अफगानिस्तान पर अब भीषण आर्थिक संकट के बादल मंडरा रहे हैं. तालिबान के कब्जा करते ही ज़्यादातर देशों ने अफगानिस्तान से दूरी बना ली है. अमेरिका समेत तमाम एजेंसियों ने अफगानिस्तान के फंडिंग पर रोक लगा दी है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस तालिबान की वजह से अफगानिस्तान इतनी बड़ी मुसीबत में है, खुद वो तालिबान कितना अमीर है? तो सुनिए, तालिबान इस दुनिया का पांचवां सबसे अमीर आतंकी संगठन है और शरिया कानून की बात करनेवाले इस तालिबान की नाजायज़ कमाई का लगभग 60 फीसदी हिस्सा ड्रग्स के कारोबार से आता है. वो ड्रग्स, जिसकी तस्करी की सज़ा कई मुल्कों में शरिया कानून के मुताबिक सिर्फ मौत है.
बंदूक के दम पर अफगानिस्तान में शरिया कानून लाने पर आमादा तालिबान की करतूतों से पूरी दुनिया हैरान है. तालिबान ने जिस तरह से अफगानिस्तान की सत्ता हथियाई, उसे किसी भी नज़रिए से व्यवहारिक और तर्क संगत नहीं कहा जा सकता. ख़ुद अफगानिस्तान के आम लोगों ने तो ख़ैर तालिबान की मुखालफत शुरू कर ही दी है. दुनिया के ज़्यादातर देशों ने तालिबान को मान्यता नहीं दी है. अमेरिका समेत कई एजेंसियों ने अफगानिस्तान के अरबों डॉलर के फंड पर भी रोक लगा दी है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर तालिबान अपनी सरकार और अपनी इकोनॉमी चलाएगा कैसे?
अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था पहले ही बड़ी मुसीबत में है. अफगानिस्तान की जीडीपी महज 19.8 अरब डॉलर है और वो लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र संघ की उस सूची में शामिल है, जिन देशों में विकास की रफ्तार सबसे धीमी है. वर्ल्ड बैंक के मुताबिक अफगानिस्तान का करीब 75 फीसदी सरकारी बजट अंतरराष्ट्रीय दानदाताओं यानी इंटरनेशनल डोनर्स से मिलता है और अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के बाद उसे ऐसी मदद मिलने की उम्मीद भी तकरीबन ख़त्म हो गई है. अमेरिका ने अपने यहां अफगानिस्तान के केंद्रीय बैंक की तरफ़ से जमा कराए गए 9.5 अरब डॉलर के फंड और एसेट को फ्रीज़ कर दिया है.
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ऐसे में सत्ता में होने के बावजूद इस रकम से तालिबान के हाथ दूर ही रहनेवाले हैं. यानी आनेवाले दिनों में पूरे अफगानिस्तान पर भीषण आर्थिक संकट छानेवाला है. सवाल ये है कि आख़िर तालिबान के पास इसका तोड़ क्या है? अफ़गानिस्तान की अर्थव्यवस्था करीब 20 साल के गृहयुद्ध से पहले ही जर्जर हो चुकी थी. इसके बाद 20 सालों तक देश में लोकतंत्र रहा और इसमें कुछ सुधार भी हुआ. लेकिन अब फिर से तालिबान के आने से मामला घूम-फिरकर 360 डिग्री पर आ टिका है.
लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि जिस तालिबान की वजह से अफगानिस्तान पर आर्थिक संकट छाया है और जिस तालिबान की वजह से दुनिया के तमाम देशों ने अफगानिस्तान से दूरी बना ली है, खुद वही तालिबान दुनिया का पांचवां सबसे अमीर आतंकी संगठन है. और इससे भी ज़्यादा हैरानी की बात ये है कि जो तालिबान शरिया क़ानून और इस्लाम की दुहाई देता नहीं थकता, खुद उसी तालिबान की कमाई नशे की तस्करी और नाजायज़ खुदाई यानी इल्लीगल माइनिंग पर टिकी है.
अफगानिस्तान दुनिया का सबसे बड़ा अफीम निर्यातक देश है. अनुमानों के मुताबिक अफगानिस्तान से हर साल डेढ़ से तीन अरब डॉलर यानी लगभग 11 से 22 हज़ार करोड़ रुपये की अफीम निर्यात की जाती है. और इसी अफीम की खेती पर अफगानिस्तान की सरकार के मुकाबले तालिबान का कंट्रोल ज़्यादा रहा है. वो अफ़ीम के कारोबार पर टैक्स लगा कर खूब चांदी कूटता रहा है. तालिबान सबसे पहले तो अफीम उगाने वाले किसानों पर 10 फीसदी टैक्स लगाता है. फिर इस अफीम को हेरोइन में बदलने वालों पर भी टैक्स लगता है. और फिर आखिर में इस हेरोइन का बिजनेस करने वालों को भी टैक्स देना पड़ता है. और इस पूरे सिस्टम से तालिबान को सालाना 100 मिलियन डॉलर से 400 मिलियन डॉलर यानी लगभग 700 से 2900 करोड़ रुपये की कमाई होती है.
