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Crime Katha: एक प्रभावशाली महिला की रहस्यमयी मौत से संकट में आई थी सरकार, यूं सवालों में घिर गई थी CBI

साल 1983, 11 मई का दिन था, जब पटना में लोग नींद से जागे तो वहां के दो मशहूर अखबारों में फ्रंट पेज पर छपी एक ख़बर ने सबको सन्न कर दिया था. उन दोनों अखबारों ने छापा था कि बॉबी की संदिग्ध हालात में मौत, लाश को कहीं छुपाया गया..

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बॉबी की मौत का सच कानून की फाइलों में झूठ बनकर हमेशा के लिए दफन हो गया
बॉबी की मौत का सच कानून की फाइलों में झूठ बनकर हमेशा के लिए दफन हो गया

जुर्म की दुनिया में कई ऐसे मामले सामने आते हैं जो ये सोचने पर मजबूर कर देते हैं कि हमारे समाज में कानून नाम की कोई चीज़ है भी या नहीं? ये सवाल तब उठता है, जब कोई संगीन मामला पुलिस या किसी जांच एजेंसी के सामने पानी की तरह साफ होता है लेकिन उसका सच जानकर भी वो आंखें मूंद लेती हैं. और मामले को रफा-दफा करने के लिए कानून और नियम ताक पर रख दिए जाते हैं. ऐसा ही एक मामला 39 साल पहले चर्चा में आया था जिसकी वजह से एक सूबे की सरकार पर संकट आ गया था. हम बात कर रहे हैं बिहार के बॉबी हत्याकांड की, जो हमेशा के लिए एक राज़ बनकर फाइलों में दफन हो गया. 

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11 मई 1983

यही वो दिन था जब बिहार की राजधानी पटना में लोग नींद से जागे तो वहां के दो मशहूर अखबारों में फ्रंट पेज पर छपी एक ख़बर ने सबको सन्न कर दिया. उन दोनों अखबारों ने छापा था कि बॉबी की संदिग्ध हालात में मौत, लाश को कहीं छुपाया गया. हैरानी की बात ये थी कि इस मौत के बारे में ना तो कोई एफआईआर लिखी गई थी, और ना ही किसी कानूनी कार्रवाई का ज़िक्र कहीं था.

कौन थी बॉबी?

जिस बॉबी की मौत की ख़बर ने बिहार के सियासी गलियारों में भूचाल ला दिया था, आखिर वो कौन थी? तो इस सवाल का जवाब हम आपको देते हैं. दरअसल, बॉबी का असली नाम श्वेता निशा त्रिवेदी था. वह बिहार विधान परिषद की तत्कालीन सभापति और कांग्रेस की वरिष्ठ नेता राजेश्वरी सरोज दास की गोद ली गई बेटी थी. वो बेहद खूबसूरत थी. पहले उसका निकनेम बेबी था. लेकिन राजकपूर की हिट फिल्म बॉबी के रिलीज होने के बाद उसका नाम बेबी से बदल कर बॉबी कर दिया गया था. बॉबी बिहार की विधान सभा में ही टाइपिस्ट का काम करती थी. बॉबी शादीशुदा थी. उसकी पहली शादी नाकाम हो गई थी लेकिन दूसरी शादी से उसके दो बच्चे भी थे.

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राजनेताओं से करीबी संबंध

एक तो वो विधान परिषद सभापति की बेटी थी और ऊपर से खूबसूरत और मिलनसार. ऐसे में बॉबी का कई बड़े राजनेताओं और अफसरों के साथ उठना बैठना था. खासकर कई नेताओं से उसकी दोस्ती थी. सदन में आए कई विधायक और मंत्री सभी बॉबी को जानते थे.

