अफगानिस्तान अब तालिबान का हो चुका है. लेकिन आने वाले वक्त में अफगानिस्तान की सूरत क्या होगी? नई सरकार की सीरत क्या होगी? तालिबान के वो कौन कौन से चेहरे हैं, तालिबान को वो कौन कौन से सरदार हैं? जो अफगानिस्तान की नई सरकार बनाएंगे. आइए आपको बताते हैं, उन पांच चेहरों के बारे में, जो आने वाले वक्त में अफगानिस्तान पर हुकूमत करेंगे.
काबुल में मौजूद है अफगानिस्तान का प्रेसिडेंट पैलेस. उसी पैलेस से अफगानिस्तान की हुकूमत चलती है. बीते रविवार की दोपहर तक उस प्रेसिडेंट पैलेस में राष्ट्रपति अशरफ गनी बैठा करते थे. लेकिन अशरफ गनी पर तालिबान की ऐसी दहशत छाई कि वो काबुल में तालिबान के दाखिल होने से पहले ही अपने पूरे परिवार के साथ प्रेसिडेंट पैलेस और काबुल को छोड़ कर विदेश भाग गए.
अब तालिबान प्रेसिंडेट पैलेस का रुख किया. तालिबान ने वहां कब्ज़ा कर लिया. आलीशान पैलेस देखकर दूर दराज़ के कबीले से आए तालिबान लड़ाके भौंचक्के रह गए. लिहाज़ा अंदर घुस कर वो यहां हर चीज़ और हर पल के मज़े ले रहे थे. अब प्रेसिडेंट पैलेस में तालिबान का वो नेता बैठेगा, जो अफ़गानिस्तान का नया हुक्मरान होगा. पर कौन होगा वो? सत्तर हज़ार तालिबानी लड़ाकों का वो कौन सरदार है, जिसकी एक आवाज़ पर तालिबान लड़ाके उसका हुक्म बजाएंगे? और सबसे बड़ा सवाल ये कि हथियारों के दम पर अब तक जीत हासिल करनेवाले तालिबानी लड़ाके क्या अपने नेता के कहने पर हथियार छोड़ कर अफगानिस्तान को एक शांतिपूर्ण सरकार दे पाएंगे?
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तालिबान के पांच सरदार
हम आपको तालिबान के उन पांच सबसे ताक़तवर नेताओं से रू-ब-रू कराते हैं, जो अब अफगानिस्तान के हाकिम और हुक्मरान होंगे. इनमें सबसे पहला नाम मुल्ला अब्दुल गनी बरादर का है. दूसरा नाम है हिब्तुल्लाह अख़ुंदज़ादा. तीसरा नाम है मुल्ला मोहम्मद याकूब का. चौथा नाम है सिराजुद्दीन हक्कानी और पांचवां नाम है शेर मोहम्मद अब्बास स्तानिकजई का. यही वो पांच चेहरे हैं, जिनके इर्द-गिर्द आनेवाले वक़्त में तालिबान की नई सरकार होगी. यही वो पांच चेहरे हैं, जो बरसों से अफ़ग़ान में तालिबान को सींच रहे हैं. यही वो पांच चेहरे हैं, जिनका असर तालिबान के लड़ाकों पर सबसे गहरा और ज़्यादा है. इन्हीं के हाथों में अब अफगानिस्तान की क़िस्मत है.
मुल्ला अब्दुल ग़नी बरादर
अपनी पहचान और प्रोफ़ाइल से अलग चेहरे मोहरे से काफी शांत और सुलझे हुआ लगनेवाला मुल्ला अब्दुल गनी बरादर इस वक़्त तालिबान के टॉप कमांडरों में से एक है. टॉप कमांडर बोले तो वो शख़्स जो तालिबान के लिए तमाम नीतिगत फ़ैसलों के साथ-साथ अपने संगठन के लिए तमाम 'डूज़ और डोंट्स' का फैसला करता है. मुल्ला बरादर का जन्म साल 1968 में अफग़ानिस्तान के उरुजगान सूबे में हुआ था. तालिबान के सबसे बड़े नेता और संस्थापक मुल्ला उमर के दामाद मुल्ला बरादर के बारे में कहा जाता है कि वो पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई का खास आदमी है. तालिबान के को-फाउंडर मुल्ला बरादर को अमेरिकी दबाव में साल 2010 में कराची से आईएसआई ने गिरफ्तार किया था. इसके बाद वो पूरे 8 साल तक जेल में रहा और अमेरिका के कहने पर ही पाकिस्तान ने उसे आज़ाद भी कर दिया.
