार 227 हो गई.
यानी जितने लोगों तक उज्ज्वला का सिलेंडर पहुंच रहा है, उतने लोग देश में दूसरे आम परिवारों की तरह सिलेंडर दोबारा भराने का खर्चा नहीं उठा पा रहे हैं. सिलेंडर के बढ़े हुए दामों ने उज्ज्वला को उदास कर दिया है. आखिर महीने के 1000 रुपए से 5000 रुपए तक कमाने वाला गरीब आदमी अपनी कमाई का 20 फीसदी से अधिक का खर्च कैसे सिर्फ सिलेंडर भराने में कर दे ?
प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना एक ऐसी स्कीम है जिसमें हमेशा लक्ष्य को तय वक्त से पहले हासिल किया गया और इसके फायदे भी देखे गए. रिसर्च बताते हैं कि अस्थमा के 90 फीसदी मरीज चूल्हे में लकड़ी-कंडे के धुएं से ही प्रभावित होते रहते थे. बाद में एक सवाल के जवाब में खुद पेट्रोलियम मंत्री ने 2019 में बताया था कि उज्ज्वला योजना लागू होने के बाद छाती की बीमारी के मामलों में 20 फीसदी तक कमी आई है.
एक रिपोर्ट के आधार पर ये भी बताया गया कि सांस संबंधी 25 फीसदी बीमारियों में कमी तब आई, जब उज्ज्वला योजना के सिलेंडर करोड़ों महिलाओं तक पहुंचे. लेकिन उसी योजना का दूसरा हिस्सा जहां से शुरु हुआ, वहीं की जनता सिलेंडर पाकर भी उदास मिलती है. जिस वक्त उत्तर प्रदेश के महोबा से प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के दूसरे हिस्से का शुभारंभ हो रहा था तब भी उसी महोबा में एक गरीब बुजुर्ग मां की आंखें चूल्हे के धुएं में धुंधली होती जा रही थीं. कारण महंगाई और सिलेंडर भराने पर गरीबों को मिलने वाली सब्सिडी की छूट अब ना के बराबर हो जाना.
उज्ज्वला की एक लाभार्थी के पति अशोक ने बताया, 'सिलेंडर भराएं कि घर चलाएं. चूल्हा जलाते हैं, सब्सिडी नहीं मिलती, कुछ दिन आई, अब नहीं मिल रही.'
नहीं मिल रही सब्सिडी!
अप्रैल 2020 तक उज्ज्वला गैस का सिलेंडर भराने पर गरीबों को वापस 162 रुपए की सब्सिडी मिलती थी. लेकिन मई 2020 में जब एलपीजी गैस सिलेंडर की कीमत करीब 600 रुपए तक आ गई तो सब्सिडी लगभग जीरो कर दी गई. अब दोबारा सिलेंडर के दाम तो 800 रुपए के पार चले गए लेकिन सरकार की तरफ से मिलने वाली सब्सिडी पूरी तरह बहाल नहीं हुई.
यूपी सरकार के मंत्री और महोबा जिले के प्रभारी जी एस प्रकाश कहते हैं, 'ये एक अलग विषय है, महंगाई सिलेंडर पर है, उसके कई कारण हैं, मैं यहां वर्णन नहीं करूंगा, सिलेंडर मिला ये बहुत बड़ी बात है.'
सिलेंडर देना वाकई बड़ी बात है, लेकिन अगर गैस भराने की क्षमता नागरिकों की नहीं रहेगी तो ये एक अच्छी योजना का बंटाधार करना कहलाएगा. जनता के पैसे से शुरू की गई स्कीम में जनता के पैसे का सही उपयोग ना करना कहलाएगा. प्रधानमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्ट को महंगाई के धुएं में धकेल देना कहलाएगा. उज्ज्वला योजना का मकसद क्या वाकई यूं सिर्फ सिलेंडर बांटकर पूरा होगा, क्या फिर गैस की महंगाई, धुएं से सबको आजादी नहीं लेने देगी?
क्या करना चाहिए सरकार को
(रिपोर्ट: आजतक ब्यूरो)