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ग्राउंड रियलिटी: 'यूपी से बिहार तक नहीं पहुंच सकती बहकर लाशें, काशी को बदनाम करने की साजिश'

गंगा और यमुना नदी में बड़ी संख्या में लाशें बहती हुईं मिलीं. सवाल ये उठ रहा था कि कहीं अंतिम संस्कार महंगा होने की वजह से तो इन्हें नदियों के जल में प्रवाहित नहीं किया गया है. इस मामले में आजतक की टीम ने पड़ताल की, तो सच्चाई कुछ और ही निकलकर सामने आई है.

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वाराणसी का महाश्मशान मणिकर्णिका
वाराणसी का महाश्मशान मणिकर्णिका
स्टोरी हाइलाइट्स
  • कोरोना काल में भी नहीं बढ़ी लकड़ी पर महंगाई
  • महाश्मशान मणिकर्णिका पर प्रशासन ने रेट किया है तय
  • गरीबों की मदद कर दुकानदार भी करा देते अंतिम संस्कार

यूपी के गाजीपुर और बिहार के बक्सर में गंगा में दर्जनों प्रवाहित शवों के मिलने से हड़कंप मचा हुआ है. बिहार शासन प्रशासन ने सारा ठीकरा यूपी पर फोड़ते हुए बताया है कि ये शव गंगा में बहते हुए आए हैं. ऐसे में सवाल ये भी उठने लगे, कि कहीं लकड़ियों  की महंगाई की वजह से तो लोग लाशों का अंतिम संस्कार नहीं करते हुए जल में प्रवाहित कर रहे हैं. इस पूरे मामले की जमीनी हकीकत टटोलने के लिए आजतक की टीम ने वाराणसी के महाश्मशान मणिकर्णिका का दौरा किया, जहां सच्चाई कुछ और ही निकलकर सामने आई. 

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पैसे के अभाव में मिलकर कराते हैं अंतिम संस्कार 
वाराणसी के महाश्मशान मणिकर्णिका पहुंची आजतक की टीम ने यहां लकड़ी व्यवासाई किशन कुमार से बात की, तो उन्होंने बताया कि लकड़ी का सामान्य भाव 400 रुपया मन का है और वही भाव अभी का भी है. उन्होंने बताया कि हफ्ता-दस दिनों पहले शव ज्यादा आ रहे थे, लेकिन अभी शव आना काफी कम हो चूके हैं. गंगा में शवों के जल प्रवाह करने के सवाल पर उन्होंने बताया कि जो लोग कभी सक्षम नहीं भी होते हैं, तो दुकानदार मिलकर निशुल्क शवदाह करा देते हैं. उन्होंने बताया कि सिर्फ उन्हीं शवों का जल प्रवाह होता है जिनको चर्म रोग होता है या फिर सर्पदंश से मौत या जिसकी अंतिम इच्छा जलप्रवाह की होती है, लेकिन कोई पैसों की मजबूरी के चलते लाश को गंगा में प्रवाहित करे यह संभव नहीं है. 

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बदनाम की जा रही काशी 
तो वहीं एक अन्य लकड़ी दुकानदार भैयालाल यादव ने बताया कि लकड़ी का रेट सामान्य 400 रुपये मन का ही है. शवों के आने का सिलसिला कम हो गया है. अन्य जनपदों से भी शवों के आने पर रोक लगी हुई है. काफी पहले लकड़ी की कमी के वक्त सफेदा (येकोलिप्टस) की लकड़ी से शवदाह हुआ था, लेकिन अभी सब सामान्य है. किसी के पास पैसा नहीं भी होता तो जन सहयोग करके मुफ्त में काम करा देते हैं, जहां तक जलसमाधि का सवाल है तो सिर्फ साधु, सर्पदंश या फिर नवजात बच्चों को जिनकी मौत हो जाती है, उनको ही दी जाती है. वाराणसी से शव बहकर बिहार जा ही नहीं सकता. बीच में ही जानवर और पक्षी उसे खत्म कर देंगे. यह सिर्फ काशी को बदनाम किया जा रहा है.  

प्रशासन ने लगाई रेट लिस्ट 
एक अन्य लकड़ी व्यवसाई संजय गु्प्ता ने बताया कि पहले से ही प्रशासन ने रेट बोर्ड लगा दिया है, जिसमें कोविड के शव का 7 हजार, तो नाॅनकोविड का 5 हजार रुपया है. सूखी लकड़ी का अभी का भाव साढ़े तीन से  400 रुपया है, जो सामान्य रेट है और अभी शव का आना भी कम हो गया है, क्योंकि अफवाह है कि ज्यादा पैसा लिया जा रहा है. ऐसा काम हरिश्चंद्र श्मशान पर हो रहा था. मणिकर्णिका घाट पर नहीं हो रहा है. उन्होंने बताया कि जलप्रवाह सर्पदंश और चर्मरोग वाले शव का ही होता है. कोविड की बाॅडी जलप्रवाह नहीं होती है. उन्होंने बताया कि 100 से 150 शव एक माह पहले आए थे. इन दिनों 100 से 150 शव आ जाते हैं, लेकिन अब 25-30 शव ही आ रहे हैं.

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