80 के दशक में बरादर ने सोवियत सेना के खिलाफ अफगान मुजाहिदीन के तौर पर लड़ाई लड़ी और यहीं से उसका तालिबानी करियर शुरू हुआ. 1992 में रूस के बाहर निकलने के बाद अफगानिस्तान में अलग-अलग गुटों के बीच गृहयुद्ध की शुरुआत हो गई और तब बरादर ने अपने पूर्व कमांडर और ससुर मोहम्मद उमर के साथ मिल कर कंधार में एक मदरसे की शुरुआत की. फिर 1994 में दोनों ने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर यहीं तालिबान की नींव रखी. पाकिस्तान शुरू से ही तालिबान का मददगार रहा है. 1996 में तालिबान ने एक के बाद एक अफग़ानी इलाकों को कब्ज़ाना शुरू किया और फिर आखिरकार ये सिलसिला अफ़गानिस्तान की सत्ता पर क़ब्ज़ा करने पर जाकर ख़त्म हुआ.
उस दौरान बरादर को कई अहम ज़िम्मेदारियां दी गईं. वो तालिबान का उप रक्षा मंत्री तो था ही, वो कई प्रशासनिक पदों पर भी काबिज़ था. लेकिन जब बीस साल पहले अमेरिका ने तालिबान के खिलाफ़ अपने अभियान की शुरुआत की, तो फिर मुल्ला बरादर को दर-बदर होना पड़ा गया था. लेकिन चंद रोज़ पहले जैसे ही अमेरिका ने अफ़गानिस्तान से अपनी फ़ौज की वापसी का ऐलान किया, मुल्ला बरादर ने फिर से अपने लड़ाकों को बटोर कर काबुल पर कब्ज़े की रणनीति बनाई और कामयाब भी हो गया. इस दौरान वो खुद ही दोहा में बैठ कर बातचीत के रास्ते अफगानिस्तान की अशरफ गनी सरकार पर दबाव भी बनाता रहा. रविवार को ही बरादर ने काबुल में एंट्री ली, साथ ये भी कहा कि उसे भी इस बात का अहसास नहीं था कि वो इतनी जल्दी काबुल फतह कर लेगा, लेकिन ऊपरवाला उसके साथ था.
हिब्तुल्ला अखुंदज़ादा
तालिबान की मौजूदा कमान फिलहाल हिबतुल्लाह अखुंदजादा के पास ही है. वो तालिबान का सुप्रीम नेता है. साल 2016 में जब अमेरिकी ड्रोन हमले में तालिबान का तत्कालीन सरगना मुल्ला मंसूर अख्तर मारा गया, तो ये अखुंदजादा ही था, जिसने तालिबान की कमान संभाली. पहले वो एक छोटा सा मजहबी नेता हुआ करता था. लेकिन तालिबान की सत्ता हासिल करते ही इसने ग़ज़ब की लीडरशिप दिखाई. उसने बिखरे तालिबानी लड़ाकों को एक किया और अपनी बातों से उनमें जोश भरता रहा. मुल्ला उमर की मौत की बात जब तालिबानी लड़ाकों को पता चली थी कि संगठन में काफी उठापटक शुरू हो गई. लेकिन अखुंदजादा ने अपनी लीडरशिप से उन्हें टूटने से बचा लिया. इसके बाद वो वक़्त-वक़्त पर अफग़ानी फ़ौज से तो भिड़ता ही रहा, उसने अपनी सलाहियत के दम पर अफगान सेना के कई कमांडरों को अपने साथ मिला लिया.
चूंकि हिब्तुल्लाह अखुंदज़ादा की पहचान एक मजहबी नेता की रही है, उसकी अपील का तालिबानी लड़ाकों पर गहरा असर होता है. तालिबानी उसका अदब-ओ-एहतराम करते हैं. तालिबान चीफ बनने के बाद अखुंदजादा ने अल कायदा प्रमुख अयमान अल जवाहिरी की सरपरस्ती और वफादारी हासिल की और उसे 'वफादारों का अमीर' कह कर नवाज़ने की कोशिश की. इसका अखुंदज़ादा को दोहरा फायदा मिला. आतंकियों की नज़र में उसकी शख्सियत और बड़ी हो गई. अब भी तालिबान के राजनीतिक, धार्मिक और लड़ाई के मामलों पर आख़िरी फैसला अखुंदजादा ही करता है. वो पर्व त्योहारों के मौके पर मजहबी तकरीरें भी करता है.
