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कोरोना महामारी कैसे निगल गई गरीब बच्चों का पौष्टिक आहार?

केंद्र सरकार का कहना है कि कम से कम 9.5 करोड़ छात्र-छात्राओं को पाबंदियों के दौरान मिड डे मील की जगह खाद्य सुरक्षा अलाउंस दिया गया. इसमें वित्तीय सहायता, दालें, और अनाज शामिल हैं.

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प्रतीकात्मक तस्वीर (फाइल फोटो)
प्रतीकात्मक तस्वीर (फाइल फोटो)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • महामारी कैसे निगल गई गरीब बच्चों का पौष्टिक आहार?
  • कच्चा राशन बना पूरे परिवारों का सहारा
  • घर को चलाने के लिए काम करने को मजबूर स्कूली बच्चे

वो फुर्तीली उंगलियों से एक कूची के जरिए मिट्टी के दीये को गहरा लाल रंग देने में तल्लीन है. नहीं ये उसकी आर्ट क्लास का हिस्सा नहीं है. 

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उसका स्कूल कोविड पाबंदियों की वजह से बंद है. वर्धा में ये बच्ची सड़क किनारे सामान बेचने वाली अपनी दादी को मिट्टी से बनी वस्तुओं को चमकाने और खूबसूरत बनाने में मदद कर रही है. 

चौथी क्लास में पढ़ने वाली बच्ची पालथी मार कर दादी के पास बैठी हुई है. जमीन पर बेचने के लिए दीये और गेंदा फूलों की मालाएं पड़ी हैं. साथ ही एक छाता भी खुला हुआ है. अगर मौसम खराब होता है तो सामान के बचाव के लिए. 

पके खाने की जगह राशन ने ली 

क्या बच्चे, क्या बूढ़े और क्या जवान, गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों में सभी को महामारी के दौरान दो जून की रोटी जुटाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है, इसलिए उन्हें मिड डे मील (मध्यान्ह भोजन) के कोटे से कुछ अतिरिक्त राशन मिल रहा है. 

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बंदी के दौरान, अधिकारी छात्रों को दोपहर का पका हुआ पौष्टिक भोजन नहीं दे रहे हैं. इसके बजाय, उन्हें खाद्यान्न, दाल और खाद्य तेल दिया जा रहा है. 

बच्ची की दादी ने आजतक को बताया, "उसे न केवल किताबें और बैग मिले, बल्कि वो अनाज, दाल और तेल भी लाई.” 

केंद्र सरकार का कहना है कि कम से कम 9.5 करोड़ छात्र-छात्राओं को पाबंदियों के दौरान मिड डे मील की जगह खाद्य सुरक्षा अलाउंस दिया गया. इसमें वित्तीय सहायता, दालें, और अनाज शामिल हैं. 

स्कूलों के बाहर सोशल डिस्टेंसिग के पालन के साथ बच्चों और उनके माता-पिता को अपने आवंटन वाली चीजें लेने के लिए कतारबद्ध देखा गया. 

सबसे बड़ा स्कूल लंच कार्यक्रम 

1995 में केंद्र की वित्तीय सहायता से प्राथमिक शिक्षा के बच्चों को पोषण संबंधी मदद के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम के रूप में मिड डे मील शुरू किया गया. इस योजना को तब से कई बार अपडेट (उन्नत) किया जा चुका है. 

वायरस लॉकडाउन शुरू होने से पहले, प्रोजेक्ट में प्राथमिक कक्षाओं (I-VIII) में लगभग 11.6 करोड़ बच्चे और इसके रोल पर 11.4 लाख सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूल थे. इसका लक्ष्य हर आयु वर्ग में हर एक बच्चे को 450-700 कैलोरी पोषण देना था. 

दुनिया के सबसे बड़ा स्कूल-फीडिंग कार्यक्रम वाले इस प्रोजेक्ट की अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने भी तारीफ की. 

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गरीब बच्चे काम करने को मजबूर 

प्रोजेक्ट से स्कूलों में बच्चों के अधिक भर्ती होने और उन्हें अच्छा पोषण मिलने में मदद मिली. लेकिन महामारी ने इस काम पर ब्रेक लगा दिए. 

आजतक ने पाया कि आर्थिक रूप से पिछड़े समुदायों के कई बच्चों को मौजूदा संकट के दौरान अपने परिवारों के संघर्ष के लिए साथ जुटना पड़ा.  

नियमित कक्षाएं न होने की वजह से बच्चों को स्ट्रीट वेंडर, खेतों में कपास की बालियों को तोड़ते, चारा ढोते, बीहड़ मैदानों पर क्रिकेट खेलते देखा गया. जाहिर है कि स्कूल में जो मिड डे मील स्कीम के तहत उन्हें जो पौष्टिक आहार मिलता था, बच्चे उसके बिना ही ये सब कर रहे थे.  

मिड डे मील: हर दिन हर स्कूली बच्चे के खाने पर खर्च (रुपये में)

कर्नाटक के धारवाड़ में एक स्ट्रीट वेंडर के रूप में काम करने वाले एक स्कूली छात्र ने कहा, "घर पर खाने के लिए कुछ नहीं है, इसलिए हम यह दुकान चला रहे हैं, हमारे स्कूल बंद हैं." 

ग्रामीण क्षेत्रों में, युवा लड़कियों को अपनी माताओं के साथ प्याज की फसल को छांटते हुए देखा गया. कई माता-पिता बच्चों से काम कराने की बात मानते हैं.  

ऐसे ही एक अभिभावक ने कहा, "हमारे पास कोई काम नहीं है. हमें अपने बच्चों को काम के लिए भेजना पड़ रहा है, यह हमारे लिए बहुत कष्टदायक है." 

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जो मिड डे मील योजना बच्चों के लिए थी, वही अब घर के सभी सदस्यों का वजूद बचाए रखने के लिए सहारा बनी हुई है. 

स्कूल के एक छात्र ने कहा, "स्कूल से हमें जो भी अनाज मिलता है वह हमारे परिवार को बचाए रखने में मदद करता है. हमारे माता-पिता लॉकडाउन में घर पर ही रहे." 

लेकिन यहां एक दूसरा पहलू भी है. बच्चों को पूर्ण प्रोटीन युक्त भोजन जो पहले परोसा जाता था, उसी के बराबर कच्चा अनाज लाभार्थी परिवारों को बांटा जा रहा है. जिन घरों में अधिक सदस्य हैं, उनके लिए इस अनाज के पर्याप्त न होने की कई शिकायतें भी सामने आई हैं.  

अकोला में एक पिता ने कहा, "यह पर्याप्त नहीं है, हम इसे केवल एक हफ्ते के लिए प्राप्त करते हैं और यह जल्दी ही पूरी तरह खत्म हो जाता है.” 

झारखंड के पलामू में क्रिकेट खेल रहे कुछ बच्चों ने कहा कि वो स्कूल में हर रोज मिलने वाले पौष्टिक भोजन की कमी महसूस कर रहे हैं. 

एक स्कूली छात्र ने कहा, "हमें पहले ये मिलता था, हमें अब चावल नहीं मिल रहा है." 

देश के उत्तरी राज्य पंजाब की बात की जाए तो वहां मिड-डे मील के बदले गेहूं और चावल मिल रहा है. लेकिन कुछ परिवारों की शिकायत है कि ये पर्याप्त रूप से पौष्टिक नहीं है. 

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बरनाला में एक मां ने शिकायत की, "चावल और गेहूं पर्याप्त नहीं हैं. हमारे बच्चे को दूध आदि की भी जरूरत होती है. चावल और गेहूं ही काफी नहीं होते हैं." 

 

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