जीनोम सीक्वेंसिंग करने वाले वैज्ञानिकों के ग्रुप INSACOG ने कोरोना की दूसरी लहर को लेकर एक स्टडी की है. जिसमें बताया गया है कि किस तरह भारत में कोरोना की दूसरी लहर ने तबाही मचा दी, साथ ही कैसे राजधानी दिल्ली में चौथी लहर ने इतने लोगों की जान ले ली. दिल्ली में सीरो सर्वे में 56 फीसदी तक पॉजिटिविटी दिखाने के बाद भी कोरोना के डेल्टा वैरिएंट से सेफ क्यों नहीं रह पाई.
स्टडी के मुताबिक, दिल्ली में नवंबर 2020 के दौरान कोरोना की तीसरी वेव का पीक आया था, तब 9000 तक केस दर्ज किए गए थे. दिसंबर से मार्च के बीच सबकुछ ठीक रहा, लेकिन मार्च के तीसरे हफ्ते के बाद दिल्ली में हालात बिगड़े और पॉजिटिविटी रेट 30 फीसदी के भी पार चला गया. इस लहर में कोरोना के मामलों को बढ़ाने में B.1.617 और B.1.617.2 वैरिएंट का हाथ रहा.
स्टडी के मुताबिक, कोरोना के एल्फा वैरिएंट के कारण होने वाली मौतों की संख्या ज्यादा थी, जबकि डेल्टा वैरिएंट में ये कम थी. दिल्ली की स्थिति को लेकर ये भी माना गया है कि यहां मौतों की संख्या हेल्थ सिस्टम के बदतर होने की वजह से ज्यादा हुई, ना कि वैरिएंट के कारण.
B.1.617 डेल्टा वैरिएंट ने एक चिंता और भी बढ़ाई है. वैक्सीन लगवा चुके लोगों में ये वायरस फिर से लौटा है, जो चिंता बढ़ाने का विषय है. इससे पहले अन्य किसी वैरिएंट का ये असर नहीं दिखा था.
दिल्ली के साथ केरल-महाराष्ट्र-पंजाब में आया था पीक
दिल्ली से अलग पूरे देश को लेकर बताया गया है कि अप्रैल 2021 में केरल, महाराष्ट्र, पंजाब जैसे राज्यों में पीक आना शुरू हुआ. महाराष्ट्र में आउटब्रेक का कारण B.1.617.1 वैरिएंट बना, वहीं पंजाब में B.1.1.7. ने तबाही मचाही. स्टडी ने चिंता जाहिर की है कि कोरोना के B.1.617.2 वैरिएंट ने ज्यादा तेजी से अपने पैर पसारे हैं, साथ ही ये वैक्सीन लगवा चुके लोगों में भी असर कर रहा है.
गौरतलब है कि कोरोना की दूसरी लहर ने भारत में मार्च-अप्रैल 2021 में तबाही मचा दी. दिल्ली से लेकर देश के अन्य हिस्सों में इस दौरान काफी अधिक संख्या में मौतें हुईं. लोगों को इलाज के लिए दर-दर भटकना पड़ा, हालांकि अब जाकर हालात कुछ हदतक सुधरे हैं.