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Exclusive: दुनिया के मशहूर इतिहासकार ने कहा- कोरोना को हराना आसान, नफरत दूर करें

कोरोना लॉकडाउन के बीच इंडिया टुडे ग्रुप की ई-कॉन्क्लेव सीरीज में दुनिया के मशहूर इतिहासकार और दार्शनिक युवाल नोआ हरारी से कोरोना पर चर्चा की गई. युवाल ने कहा कि कोरोना को हराना आसान है, लेकिन दुनिया को आपसी नफरत दूर करनी होगी.

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युवाल नोआ हरारी
युवाल नोआ हरारी

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  • कोरोना पर युवाल नोआ हरारी से खास बातचीत
  • युवाल ने कहा- कोरोना महामारी को हराना आसान
  • दुनिया को नफरत भुलाकर साथ आना होगा: युवाल

पूरी दुनिया इस वक्त कोरोना महामारी से जूझ रही है. तमाम देशों की तरह भारत में भी लॉकडाउन लागू है. हर कोई घर में रहने को मजबूर है. इस मुश्किल वक्त में इंडिया टुडे ग्रुप ने ई-कॉन्क्लेव सीरीज की शुरुआत की है, जिसमें दुनिया की नामचीन हस्तियों से कोरोना संक्रमण को लेकर हर पहलू पर चर्चा की जा रही है. इसी कड़ी में इंडिया टुडे और आजतक के न्यूज डायरेक्टर राहुल कंवल ने दुनिया के मशहूर इतिहासकार और दार्शनिक युवाल नोआ हरारी से चर्चा की.

युवाल हरारी ने बताया कि कोरोना एक बड़ी महामारी जरूर है, लेकिन इससे लड़ना आसान है. उन्होंने कहा कि इस महामारी से लड़ने के लिये दुनिया को साथ आना पड़ेगा, लेकिन अफसोस की बात है कि एक-दूसरे पर आरोप लगाये जा रहे हैं. युवाल ने कहा कि इस तरह की नफरत को दूर सबको साथ आना पड़ेगा ताकि इस चुनौती से पार पाया जा सके.

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राहुल कंवल ने युवाल से कोरोना महामारी और दुनिया में पहले आयी महामारी के बारे में सवाल किया तो उन्होंने बताया कि कोरोना पर हम बेहतर स्थिति में हैं. ये महामारी मध्य काल में आयी ब्लैक डेथ के लिहाज से काफी कम है. हमारे पास इस महामारी को जानने समझने के लिये तकनीक है और इसे रोकने के साइंटिफिक तरीके हैं. लेकिन मध्य काल के ब्लैक डेथ की बात की जाये तो वो किसी को समझ ही नहीं आया, कैसे लोग मर रहे हैं है, कैसे रोका जाये, कुछ लोग उसे ईश्वर का दंड मान रहे थे.

युवाल ने कहा, 'आज हमें सब पता है. दो हफ्ते में वायरस की पहचान कर ली गई. उसके टेस्ट डवलप कर लिए गये. हमारे पास इससे लड़ने की ताकत है. बस इतना फर्क है कि क्या हमारी नीयत है.'

नफरत से नहीं, साथ आने से चलेगा काम

युवाल नोआ हरारी कोरोना वायरस महामारी को बड़ी मुश्किल नहीं मानते हैं. उन्होंने ये कोई युद्ध भी नहीं हैं, जहां किसी हथियार का इस्तेमाल का होना है. उन्होंने कहा कि महामारी के खिलाफ दुनिया अब भी एक साथ आ सकती है. चीन, अमेरिका को सुझाव दे सकता है. एक-दूसरे देशों में मेडिकल टीम और मेडिकल किट्स भेजी सकती हैं. बदकिस्मती से ऐसा नहीं किया जा रहा है.

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युवाल 2014 में आये इबोला संकट का उदाहरण दिया. उन्होंने कहा कि इबोला के वक्त अमेरिका ने आगे आकर लीड किया और उसमें जल्दी ही सफलता भी मिली. इससे पहले 2008 की आर्थिक मंदी में भी अमेरिका ने लीड किया, लेकिन आज जब पूरी दुनिया कोरोना से जूझ रहा है तो कोई ग्लोबल ताकत इससे लड़ने के लिये नेतृत्व करती नजर नहीं आ रही है.