एसएसपी ने भी पढ़ी थी बॉबी की खबर

अब वापस लौटते हैं, उस खबर पर जो कई राज नेताओं के लिए बड़ी खबर थी. बॉबी की संदिग्ध मौत की खबर. दोनों अखबारों में बॉबी की मौत का समाचार पढ़कर हर कोई यही सोच रहा था कि आखिर बॉबी कैसे मर गई? क्या हुआ था बॉबी को? कहां गई बॉबी की लाश? यही सवाल एक खास शख्स के दिमाग में भी आ रहे थे, वो शख्स थे पटना के तत्कालीन एसएसपी कुणाल किशोर. उन्होंने भी अखबार में यह खबर पढ़ ली थी. उन्हें पटना में तैनाती मिले केवल एक महीना ही बीता था. वे बेहद ईमानदार और मेहनती अफसर माने जाते थे जिन्हें अपने काम में किसी का दखल पसंद नहीं था. 

FIR दर्ज होते ही जांच शुरू

एसएसपी कुणाल किशोर भी पटना में तैनाती के दौरान बॉबी के बारे में काफी कुछ सुन और जान चुके थे. लिहाजा, अखबार में खबर पढ़ने के बाद उन्होंने इस मामले की जांच कराने का फैसला कर लिया. इसी के चलते इस मामलें में उनके हुक्म पर संबंधित थाने में एफआईआर दर्ज कर ली गई. पुलिस की टीम इस मामले की तफ्तीश में जुट गई थी. पुलिस इस मामले का हर पहलू खंगाल रही थी. 

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सभापति से पूछताछ में अहम खुलासा

एसएसपी कुणाल किशोर मामले की गंभीरता को समझ रहे थे. इसलिए उन्होंने खुद विधान परिषद की सभापति और बॉबी की मां राजेश्वरी सरोज दास से मिलने का वक्त मांगा. समय मिलते ही वो खुद सभापति से मिलने उनके सरकारी आवास पर पहुंचे. जहां राजेश्वरी सरोज दास ने उन्हें बताया कि बॉबी की मौत 8 मई 1983 की सुबह हुई थी. इसके बाद उनके मुर्दा जिस्म को एक कब्रिस्तान में दफन किया गया था. दफन इसलिए कि बॉबी ईसाई धर्म को मानती थी. एक बड़ी जानकारी अब पुलिस के पास थी. इससे ज्यादा सभापति ने कुछ नहीं बताया. शायद वे बेटी की मौत से बहुत दुखी और परेशान थीं.

सरकारी बंगले में हुई थी बॉबी की मौत

एसएसपी कुणाल यहीं नहीं रुके. वह खुद इस जांच की निगरानी कर रहे थे. उनके सामने सबसे बड़ा सवाल था कि आखिर बॉबी की मौत कैसे हुई? पूछताछ और छानबीन से पुलिस को पता चला कि श्वेता निशा त्रिवेदी उर्फ बॉबी की मौत पटना में मौजूद विधान परिषद सभापति के सरकारी बंगले में ही हुई थी. लेकिन इस मामले को छुपाने के मकसद से बॉबी की लाश को एक जगह कब्र खोदकर दफना दिया गया था. 

मौत की दो अलग वजह

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बॉबी की मौत कैसे हुई थी, इसी सवाल का जवाब जानने के लिए जब पुलिस की जांच आगे बढ़ी तो पोस्टमॉर्टम की दो रिपोर्ट पुलिस के हाथ लगी. जिससे ये मामला सुलझने के बजाय और भी उलझ गया. क्योंकि दोनों पोस्टमॉर्टम अलग-अलग डॉक्टरों की बनाई हुई थीं और दोनों में ही बॉबी की मौत का कारण भी अलग-अलग लिखा था. एक रिपोर्ट में बॉबी की मौत का कारण इंटरनल ब्लिडिंग यानी आंतरिक रक्त स्त्राव लिखा था. जबकि दूसरी रिपोर्ट में मौत की वजह हार्ट अटैक बताई गई थी.