मुल्ला मोहम्मद याकूब
क़रीब 35 साल का मुल्ला याकूब, तालिबान की नींव रखनेवाले मुल्ला उमर का बेटा है. याकूब के बारे में कहते हैं कि वो अपने संगठन के तमाम सैन्य गतिविधियों का सिरमौर है. एक तरह से उसे आप तालिबान का आर्मी कमांडर भी कह सकते हैं. अलग अलग खुफिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि मुल्ला मोहम्मद याकूब ही अफगानिस्तान में तालिबान के हर ऑपरेशन को अंजाम देता है और उसी की इजाजत से तालिबान हर कदम उठाता है. रिपोर्ट के मुताबिक तालिबान पर मुल्ला मोहम्मद याकूब का पूरा कंट्रोल है और 2016 में मुल्ला मोहम्मद याकूब की जगह अखुनज़ादा को सिर्फ इसलिए चुना गया था, क्योंकि मुल्ला मोहम्मद याकूब के पास उन दिनों तजुर्बे की कमी थी. बताया जा रहा है कि अभी मुल्ला मोहम्मद याकूब की उम्र करीब 35 साल है और वही तालिबान का असली उत्तराधिकारी है. मुल्ला मोहम्मद याकूब के बारे में कहते हैं वो बहुत ज्यादा बेरहम है. तालिबान के लड़ाके सालों-साल उसी के ईशारे पर या फिर यूं कहें कि उसकी देखा-देखी बेगुनाह और मज़लूम लोगों पर जुल्म ढाते रहे हैं.
सिराजुद्दीन हक्कानी
तालिबान के टॉप कमांडरों में से एक रहे जलालुद्दीन हक्कानी का बेटा सिराजुद्दीन हक्कानी इन दिनों तालिबान के बड़े नेताओं में शुमार है. वही हक्कानी नेटवर्क चलाता है, जो तालिबान का एक सहयोगी संगठन है. ये संगठन पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा पर तालिबान की वित्तीय और सैन्य संपत्ति की देखरेख करता है. यानी हक्कानी नेटवर्क पर तालिबान के लिए संसाधनों का इंतज़ाम करने की ज़िम्मेदारी भी है. तालिबान की तरह इसे भी पाकिस्तान से भरपूर मदद मिलती है. यहां तक कि हक्कानी नेटवर्क के आतंकियों को पाकिस्तान की फ़ौज ही ट्रेनिंग देती है. 48 साल का सिराजुद्दीन हक्कानी कितना बड़ा आतंकवादी है, इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि इसके ऊपर एक करोड़ अमेरिकी डॉलर यानी करीब 70 करोड़ रुपये का इनाम है. सिराजुद्दीन को फियादीन हमलों का उस्ताद भी माना जाता है. आतंकियों को ऐसे हमलों के लिए तैयार करने से लेकर उन्हें एक्जीक्यूट करने तक में वो उस्ताद माना जाता है. उस पर बड़े अफगान अफ़सरों के कत्ल से लेकर फिरौती के लिए विदेशी नागरिकों को अगवा करने के आरोप भी लगते रहे हैं.
शेर मोहम्मद स्तानिकजई
स्तानिकजई तालिबान का एक बड़ा नेता होने के साथ-साथ संगठन का वो चेहरा है, जो अक्सर तालिबान की ओर से होनेवाले बातचीत में शामिल रहता है. साल 2001 में जब तालिबान के हाथ से सत्ता फिसली स्तानिकज़ई ने देश छोड़ दिया और दोहा में रहने लगा. कट्टर धार्मिक नेता स्तानिकज़ई को 2015 में दोहा में मौजूद तालिबान के सियासी दफ्तर का मुखिया बनाया गया. वो अमेरिका के साथ हुए शांति समझौते में भी शामिल था और कई देशों में तालिबान की नुमाइंदगी करता रहा. स्तानिकज़ई के बारे में कहते हैं कि उसने 70 के दशक में अफगान सैनिकों के साथ देहरादून में इंडियन मिलिट्री एकेडमी (आईएमए) से ट्रेनिंग ली थी. 1963 में अफगानिस्तान के लोगार सूबे में पैदा हुए स्तानिकजई के काफी पढ़ा लिखा होने की वजह से अपने संगठन में अलग ही इज्जत है. वो पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई से भी जुड़ा रहा है. ऐसे में तालिबान की सरकार में उसे भारी भरकम पोर्टफोलियो का मिलना तय है.