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अमेरिकन आर्मी की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि तालिबान की कमाई का 60 फीसदी हिस्सा अफीम को हेरोइन में बदलने वाली लैब्स से आता है. इस रिपोर्ट के बाद अमेरिकी फ़ौज ने इन लैब्स पर ताबड़तोड़ एयरस्ट्राइक भी की थी, ताकि तालिबान की कमर तोड़ी जा सके. लेकिन ये लैब आनन-फानन में बनाए जानेवाले लैब थे, जिन्हें तालिबान ने ही फ़ौरन ही फिर से खड़ा कर लिया. तालिबान पर औरों को नसीहत खुद मियां फजीहत वाली कहावत बिल्कुल फिट बैठती है. क्योंकि तालिबान एक तरफ़ खुद तो सबसे बड़ा मुसलमान साबित करने पर तुला रहता है. इस्लामिक शरिया क़ानूनों की बात करता है. लोगों को मामूली गुनाहों पर भी बर्बर तरीक़े की सज़ा देता है, लेकिन खुद खुलेआम नशे का कारोबार करता है.
अब आइए, इसी बहाने ये जान लेते हैं कि दुनिया के कुछ अहम मुस्लिम देशों में ड्रग्स के इस्तेमाल और तस्करी को लेकर क़ानून क्या कहता है? ईरान एक सख्त क़ानूनों वाला देश है और नशे की तस्करी जैसे जुर्म में भी यहां सख्त सज़ा का प्रावधान है. ड्रग्स के साथ पकड़े जाने पर यहां भारी जुर्माने के साथ-साथ मौत की सज़ा दी जाती है. इसी तरह सऊदी अरब में नशे की तस्करी करने की सज़ा मौत है. किसी से पास से शराब या ड्रग्स बरामद होने पर उसे कोड़े मारने से लेकर, जुर्माने और यहां तक कि मौत की सज़ा भी दी जाती है. ऐसे ही मलेशिया में भी ड्रग्स बेचनेवाले को मौत की सज़ा दी जाती है. किसी के पास से ड्रग्स बरामद होने पर उसे जेल भी भेजा जा सकता है और उसके देश में डिपोर्ट भी किया जा सकता है.
ड्रग्स की तस्करी के अलावा खनिज की नाजायज़ खुदाई भी तालिबान की कमाई का एक बड़ा ज़रिया है. अफगानिस्तान में खनिजों की भरमार है. अफगानिस्तान में खनिज क्षेत्र की कीमत लगभग एक अरब डॉलर आंकी गई है. हालांकि ज्यादातर इलाके में इल्लीगल माइनिंग होती है और तालिबान इसका फायदा उठाता है.
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संयुक्त राष्ट्र की एनालिटिकल सपोर्ट एंड सैंक्सन्स मॉनीटरिंग रिपोर्ट, 2014 के मुताबिक तालिबान ने दक्षिणी हेलमंद में चलने वाले 25 से 30 गैरकानूनी माइनिंग ऑपरेशन के जरिए हर साल 10 मिलियन डॉलर यानी करीब 74 करोड़ रुपये की कमाई की. नाटो की रिपोर्ट के मुताबिक, पूरे देश में माइनिंग के जरिए तालिबान को हर साल लगभग 460 मिलियन डॉलर यानी करीब 3400 करोड़ रुपये की कमाई होती है. इसके अलावा यही रिपोर्ट बताती है कि निर्यात के जरिए भी तालिबान हर साल लगभग 240 मिलियन डॉलर यानी 1700 करोड़ रुपये की कमाई करता है.
यानी तालिबान अपने आप में तो एक अमीर आतंकी संगठन है. लेकिन अफगानिस्तान में उसके आने से भारी तंगी आनेवाली है. अमेरिका ने अफगानिस्तान जा रही नकदी के शिपमेंट पर भी रोक लगा दी है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भी एसडीआर और अन्य मौद्रिक संसाधनों तक तालिबान सरकार की पहुंच पर रोक लगा दी है. अफगानिस्तान के केंद्रीय बैंक DAB के गवर्नर अमजद अहमदी देश से भाग चुके हैं. अभी तक तालिबान सरकार को लेकर सिर्फ पाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, सऊदी अरब और चीन का ही रुख कुछ नरम है. जब तक ये देश तालिबान की नकदी के रूप में कोई मदद नहीं करते, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों की वजह से वहां की जनता को काफी परेशानी होने वाली है.
जाहिर है अब तालिबान पूरे देश से अंधाधुंध टैक्स वसूलने की तैयारी में है. वो सीमा व्यापार पर टैक्स लगाकर भी कमाई करनेवाला है. बैंकों और दूसरे वित्तीय संस्थाओं पर भी उसका कब्ज़ा होगा. देश में हवाला कारोबार में भी तेज़ी आएगी और तालिबान इससे भी टैक्स वसूलेगा. और इन सारी बातों का नकारात्मक असर वहां की आम जनता पर पड़ेगा. इसके अलावा तालिबान के हाथ अमेरिकी हथियारों और साजो-सामान का जखीरा लग गया है, जिनकी कीमत अरबों डॉलर में है. जरूरत पड़ने पर तालिबान इन्हें बेच कर भी अपनी तिजोरी भर सकता है.