एसएसपी और मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में बॉबी की लाश कब्र से निकाली गई थी (फोटो- इंडिया टुडे)

कब्र से निकाली गई थी बॉबी की लाश

पुलिस के सामने एक बड़ी परेशानी ये थी कि किस रिपोर्ट पर यकीन करें और किस पर नहीं. लिहाजा एसएसपी ने इसके लिए दूसरा रास्ता निकाला. उन्होंने बॉबी को लाश को कब्र से बाहर निकालने का फैसला कर लिया. इसके लिए तेजी से सारी कानूनी प्रक्रिया पूरी की गई और अदालत से इजाजत मिलते ही पुलिस ने बॉबी की लाश को निकालकर पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया. इस काम में फोरेंसिक एक्सपर्ट की मदद भी ली गई.

बॉबी के विसरा की जांच में मिला था जहर

अब फोरेंसिक विशेषज्ञों की निगरानी में डॉक्टरों ने बॉबी की सड़ चुकी लाश का पोस्टमॉर्टम किया. पोस्टमॉर्टम में एक ऐसा चौंकाने वाला खुलासा हुआ कि बॉबी की मौत की जो दो वजह पहले बताई जा रही थी, वो फर्जी लगने लगी. दरअसल, इस बार बॉबी के विसरा की जांच में 'मेलेथियन' नाम का जहर पाया गया. इस रिपोर्ट ने पुलिस के शक को हकीकत में बदल दिया. अब साफ हो चुका था कि बॉबी का कत्ल किया गया था.

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दो संदिग्ध युवकों से की गई थी पूछताछ

पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आने के बाद पुलिस जान चुकी थी कि बॉबी की मौत आम मौत नहीं बल्कि एक मर्डर था. जिसे सोची समझी साजिश के तहत अंजाम दिया गया था. इसी वजह से एसएसपी के नेतृत्व में पुलिस टीम एक बार फिर विधान परिषद सभापति के सरकारी बंगले पर पहुंची और वहां छानबीन की. पुलिस ने देखा कि बंगले से लगा एक आउट हाउस भी था. जहां दो लड़के रहा करते थे. पुलिस ने उन दोनों को पूछताछ के लिए उठा लिया. उन दोनों ने पुलिस के सामने जो खुलासा किया वो इस केस को खोलने में अहम साबित हो सकता था.

हत्या को लेकर बड़ा खुलासा

अब पुलिस के पास वो दो लड़के थे. जो इस केस में अहम जानकारी दे रहे थे. वो दोनों पूछताछ में तोते की तरह बोलते जा रहे थे और पुलिस सुन रही थी. उन्होंने पुलिस को बताया कि वो 7 मई 1983 की रात थी, जब कांग्रेस नेता राधा नंदन झा का बेटा रघुवर झा वहां बॉबी से मिलने आया था. लेकिन ना जाने उस रात फिर क्या हुआ कि कुछ देर बाद ही बॉबी को अस्पताल ले जाया गया. जहां अगली सुबह यानी 8 मई की सुबह करीब 4 बजे इलाज के दौरान बॉबी ने दम तोड़ दिया था. इसी के बाद बॉबी को दफन कर दिया गया था.

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अदालत में बॉबी की मां का बयान

जैसे ही बॉबी के कत्ल में कांग्रेस नेता के बेटे का नाम सामने आया, इस मामले ने तूल पकड़ लिया. पुलिस की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही थी. वैसे-वैसे सत्ता के गलियारों में हंगामा बढ़ता जा रहा था. मामला अदालत में जा पहुंचा था. जहां बॉबी की मां राजेश्वरी सरोज दास ने अपना बयान दर्ज कराया था. साथ ही इस बात का खुलासा भी किया था कि बॉबी की मौत कैसे हुई और उसे जहर किसने दिया था. इसके बाद बिहार की सियासत में भूचाल आ गया.

सीएम से मिले थे दर्जनों विधायक और मंत्री

आगे की तफ्तीश में पुलिस को पता चला कि बॉबी की हत्या के मामले में सत्ताधारी पार्टी के कई छोटे-बड़े नेता भी जुड़े थे. इस खुलासे की वजह से कांग्रेस पार्टी पर दबाव बढ़ता जा रहा था. बताया जाता है कि पुलिस एक बड़े कांड का खुलासा करने वाली थी कि तभी सत्ताधारी पार्टी के करीब 4 दर्जन विधायक और मंत्री बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र से मिलने जा पहुंचे और उन पर बॉबी हत्याकांड की जांच सीबीआई के हवाले किए जाने का दबाव बनाया.