युवाल हरारी अमेरिका के रुख पर भी नाराज दिखे. उन्होंने कहा कि आज अमेरिका ने कह दिया कि वो सिर्फ अपनी केयर करते हैं यानी अमेरिका फर्स्ट है.

युवाल ने कहा कि इससे भी बड़ी चिंता की बात ये है कि एक-दूसरे पर वायरस फैलाने के आरोप लगाये जा रहे हैं. उन्होंने कहा कि वायरस से हम डील कर सकते हैं, लेकिन मनुष्य के बीच जो नफरत देखी जा रही है वो मुश्किल है. लोग महामारी के लिए एक दूसरे को ब्लेम कर रहे हैं. अमेरिका, चीन पर आरोप लगा रहा है, चीन अमेरिका पर ठीकरा फोड़ रहा है, भारत में मुस्लिमों को वायरस फैलाने के लिये बदनाम किया जा रहा है. हालांकि, प्रोफेसर युवाल ने मेडिकल इक्विपमेंट्स शेयर करने के लिये चीन की तारीफ की लेकिन कहा कि सहयोग न करने का काम जो रहा है वो दुर्भाग्यपूर्ण है. ऐसे में नफरत की जगह इस संकट से निपटने पर फोकस करने की जरूरत है.

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आर्थिक संकट पर क्या बोले प्रोफेसर युवाल

प्रोफेसर युवाल हरारी ने कोरोना महामारी के बीच आर्थिक संकट पर भी अपनी राय दी. उन्होंने कहा कि आर्थिक चुनौतियों से निपटना एक मुश्किल काम है. अमेरिका के पास इमरजेंसी बजट है. लेकिन भारत समेत तमात देशों के पास ऐसे बजट नहीं है. इसके अलावा उन्होंने ये भी कहा कि लोकतंत्र में सरकार जनता की निगरानी करे और जनता सरकार की निगरानी करे. आजकल सरकार पानी की तरह पैसे बहा रही है, ऐसे में नागरिकों को ये सवाल भी करने चाहिएं कि ये पैसा कहां जा रहा है.

साथ ही प्रोफेसल युवाल ने ये भी कहा कि अगर हर देश वैक्सीन बनाने में लग जाये तो इससे काम नहीं चलेगा. कोई देश वैक्सीन बनाये और फिर उसे सारे देश खरीदें. ऐसे ही आर्थिक दिशा में भी एक-दूसरे का साथ दें. बॉर्डर बंद करके या फ्लाइट्स रोककर महामारी से नहीं निपटा जा सकता है. आइसोलेशन नहीं, को-ऑपरेशन सबसे जरूरी है. अगर देशों के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान बंद हो जाये तो महामारी से लड़ना मुश्किल हो जाएगा, साथ ही आर्थिक चुनौतियां भी बढ़ जाएंगी.

युवाल हरारी ने चीन का अपवाद बताते हुए कहा कि जिन देशों में तानाशाही है, उनसे ज्यादा बेहतर तरीके से लोकतांत्रिक देशों ने कोरोना के खिलाफ कदम उठाये हैं. प्रोफेसर ने कहा कि लोकतंत्र में सरकारें नागरिकों के साथ सच्ची जानकारी साझा करें और भरोसा कायम करें ताकि महामारी से निपटने में आसानी हो.

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धर्म और कोरोना

प्रोफेसर युवाल ने कहा कि धर्म या धार्मिक नेता कोरोना का इलाज नहीं कर सकते हैं, बल्कि साइंटिस्ट ही इससे बचा सकते हैं. उन्होंने इजरायल का एक उदाहरण दिया. प्रोफेसर युवाल ने बताया जब कोरोना की शुरुआत हुई तो इजरायल में चुनाव के दौरान धार्मिक पार्टी के एक नेता ने जनता से कहा कि आप हमें वोट दीजिये, आपको कोरोना से बचाएंगे. लेकिन दिलचस्प बात ये है कि उस पार्टी के नेता जो कि इजरायल के हेल्थ मिनिस्टर भी थे वो कोरोना संक्रमित हो गये.

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