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घंटों मलबे में दबी रही मासूम, हाथों से खुदाई कर बाहर निकाला

सीरिया से आई करिश्मे की नई तस्वीर. मलबे से बाहर निकली दो साल की बच्ची. बम धमाके में जमींदोज हुआ था मकान. आसमान से बरसे बम ने घर को कब्र बना दिया. कब्र में तब्दील घर के अंदर एक बच्ची घंटों घुटती रही.

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वारदात
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सीरिया से आई करिश्मे की नई तस्वीर. मलबे से बाहर निकली दो साल की बच्ची. बम धमाके में जमींदोज हुआ था मकान. आसमान से बरसे बम ने घर को कब्र बना दिया. कब्र में तब्दील घर के अंदर एक बच्ची घंटों घुटती रही.

तभी कुछ लोगों के कानों में इस बच्चे को रोने की आवाज पड़ी. इसके बाद जो करिश्मा हुआ वो हैरान कर देने वाला था. ये घटना बगदादी के इलाके सीरिया की है.

मलबे से निकली 2 साल की बच्ची
आसमान से उतरी इंसानी आफत में घर कब्र में तब्दील हो चुका था. पर तभी कब्र बन चुके घर के एक हिस्से से एक बच्चे के रोने की आवाज आती है. आवाज के हिस्से की खुदाई की जाती है. वो भी हाथों से. ताकि उस बच्चे को चोट ना लग जा. और फिर कुदरत अपना करिश्मा कुछ इस तरह दिखाता है कि मलबे से बाहर निकलती है 2 साल की बच्ची. कई टन मलबे के नीचे औंधे मुंह फंसी थी मासूम.

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आईएसआईएस और विरोधी गुटों को सबक सिखाने के लिए शहर के ऊपर दिन-रात उड़ान भरते फाइटर जेट्स कब, कहां और किसके सिर पर बम बरसा दें ये कोई नहीं जानता, और सबसे बड़ी मुश्किल ये है कि बम बेगुनाह और गुनहगारों का फर्क करना भी नहीं जानते.

मलबे में से आई रोने की आवाज
ऐसे में बमबारी से जमींदोज एक मकान के मलबे से लोगों को अचानक किसी बच्ची के रोने की आवाज सुनाई देती है. ईंट, कंक्रीट और सरियों के सैकड़ों टन मलबे के नीचे से ऐसी किसी आवाज का सुनाई देना भी अपने-आप में किसी करिश्मे से कम नहीं. लिहाज़ा, लोग बगैर देर किए उस मासूम आवाज का पीछा करना शुरू कर देते हैं. ये आवाज कभी तेज होती है और कभी बिल्कुल बंद हो जाती है. लेकिन यहां सवाल एक जिंदगी का है, लिहाजा लोग देर नहीं करते और ठीक उसी जगह हाथों से खुदाई शुरू कर देते हैं, जहां से ये रोने की आवाज आ रही है.

हाथों से खुदाई कर बच्ची को बाहर निकाला
सच्चाई तो ये है कि ऊपर से देख कर सही-सही अंदाजा लगाना भी बेहद मुश्किल था कि वो बच्ची मलबे के ढेर में ठीक किस जगह पर हो सकती है. लेकिन फिर कोशिश जारी रहती है. और एक साथ कई जोड़े हाथ रेत और मिट्टी के साथ-साथ कंक्रीट के भारी-भरकम टुकड़ों को हटाने लगते हैं. और ठीक एक मिनट और चालीस सेकेंड के बाद एक दूसरा करिश्मा होता है. पहली बार मलबे के नीचे से बच्ची का हाथ दिखाई देती है. बच्ची औंधे मुंह पड़ी है और धूल-मिट्टी के बीच इस कदर फंसी है कि उसके लिए हिलना-डुलना तो दूर सांस भी लेना मुश्किल है. लेकिन ये शायद ऊपरवाले की ही मर्जी है कि इतने मुश्किल हालात में फंसी होने के बावजूद उसके रोने की आवाज मलबे से बाहर लोगों को सुनाई दे रही थी.

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धूल से भरी हुई बच्ची निकली बाहर
अब खुदाई और तेज हो जाती है और फिर देखते ही देखते हाथ के साथ-साथ बच्ची का सिर और जिस्म के दूसरे हिस्से भी नजर आने लगते हैं. लोगों की कोशिश है कि किसी तरह बच्ची को खींच कर सीधा बिठा लिया जाए, ताकि वो खुल कर सांस ले सके, क्योंकि मलबे में फंसी बच्ची के आंख, नाक, मुंह, कान हर जगह धूल ही धूल भर चुका है. लोग जल्द ही बच्ची को सीधा बिठाने में कामयाब हो जाते हैं. लेकिन हाथ आजाद होते ही वो दोनों हाथों से बेसाख्ता अपनी आंखें मलने लगती है. जाहिर है, उसे सबसे ज्यादा तकलीफ आंखों में भरे रेत की वजह से है.

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