25 मई 1983

मुख्यमंत्री को सरकार पर संकट साफ नजर आ रहा था. लिहाजा वो विधायकों और नेताओं के दबाव में आ गए और उन्होंने 25 मई 1983 को बॉबी हत्याकांड की जांच सीबीआई को सौंप दी थी. केस सीबीआई के पास पहुंच चुका था. लेकिन दबाव वहां भी था कि इस मामले को किसी भी तरह से रफा-दफा कर दिया जाए. बात सत्ताधारी नेताओं को बचाने की थी, लिहाजा सीबीआई ने एक ऐसा काम किया, जो मजाक बनकर रह गया. सीबीआई की टीम तो क्या कोई अधिकारी तक इस मामले की जांच के लिए पटना नहीं पहुंचा और दिल्ली में बैठकर इस केस की फाइनल रिपोर्ट बना दी गई.

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बॉबी के कत्ल को बनाया था सुसाइड

सीबीआई ने जो जांच रिपोर्ट बनाकर तैयार की, उस पर किसी को यकीन नहीं हो रहा था. लेकिन कुछ लोग ऐसा ही चाहते थे, जैसा सीबीआई की फाइनल रिपोर्ट में लिखा था- ये मामला कत्ल का नहीं बल्कि बॉबी ने आत्महत्या की है. उसने सेंसिबल टेबलेट खाकर सुसाइड किया. सीबीआई ने रिपोर्ट में लिखा था कि बॉबी अपने प्रेमी के धोखे से परेशान थी. इसलिए उसने ऐसा किया. सीबीआई ने एक सुसाइड नोट का जिक्र भी किया था. जो कथित तौर पर बॉबी ने मरने से पहले किसी रतन जगवानी को लिखा था. जिसे सीबीआई बॉबी का प्रेमी बता रही थी. मगर सवाल था कि किसी सुसाइड नोट या प्रेमी की बात पटना पुलिस को क्यों पता नहीं चली? जबकि पूरे मामले की जमीनी तहकीकात पुलिस ने ही की थी.

फोरेंसिक लैब ने यूं खोली थी CBI की पोल

जब सीबीआई की फाइनल रिपोर्ट सामने आई तो पटना फारेंसिक लैब के हवाले से कहा गया था कि बॉबी की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट या विसरा जांच में कहीं भी सेंसिबल टेबलेट का कोई अंश नहीं था. उसके विसरा में 'मेलेथियन' जहर पाया गया था. इस पर सीबीआई ने बेतुका तर्क देते हुए कहा था कि पटना फोरेंसिक लेबोरेटरी में रखे किसी दूसरे विसरा से मेलेथियन बॉबी के विसरा में चला गया होगा. इस पर पटना फोरेंसिक लैब के अफसरों साफ कर दिया था कि सीबीआई की बातें निराधार हैं.

कानून की फाइलों में दफन हो गया बॉबी केस

बताया जाता है कि उस वक्त इस मामले में तत्कालीन सीएम ने एसएसपी कुणाल किशोर को अपने पास बुलाकर समझाया था कि आप एक अच्छे अधिकारी हैं, इस मामले से दूर रहें, इसमें ना पड़ें. यह मामला अब सीबीआई के पास है, वो अपने स्तर पर इसे सुलझा लेगी. और इसके बाद आखिरकार सीबीआई ने बॉबी के कत्ल को खुदकुशी बताकर ये मामला हमेशा के लिए बंद कर दिया था. तभी से चर्चित कांड कानून की फाइलों में एक बड़ा राज़ बनकर दफन हो गया. बॉबी का कत्ल कब, क्यों और किसने किया था? ये अब कभी पता नहीं चल पाएगा.

 

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