कहानी शुरू होती है 14वीं सदी के मध्य से. तब इटली से कई व्यापारी चीन से मसाले-रेशम लेकर लौटे थे. सिसली बंदरगाह पर कुल 12 जहाज रुके. नीचे खड़े परिवार के लोग बेसब्री से इंतजार कर रहे थे कि लोग उतरें लेकिन देर तक कोई हलचल नहीं हुई. आखिरकार कई लोग जहाज पर चढ़ने लगे लेकिन वहां पहुंचते ही चीखों से सारा बंदरगाह गूंज उठा. जहाजों पर लाशों के ढेर लगे थे. सबके शरीर मवाद और गिल्टियों से भरे हुए.
कुल लोग जिंदा भी थे. उनके ठीक होने का इंतजार होने लगा, लेकिन हुआ उल्टा. उनकी देखरेख कर रहे परिवार भी धड़ाधड़ बीमार होने लगे. सबके शरीर पर गिल्टियां थीं, जिनसे मवाद बहता था. तेज बुखार और उल्टियों के साथ जल्द हो लोग दम तोड़ देते. अब तक कोई साफ आंकड़ा नहीं मिल सका लेकिन माना जाता है कि उन 12 जहाजों के कारण यूरोप की एक तिहाई से भी बड़ी आबादी खत्म हो गई. कहीं-कहीं 60 प्रतिशत लोग भी मारे गए.
बाद में उन्हें डेथ शिप कहा गया- रेशम या मसाले नहीं, मौत ढोकर लाने वाला जहाज.
ये प्लेग था. इसी साल जून में नेचर मैगजीन में एक स्टडी छपी, जिसने इसी बात की पड़ताल की. एशिंएंट DNA ट्रेसेस ऑरिजिन ऑफ ब्लैक डेथ नाम से छपे इस अध्ययन में किर्गिस्तान के कब्रिस्तानों को देखा गया. वहां साल 1338 से लेकर अगले डेढ़ साल तक ज्यादा ही कब्रें थीं. जांच हुई तो पता लगा कि तब मरे हुए लोगों के DNA में प्लेग के वही बैक्टीरियल जीनोम थे, जिसकी शुरुआत चीन में हुई थी. यही पैटर्न कई दूसरे देशों में दिखा, कि डेढ़-दो सालों के भीतर बहुत सी मौतें हुईं. यानी कुछ था, जो सामान्य से अलग था. लंदन में भी उस दौरान की कब्रों को टटोलने पर वाई पेप्टिस का वही जीनोम मिला, जो तब चीन से निकला था.
'ब्लैक डेथ' से दुनिया भर में मची थी तबाही
कुल मिलाकर ब्लैक डेथ का सोर्स स्ट्रेन चीन था, जिसने सारी दुनिया में भयंकर तबाही मचाई. दरअसल व्यापार के लिए चीन ने सिल्क रोड पर खूब काम किया था, जिससे दूसरे देशों का उसतक पहुंचना आसान हो गया. ऐसे में यूरोप समेत अफ्रीका तक के व्यापारी पानी वाले जहाजों के जरिए यहां-वहां आने-जाने लगे. सामान लोड करते हुए साथ में चूहे भी चढ़ आते. इनमें संक्रमित चूहे भी थे, जो अपने साथ प्लेग के बैक्टीरिया लेकर आए थे. यहां से बीमारी अफ्रीका, इटली, स्पेन, इंग्लैंड, फ्रांस, ऑस्ट्रिया, स्कैन्डिनेविया , हंगरी, स्विट्जरलैंड, जर्मनी, और बॉल्टिक पहुंच गई.
इसके मरीज आम सर्दी-बुखार से नहीं मरते थे, बल्कि भयावह मौत होती थी. बाद में समझ आया कि तब एक साथ दो तरह के प्लेग का अटैक हुआ था. एक था न्यूमोनिक प्लेग. मरीज इसमें तेज बुखार के साथ उल्टियां करता, जो धीरे से खून की उल्टी में बदल जाता और कुछ ही दिनों के भीतर उसकी मौत तय थी. दूसरा टाइप था ब्यूबॉनिक प्लेग. इसमें मरीज की जांघों और बगल पर गिल्टियां बन जातीं जिनमें मवाद बनने लगा. तेज बुखार चढ़ता और उसकी मौत हो जाती. उस दौरान इस बैक्टीरिया संक्रमण का कोई इलाज नहीं था.
ईश्वर को खुश करने की होती थी कोशिश
तब डॉक्टर नए-नए तरीके खोजने लगे, जैसे गिल्टियों पर उबलता हुआ पानी डालना ताकि भीतर से संक्रमण खत्म हो जाए. इंफेक्शन तो नहीं जाता था, बल्कि जलने से मरीज की मौत हो जाती थी. इसी दौरान एक मान्यता जन्मी कि ईश्वर नाराज होकर लोगों को सजा दे रहा है और प्रायश्चित से बीमारी ठीक हो सकती है. लोग प्रायश्चित के लिए अपने शरीर को ज्यादा से ज्यादा तकलीफ देने लगे. खासकर खून बहाना. वे खुद को जंजीर या कोड़े से मारते ताकि खून बहे और ईश्वर मान जाए.
इस समुदाय को फ्लैगलेंट्स कहा गया. इटली से शुरू होकर ये मान्यता दुनिया के कई हिस्सों तक पहुंच गई. कहने की बात नहीं कि प्लेग से पहले लोग कोड़ों से हुए इंफेक्शन और दर्द से मरने लगे.
5 हजार साल पहले भी फैली थी महामारी
इतिहासकार मानते हैं कि चीन से ब्लैक डेथ या फिर कोरोना ही नहीं, बल्कि कई और महामारियां फैली होंगी, जिनका कोई रिकॉर्ड नहीं रखा जा सका. लगभग 5 हजार साल पहले उत्तर-पूर्व चीन से ऐसी ही कोई महामारी फैली थी, जिसने जमकर तबाही मचाई. ये बात चीन की एक आर्कियोलॉजिकल साइट Hamin Mangha के आसपास जमा कब्रों को देखकर भी कही जाती है क्योंकि उनपर लगा स्टोन एक खास वक्त का है.