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रेमडेसिविर नहीं है संजीवनी, डॉक्टर सुचिन बजाज बोले- कई वायरस के ट्रायल में हो चुकी है फेल 

उजाला सिग्नस हॉस्पिटल के फाउंडर डॉक्टर सुचिन बजाज का कहना है कि रेमडेसिविर संजीवनी नहीं है. कई वायरस के ट्रायल में ये फेल हो चुकी है. कोरोना के इलाज में कई मरीज डॉक्टर पर रेमडेसिविर इंजेक्शन लगाने का दबाव डाल रहे हैं, लेकिन हकीकत कुछ और ही है. जिसे लोग संजीवनी समझकर लाखों रुपये खर्च करने से गुरेज नहीं कर रहे, वो कोई मैजिक ड्रग नहीं है.

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Remdesivir injection
Remdesivir injection
स्टोरी हाइलाइट्स
  • आईसीयू में रहने का टाइम कम करता है ये रेमडेसिविर 
  • ट्रायल से पता चला, मॉर्टैलिटी रेट पर नहीं पड़ता है कोई प्रभाव 

कोरोना संक्रमण के दौर में रेमडेसिविर को जहां संजीवनी माना जा रहा है, वहीं विशेषज्ञों ने दावा किया है कि ये इंजेक्शन बस आईसीयू में रहने के टाइम को कम करती है. साफ शब्दों में समझा जाए, तो जल्दी रिकवर करने में कुछ मदद करती है. बाकी ये कोरोना संक्रमित मरीज के लिए कोई संजीवनी नहीं है. ये ड्रग कई बड़े ट्रायल में फेल हो चुका है.  

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आम दिनों में रेमडेसिविर के एक इंजेक्शन की कीमत 900 से 5400 बैठती है, जबकि कोरोना काल में लोग लाखों हजारों देकर भी इस खरीद रहे हैं. लोगों की इसी कमज़ोरी का फायदा कालाबाजारी करने वाले उठा रहे हैं, जबकि हकीकत में मॉर्टैलिटी यानी मृत्यु दर पर रेमडेसिविर का असर नहीं है, ये बात कई ट्रायल में साबित हो चुकी है.  

उजाला सिग्नस हॉस्पिटल के फाउंडर डॉक्टर सुचिन बजाज का कहना है कि रेमडेसिविर 10 साल पहले बनाई गई थी. हेपेटाइटिस- c वायरस के लिए कई ट्रायल के बाद कोई खास असर नहीं दिखा पाई. इबोला वायरस के 500 मरीज के एक छोटे ट्रायल में भी ये खास प्रभाव नहीं डाल पाई, जबकि कोरोना वायरस में 1000 मरीजों के एक ट्रायल में देखा गया कि ये आईसीयू में रहने के टाइम को कम कर रही है. मसलन जिन्हें रेमडेसिविर इंजेक्शन लगा है, वो 12 दिन के बजाए 7 दिन में ही आईसीयू से बाहर आ जा रहे थे. 

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यही वजह है कि यूएस के फेडरल ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) से रेमडेसिविर को कोरोना के इलाज में अप्रूवल मिल गया. वहीं एक्ट -2 ट्रायल में रेमडेसिविर का दूसरी दवाई के साथ ट्रायल हुआ फिर भी मॉर्टैलिटी रेट में कोई फर्क नहीं पड़ा. डब्ल्यूएचओ के सॉलिडैरिटी ट्रायल में 20 देशों ने हिस्सा लिया. 12 हज़ार से ज्यादा मरीज शामिल किए गए, इस ट्रायल में रेमडेसिविर से खास नतीजे नहीं निकले, कोई फायदा नहीं मिला.   

ऑल इंडिया ऑर्गेनाइजेशन ऑफ केमिस्ट एंड ड्रगिस्ट (AIOCD) के पूर्व जनरल सेक्रेटरी सुरेश गुप्ता ने कहा कि 2019 में जब कोरोना की शुरुआत हुई थी तब हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन बड़े पैमाने पर कई मैन्युफैक्चरर ने बनाया और ये दवाई दूसरे देशों को भी भेजी गई. तीन महीने बाद जब कोरोना कम हो गया, तो ये दवाइयां एक्सपायर हुईं. अरबों रुपये की जीवन रक्षक दवाओं का नुकसान हुआ. ऐसे में भारत सरकार को दवा व्यवसाइयों को राहत पैकेज देना चाहिए. साल 2021 जब कोरोना अपने पीक पर है, तो मैं दवा निर्माता कंपनियां दवाओं की मैनुफैक्चरिंग से पीछे हट रही हैं. सवाल है कि दवाओं के भंडारण की कोई नीति क्यों नही बनाई गई?  9 लाख दवा व्यवसायी पूरे देश में हैं.  

 

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