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अफगानिस्तानः 19 साल 10 महीने 25 दिन बाद लौटी अमेरिकी फौज, अब तालिबान के सामने है ये चुनौती

अमेरिकी सैनिकों के जाने बाद का काबुल भी सहमा सा है. वहां दुकान बाज़ार पहले की तरह खुले तो हैं. मगर रौनक गायब है. लोगों की आमोदरफ़्त तो है, लेकिन महिलाओं का कहीं नामों-निशान तक नहीं है. गरज़ ये कि तालिबान ने अपने आने से पहले ही महिलाओं को अपने-अपने घरों से बाहर ना निकलने की खुली धमकी दे रखी है.

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अब तालिबानी सरकार की कमान मुल्ला बरादर के हाथों में होगी
अब तालिबानी सरकार की कमान मुल्ला बरादर के हाथों में होगी
स्टोरी हाइलाइट्स
  • अमेरिकी फौज की वापसी के बाद भी अफगान में फंसे हैं लोग
  • पीछे छूटे नागरिकों और मददगारों को करना होगा रेस्क्यू
  • तालिबान के शासन से खौफजदा हैं अफगानी नागरिक

अफग़ानिस्तान 31 अगस्त के बाद बदला-बदला सा नजर आ रहा है. जहां कबाड़ में तब्दील कई अमेरिकी हवाई जहाज़ और बेजान हथियारों के ढेर के सिवाय दूर-दूर तक अमेरिका का कोई नामोनिशान नहीं है. फिलहाल अगर यहां कुछ है, तो वो है तालिबानी नेताओं की सियासी सरगर्मी, लड़ाकों का जश्न और अफग़ानिस्तान में नए सिरे से शरिया कानून लाने की तालिबानी जद्दोजहद के बीच आम लोगों में पसरा ख़ौफ. 

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अमेरिकी सैनिकों के जाने बाद का काबुल भी सहमा सा है. वहां दुकान बाज़ार पहले की तरह खुले तो हैं. मगर रौनक गायब है. लोगों की आमोदरफ़्त तो है, लेकिन महिलाओं का कहीं नामों-निशान तक नहीं है. गरज़ ये कि तालिबान ने अपने आने से पहले ही महिलाओं को अपने-अपने घरों से बाहर ना निकलने की खुली धमकी दे रखी है. ज़ाहिर है तालिबान राज में अफग़ानिस्तान का मुस्तकबिल एक नई करवट लेने की तैयारी तो कर रहा है. लेकिन इसे लेकर आम अफग़ानियों में जो असमंजस और ख़ौफ के हालात हैं, उसे महसूस किया जा सकता है. संगीनों के साये में आम अफ़ग़ानियों की ज़िंदगी कैसी होगी, इसका अंदाज़ा लगाया जा सकता है. 

इधर, 19 साल 10 महीने और 25 दिन के बाद अमेरिका के आख़िरी सी-17 ग्लोबमास्टर विमान ने अमेरिकी फ़ौजियों के साथ अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन छोड़ी और उधर, इस्लामिक अमीरात ऑफ अफग़ानिस्तान की नई तालिबानी सरकार के लिए ज़मीन मानों पूरी तरह तैयार हो गई. 2001 के बाद ये पहला मौका है, जब काबुल की सड़कों पर एक भी अमेरिकी सैनिक मौजूद नहीं है. ये और बात है कि अब भी कई अमेरिकी नागरिक और ऐसे अफग़ान लोग अफ़ग़ानिस्तान में पीछे छूट गए हैं, जिन्हें अभी अफ़ग़ानिस्तान से बाहर निकलना है. या यूं कहें जिन्हें अमेरिका को अफग़ानिस्तान से रेसक्यू करना है. 

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क्योंकि इनमें ज़्यादातर वो लोग हैं, जो दो दशकों के अमेरिकी मिशन के दौरान अमेरिकी अफ़सरों और फ़ौजियों के साथ काम करते रहे. उन्हें लोकल सपोर्ट मुहैया कराते रहे. हालांकि दो दशकों की जंग के बाद अब ये पूरा का पूरा देश फिलहाल अमेरिकी फ़ौजियों से पूरी तरह खाली हो चुका है. 

अमेरिका की वापसी के 48 घंटे गुज़रते-गुज़रते तालिबान और अफ़ग़ानिस्तान के दूसरे नेताओं के बीच सरकार बनाने के फॉर्मूले पर अब रज़ामंदी हो गई है. ये साफ़ हो गया कि मुल्ला अब्दुल ग़नी बरादर ही तालिबान की नई सरकार का मुखिया होगा, वही मुल्ला बरादर जो ना सिर्फ़ तालिबान के फाउंडर मेंबर्स में से एक है, बल्कि जो रिश्ते में तालिबान की नींव रखनेवाले सबसे बड़े आतंकी मुल्ला उमर का दामाद भी है. इसके अलावा इन दिनों तालिबान का सुप्रीम कमांडर हैबतुल्लाह अखुंदज़ादा नई सरकार की गर्वनिंग काउंसिल का सुप्रीम होगा. यानी मुल्ला बरादर जहां तालिबान की नई सरकार का सबसे बड़ा चेहरा होगा, वहीं ये सरकार हैबतुल्लाह अखुंदज़ादा की सरपरस्ती में चलेगी. 

तालिबान के सांस्कृतिक आयोग के मेंबर बिलाल करीमी ने इस ख़बर पर मुहर लगाते हुए कहा कि तालिबानी नेताओं के अलावा पिछली सरकार के नेता और प्रभावशाली लोग भी नई सरकार और हिस्सा होंगे. जल्द ही देश चलाने के लिए एक कामकाजी कैबिनेट का ऐलान कर दिया जाएगा. हालांकि तालिबान के सामने चुनौतियों का पहाड़ खड़ा है. अमेरिकी मदद की कटौती के बीच देश में बढ़ती मुद्रास्फीति को क़ाबू करना जहां नई सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी, वहीं अलग-अलग कबीलों में और मिलिशियाओं में बंटे अफग़ानिस्तान के लोगों को आपस में लड़ने-भिड़ने यानी गृहयुद्ध से बचाने का काम भी आसान नहीं होगा.

