
कोरोना की दूसरी लहर में आंशिक और वीकेंड लॉकडाउन की वजह से पंजाब और हिमाचल प्रदेश से प्रवासी मजदूर वर्ग का फिर से पलायन शुरू हो गया है. इस वजह से औद्योगिक सेक्टर में मजदूरों की किल्लत महसूस की जाने लगी है. इस स्थिति से साफ है न तो राज्य सरकारों ने और न ही यहां औद्योगिक सेक्टर से जुड़े नियोक्ताओं ने कोरोना की पहली लहर में पिछले साल बड़े पैमाने पर हुए मजदूरों के पलायन से कोई सबक सीखा है.
पंजाब से मजदूरों का अपने गृह राज्यों को लौटना जारी है. उन्हें डर है कि किसी भी वक्त पूर्ण लॉकडाउन का ऐलान हो सकता है. ठेका प्रथा पर मजदूरी करने वाले खास तौर पर आशंकित हैं. पंजाब में आंशिक लॉकडाउन के बावजूद रेलवे स्टेशनों और बस स्टेशनों पर काफी हलचल देखी जा सकती है.
कृषि क्षेत्र के साथ-साथ निर्माण और अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में भी दूसरे राज्यों से बड़ी संख्या में मजदूर पंजाब का रुख करते हैं. उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के गांवों से आए इन मजदूरों ने एक बार फिर अपने घरों को लौटना शुरू कर दिया है.
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इन लोगों के जेहन में अब भी पिछले साल के लॉकडाउन की कड़वी यादें बाकी हैं. इनके लिए कोरोना की दूसरी लहर के दौरान राहत की बात ये है कि अभी राज्यों के बीच बस-ट्रेनों का संचालन बंद नहीं हुआ है. राज्य सरकारों की ओर से जिला प्रशासनों को ये निर्देश हैं कि मजदूरों के लिए खाने और रहने की जगह के समुचित प्रबंध किए जाएं, जिससे कि वो अपने गृह राज्यों की ओर न लौटें. लेकिन ये निर्देश कागज पर ही सीमित नजर आते हैं. मजदूरों तक हकीकत में इसका लाभ पहुंचता नजर नहीं आता. दर्जनों मजदूर पंजाब और हरियाणा से चार्टर्ड बसों में भी घरों को लौटते दिख रहे हैं.
यूपी के बाराबंकी से रोजगार की तलाश में आए अमन कुमार शर्मा हिमाचल प्रदेश के बद्दी में औद्योगिक यूनिट में काम करते हैं. अमन कहते हैं, “पिछले 15 दिन से हमने कुछ भी नहीं कमाया. लॉकडाउन आंशिक होने के बावजूद रहने की जगह का किराया देना पड़ता है, राशन पर पैसे खर्च करने पड़ते हैं. हम ठेकेदार के जरिए यहां काम पर आए हैं. उसी ने हमें बताया कि अभी कोई काम नहीं है. इसके बाद ही हमने घर लौटने का फैसला किया.”
अमन के साथ ही बाराबंकी से आए सीताराम गुप्ता भी उसी औद्योगिक यूनिट में काम करते हैं. सीताराम गुप्ता ने आजतक को बताया, "हम अपने गांव जा रहे हैं जहां हमें किसी को किराए जैसा भुगतान नहीं करना होगा. हमें वहां खाने की भी परेशानी नहीं होगी. यहां रहेंगे तो हमें हर बात के लिए मशक्कत करनी पड़ेगी.”
बद्दी औद्योगिक यूनिट में ही चमन कुमार भी काम करते हैं. चमन के मुताबिक प्रशासन की ओर से उनके रहने या खाने की कोई व्यवस्था नहीं की गई. ऐसे में गांव में हमारे घरवालों ने वापस आने के लिए कहा.
