केंद्र सरकार की ओर से जारी किए गए आंकड़े बताते हैं कि कोरोना महामारी को देखते हुए जितने वेंटिलेटर्स का ऑर्डर दिया गया, उनमें से आधे से भी कम ही देश भर के कोविड-19 इलाज के लिए निर्धारित अस्पतालों में इंस्टाल किए जा सके. क्या है इसकी वजह?
केंद्र सरकार की ओर से जिन 60,948 वेंटिलेटर्स का ऑर्डर दिया गया था, उनमें से 23,699 वेंटिलेटर्स ही देश भर में कोविड इलाज के लिए निर्धारित विभिन्न अस्पतालों में इंस्टाल किए जा सके हैं.
क्या ट्रेंड स्टाफ और डॉक्टर्स की कमी की वजह से इन वेंटिलेटर्स का समुचित इस्तेमाल नहीं किया जा पा रहा? या कोरोना महामारी की दस्तक के शुरुआती दौर में जितने वेंटिलेटर्स की जरूरत का अनुमान लगाया गया था, उसकी तुलना में बहुत कम ही लोगों को इलाज के दौरान वेंटिलेटर्स की जरूरत पड़ी.
इस संबंध में वेंटिलेटर्स निर्माता अपनी दिक्कतों का हवाला दे रहे हैं. उनके मुताबिक उन्होंने ऑर्डर्स को देखते हुए कम्पोनेंट्स की खरीद में करोड़ों रुपए निवेश किए, लेकिन अब अधिक डिमांड न होने की वजह से उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ रहा है.
वेंटिलेटर्स के ऑर्डर और इंस्टालेशन के गैप को लेकर हमने स्वास्थ्य विशेषज्ञों और एसोसिएशन ऑफ इंडियन मेडिकल डिवाइस इंडस्ट्री (AiMeD) के फोरम कोऑर्डिनेटर से बात की.
दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल में इंटेंसिविस्ट (गहन चिकित्सक) डॉ धीरेन गुप्ता का कहना है कि "कोविड-19 में, फेफड़ों को हाई क्वालिटी वाले, परिष्कृत वेंटिलेटर की आवश्यकता होती है. आपको रेफ्रेक्ट्री हाइपोक्सिमिया के केस में रोगी को वेंटिलेट करने की आवश्यकता होती है. ये शायद कॉस्मेटिक वेंटिलेटर्स हो सकते हैं जो स्पेसिफिकिएशन्स (विनिर्देशों) के हिसाब से बनाए हो सकते है. इसके अलावा, यह चेक करने की जरूरत है कि क्या वे उन कई राज्यों में डिमांड और सप्लाई को को पूरा करते हैं जहां केस लोड अधिक है.”
कोविड-19 नेशनल टास्क फोर्स के सदस्य और पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया के एपिडेमियोलॉजिस्ट डॉ गिरिधर बाबू इस महामारी को लेकर कर्नाटक राज्य के सलाहकार भी हैं. वो ऐसी स्थिति के लिए ट्रेंड स्टाफ की कमी का हवाला देते हैं. उन्होंने कहा, ट्रेंड इंटेंसिविस्ट्स और सपोर्ट स्टाफ की कमी एक मुद्दा है. इसके अलावा, एक और कारण यह भी हो सकता है कि पहले जितना अनुमान लगाया गया, उसकी तुलना में बहुत कम लोगों को वेंटिलेटर की आवश्यकता होती है."
एसोसिएशन ऑफ इंडियन मेडिकल डिवाइस इंडस्ट्री (AiMeD) के फोरम कोऑर्डिनेटर राजीव नाथ ने क्वालिटी और स्पेसिफिकेशन्स पर चिंताओं को खारिज किया. उन्होंने कहा, “निर्माताओं को स्पेसिफिकेशन्स और क्वालिटी को लेकर मानक दिए गए थे, जिनका पालन किया गया. निर्माताओं ने एक कदम आगे जाकर आग्रह किए जाने पर एड ऑन फीचर्स को फ्री अपग्रेड उपलब्ध कराया.”
वेंटिलेटर्स निर्माता अपनी दिक्कत वाली स्थिति का भी हवाला देते हैं
राजीव नाथ ने कहा, “दुर्भाग्य से, ऑर्डर ऐसे वक्त पर दिए गए जब डिमांड अभूतपूर्व थी और स्थिति पूरी तरह अज्ञात थी. उस वक्त के लिए ये सही फैसला हो सकता था. मई 2020 के बाद से, सरकार आगे ऑर्डर देने के लिए हिचक वाले खरीदार जैसी स्थिति में है, क्योंकि शुक्र है कि देश को इतने वेंटिलेटर्स की आवश्यकता नहीं पड़ी. वे महसूस करते हैं कि कई जगहों पर वेंटिलेटर्स की ज्वलंत जरूरत नहीं है. लेकिन, इसने निर्माताओं को झटके वाली स्थिति में छोड़ दिया है क्योंकि उन्होंने कम्पोनेंट्स (घटकों) और फिनिश्ड प्रोडक्ट्स की इंवेट्री में करोड़ों रुपए खर्च किए. निर्यात पर प्रतिबंध लगाने से उनके लिए और हालात खराब हुए. प्रतिबंधों को हाल ही में हटा लिया गया लेकिन तब तक अंतरराष्ट्रीय मांग भी सूख गई थी.”
इससे पहले आज तक/इंडिया टुडे ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि किस राज्य को मांग के हिसाब से कितने वेंटिलेटर्स आवंटित हुए?कितने वेंटिलेटर्स की डिलिवरी की गई और कितने इंस्टाल हुए.
सरकारी डेटा दिखाता है कि आवंटित 36,825 वेंटिलेटर्स में से राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को 30,893 वेंटिलेटर्स डिलिवर किए गए. हालांकि इनमें से 23,669 वेंटिलेटर्स को ही इंस्टाल किया जा सका है.
केद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से पहले कहा जा चुका है कि एम्स के डॉक्टरों की ओर से वेंटिलेटर्स को लेकर कई ट्रेनिंग सेशंस संचालित किए गए. ये केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के तत्वाधान और विभिन्न राज्य/केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारों के सहयोग से किया गया. इन ट्रेनिंग सेशंस में शहरों और कस्बों में अस्पताल स्टाफ को वेंटिलेटर्स के इस्तेमाल और अन्य पहलुओं के बारे में बताया गया. हालांकि, ट्रेंड डॉक्टर्स और स्टाफ और डॉक्टरों की कमी कोविड-19 के दौर में इस जीवन रक्षक उपकरण के इस्तेमाल को लेकर चिंता बढ़ाती है.