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हालांकि इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने मिशन अमेरिका के ख़ात्मे को लेकर अपना स्टैंड क्लीयर किया. उन्होंने कहा कि पिछले 17 दिनों में अमेरिकी फ़ौजियों ने अमेरिकी इतिहास में सबसे बड़े एयरलिफ्ट को अंजाम दिया. जो बाइडेन ने अफगानिस्तान से फौज की वापसी की जिम्मेदारी लेते हुए कहा कि अमेरिका ने वहां करीब 20 साल तक शांति बनाए रखी. गृह युद्ध में तालिबान से निपटने के लिए करीब तीन लाख सैनिकों को ट्रेंड किया. जो बाइडेन ने कबूल किया कि काबुल छोड़ने के अलावा उनके सामने कोई और रास्ता नहीं था. वो इस जंग और लंबा नहीं खींचता चाहते थे और तालिबान को सीजफायर के लिए मजबूर किया. बाइडेन ने काबुल में फैली अराजकता के लिए अशरफ गनी के देश छोड़कर भागने के फैसले को जिम्मेदार ठहराया.

अफगानिस्तान में अभी नई सरकार बनी भी नहीं है कि देश की राजधानी काबुल में शरिया क़ानून की शुरुआत हो चुकी है. तालिबान की ओर से चुने गए काबुल के नए मेयर हमदुल्ला नोमानी ने सोमवार से ही राजधानी में शरिया कानून लागू करने का ऐलान कर दिया. नोमानी ने कहा कि अब भ्रष्टाचार करने वाले लोगों के साथ शरिया कानून के हिसाब से निपटा जाएगा. काबुल नगरपालिका पर भ्रष्टाचार के इल्ज़ाम कोई नई बात नहीं हैं. पिछले दिनों ये ख़बर सामने आई थी कि नगर पालिका के मुलाज़िम पुलिसवालों के साथ मिल कर छोटे-मोटे दुकानदारों से दो करोड़ अफगानी की नाजायज़ वसूली करते हैं.

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अब अफग़ानिस्तान का मुस्तकबिल फिलहाल तालिबान के हाथों में है. ऐसे में भारत ने तालिबान से बातचीत शुरू कर दी है. भारतीय विदेश मंत्रालय ने बातचीत की ख़बर पर मुहर लगाते हुए बताया कि कतर में भारत के राजदूत दीपक मित्तल की मंगलवार को दोहा में तालिबान के नेताओं से मुलाकात हुई. अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंटन ने फिलहाल कतर की राजधानी दोहा से ही अफगानिस्तान के मामलों पर नज़र रखने की बात कही है. और अब भारत भी कुछ ऐसा ही करता हुआ दिख रहा है. 

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भारत के विदेश मंत्रालय की ओर से जारी किए गए बयान में कहा गया कि  "मंगलवार को भारतीय राजदूत दीपक मित्तल ने कतर की राजधानी दोहा स्थित तालिबान के राजनीतिक कार्यालय के प्रमुख शेर मोहम्मद अब्बास स्टेनकजई से मुलाकात की. ये मुलाकात तालिबान के अनुरोध पर दोहा स्थित भारतीय दूतावास में हुई."

इस बयान के मुताबिक, इस मुलाकात में सुरक्षा और अफगानिस्तान में फंसे भारतीय नागरिकों की जल्द वापसी को लेकर बातचीत हुई. अफगान नागरिकों, खासकर अल्पसंख्यक जो भारत आना चाहते हैं, उनका मुद्दा भी बैठक में उठा. फिलहाल भारत-तालिबान रिश्तों लेकर कयासों का बाजार गर्म है. भारत जहां वेट एंड वॉच की रणनीति पर चल रहा है, वहीं भारत को लेकर तालिबान के बयान भी बहुत आक्रामक नहीं लग रहे. यहां तक कि उसने पाकिस्तान के उम्मीदों से उलट कश्मीर के मामले से खुद के अलग रहने की बात पहले ही साफ कर दी है और तालिबान के बयान 1996 से 2001 के बीच के तालिबान से हट कर हैं.

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अमेरिकी फौज की वापासी के बाद अफग़ानिस्तान पर तालिबान की हुकूमत का रास्ता बेशक पूरी तरह साफ़ हो गया हो, लेकिन पंजशीर में तालिबान की दाल अब भी नहीं गल रही. 31 अगस्त को मुंह अंधेरे तालिबानी बेशक आज़ादी का जश्न मना रहे थे, लेकिन पंजशीर के लड़ाके उनके दांत खट्टे करने में लगे थे. तालिबान ने पंजशीर प्रांत में घुसने का दावा किया और कहा उसके लड़ाकों ने शूतर जिले पर कब्जा कर लिया है. लेकिन नॉर्दर्न एलायंस ने बड़ी तादाद में तालिबानियों को मार गिराने और उन्हें पकड़ने का दावा किया है. एक ट्वीट में नॉर्दर्न एलायंस ने कहा कि उन्होंने बीती रात खावक इलाके में हमला करने आए तालिबान के 350 लड़ाकों को मार गिराया. जबकि 40 से ज्यादा पकड़े गए. नॉर्दन एलांयस का कहना था कि तालिबानियों के पास से उन्हें बड़ी तदाद में अमेरिकी गाड़ियां और गोला-बारूद हाथ लगे हैं.

 

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