बिहार के मधेपुरा के मूल रूप से रहने वाले पप्पू कुमार पिछले 22 साल से जालंधर में मिस्त्री का काम कर रहे हैं. उन्होंने जब तक हालात सामान्य नहीं हो जाते, गांव में अपने घर पर रहने का ही फैसला किया है. पप्पू कुमार कहते हैं, “हम वापस लौट रहे हैं क्योंकि यहां बहुत सारी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. जब हम काम के लिए निकलते हैं तो पुलिसवाले तरह तरह के सवाल करना शुरू कर देते हैं. दुकानें सिर्फ 3 बजे तक खुलती हैं. हम सरकार से आग्रह करते हैं कि हमें काम करने की इजाजत दी जाए.”
खगड़िया, बिहार के रहने वाले लालकुंज शर्मा कपूरथला की अनाज मंडी में मजदूरी करते हैं. कोविड बंदिशों की वजह से इस सीजन में उन्हें बहुत कम ही काम मिला. एक तरफ मजदूरों का पलायन जारी है, वहीं पंजाब के उद्योगपतियों को मजदूर न मिलने से नुकसान की आशंका सता रही है. पंजाब में आंशिक लॉकडाउन और दिल्ली में एक पखवाड़े के पूर्ण लॉकडाउन ने उत्तर भारत में औद्योगिक गतिविधियों पर बुरा असर डाला है.
जालंधर और लुधियाना के उद्योगपति दावा करते हैं कि वे मजदूरों को रोकने के लिए लॉकडाउन के बावजूद उन्हें काम दे रहे हैं, लेकिन वो अनिश्चितता की वजह से यहां नहीं रुकना चाहते. जालंधर स्थित खेल का सामान बनाने वाले अनुराग कहते हैं कि कच्चे माल के उपलब्ध न होने और मजदूरों की कमी से उत्पादन पर बुरा असर पड़ा है. अनुराग कहते हैं, “सरकार ने दुकानें सुबह 9 बजे से दोपहर बाद 3 बजे तक खोलने की ही इजाजत दी है, लेकिन ग्राहक न के बराबर हैं. इसके अलावा दिल्ली में पूर्ण लॉकडाउन की वजह से कच्चा माल मिलने में भी दिक्कत हो रही है.”
अनुराग के मुताबिक अप्रैल और जून के बीच स्पोर्ट्स इंडस्ट्री में काफी हलचल रहती थी और खूब ऑर्डर रहते थे, लेकिन इस बार सब ठंडा पड़ा है. खेल के सामान के उत्पादकों को ये भी चिंता है कि कच्चा माल न मिलने और मजदूरों की कमी से उन्हें बड़ा नुकसान सहना पड़ेगा.
जालंधर इंडस्ट्रीज के जनरल सेक्रेटरी विपन परिंजा ने कहा कि कोरोना की दूसरी लहर में औद्योगिक उत्पादन काफी प्रभावित हुआ है. परिंजा कहते हैं, “चाहे खेल उद्योग हो, हाथ के औजार हों या अन्य यूनिट्स, असर साफ दिख रहा है. इससे लगता है कि सरकार ने पिछले साल से कोई सबक नहीं लिया.
लॉकडाउन चाहे आंशिक है लेकिन मजदूरों ने अपने गांवों की ओर लौटना शुरू कर दिया है. हम उम्मीद करते हैं कि वे काम पर लौट आएंगे लेकिन इसमें वक्त लगेगा. एक अनुमान के मुताबिक उत्तर भारत में औद्योगिक इकाइयों में 30 से 40 फीसदी तक मजदूरों की कमी महसूस की जा रही है.
पंजाब में मजदूरों को एक ही अच्छी बात दिख रही है कि पंजाब सरकार ने कहा है कि वो कोविड-19 वैक्सीनेशन के तीसरे चरण में मजदूरों का प्राथमिकता के आधार पर वैक्सीनेशन कराएगी. मजदूरों का कहना है कि इसके अलावा उनके लिए और कोई राहत का एलान नहीं किया गया है.