ब्लैक फंगस (म्यूकर माइकोसिस) के बढ़ते मामलों के बीच इस बीमारी की दवाई एम्फोटेरिसिन बी (Amphotericin B) और दूसरी एंटी फंगल दवाओं की कमी का दावा किया गया. ऐसे में अब फार्मा कंपनीज इन दवाओं के बड़े स्तर पर प्रोडक्शन करने की तैयारी में हैं.जल्द ही ब्लैक फंगस के लिए यूज होने वाली दवाओं की किल्लत दूर होगी.
दरअसल, पिछले कुछ हफ्तों से देश के विभिन्न राज्य म्यूकर माइकोसिस (Black Fungus) नामक घातक फंगल संक्रमण के इलाज में इस्तेमाल होने वाली एंटी-फंगल दवा एम्फोटेरिसिन बी की कमी से जूझ रहे हैं.
इसको लेकर हाल ही में केंद्र सरकार ने ब्लैक फंगस की दवा बनाने के लिए पांच और निर्माताओं को लाइसेंस दिया है. दवा बनाने के लिए पहले से भी पांच कंपनियां मौजूद थीं. वर्तमान में भारत सीरम और वैक्सीन, BDR फार्मास्यूटिकल्स, सन फार्मा, सिप्ला और लाइफ केयर इनोवेशन भारत में एंटी-फंगल दवा बनाते हैं. वहीं Mylan एंटी-फंगल दवा का आयात करती है.
आपको बता दें कि BDR फार्मास्युटिकल्स वर्तमान में एंटी फंगल दवा के उत्पादन में जुटी पांच कंपनियों में से एक है. 'आजतक' ने दवा के उत्पादन, आने वाले चैलेंज और वर्तमान में मांग में वृद्धि को देखते हुए फार्मा कंपनी बीडीआर फार्मा के अध्यक्ष से बात की.
BDR फार्मा के चेयरमैन धर्मेश शाह का कहना है कि कंपनी परंपरागत रूप से कम मात्रा में लिपोसोमल एम्फोटेरिसिन बी (Liposomal amphotericin B) का उत्पादन करती रही है. ऐसा इसलिए क्योंकि इसके पहले दवा के बड़े उत्पादन की कोई आवश्यकता नहीं थी. लेकिन ब्लैक फंगस के चलते अब परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है.
BDR फार्मा के चेयरमैन से यह पूछे जाने पर कि कंपनी को उत्पादन बढ़ाने में कैसी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है, उन्होंने कहा कि सबसे बड़ी चुनौती लिपिड फॉर्मूलेशन थी और इसको बनाने वाला स्विट्जरलैंड से बाहर. शिपमेंट भी नहीं आ रहे थे, लेकिन अब सरकार के सहयोग से, हम शिपमेंट को जुटाने में सक्षम हैं.
दूसरी महत्वपूर्ण चुनौती उन फिल्टरों को जुटाना है जिनका प्रोडक्शन में उपयोग किया जाता है. ये फिल्टर अमेरिका से आते हैं और इनकी आपूर्ति कम है. तीसरी चुनौती एम्फोटेरिसिन बी पाउडर है, जहां भारत में केवल एक उत्पादक है और प्रोडक्शन क्षमता सीमित है. धर्मेश शाह ने कहा कि उन्होंने एम्फोटेरिसिन बी पाउडर के विशेष आयात सरकार से संपर्क किया है. हम आने वाले महीने में उत्पादन को और बढ़ा सकेंगे.