एक मामूली से वायरस और उसकी वजह से लगे लॉकडाउन ने इंसानों के निज़ाम को बिगाड़ कर रख दिया है. तो क्या कुदरत का इंसानों को इतना सबक काफी है या इंसान की किस्मत में अभी और भी मुश्किलें बाकी है. इसे लेकर दुनियाभर के वैज्ञानिक दो धड़ों में बंटे हुए हैं. एक ग्रुप का कहना है कि लॉकडाउन ज़रूरी है तो दूसरा गुट कहता है कि इंसानों को कैद से आज़ाद कर दो क्योंकि कोरोना को मारने का यही एक तरीका है.
दुनिया में कोरोना से लड़ने के दो बेहद अलग-अलग हथियार हैं. एक कहता है घर में रहो. दूसरा कहता है घर से निकल जाओ. बात भी वाजिब है. घर में इंसान आखिर कब तक रह सकता है. क्योंकि इससे तो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था ही बैठ जाएगी. लोगों की नौकरियां जाने लगेंगी. खाने-पीने के लाले पड़ जाएंगे. लोग डिप्रेशन में आ सकते हैं. तो फिर करें क्या. कोरोना से लड़ने का दूसरा रास्ता कहता है कि घर से निकल जाओ. इस थ्योरी के मुताबिक लॉकडाउन तभी तक कारगर है जब तक लोग घरों में कैद हैं. जैसे ही लोग घरों से निकलेंगे ये संक्रमण उन्हें जकड़ लेगा. इसलिए छुपे नहीं बल्कि इसका सामना करें. जितने ज़्यादा लोग इससे संक्रमित होंगे. इंसानी जिस्म में इससे लड़ने की उतनी ज़्यादा ताकत पैदा होगी. इसे ही हर्ड इम्युनिटी कहते हैं.
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दुनिया को कोरोना वायरस से बचने के लिए कई वैज्ञानिक हर्ड इम्यूनिटी अपनाने की सलाह दे रहे हैं. ताकि इसे फैलने से रोका जा सके. बड़ी अजीब सी बात है. मगर मेडिकल साइंस की सबसे पुरानी पद्धति के हिसाब से ये सच है. हर्ड इम्यूनिटी यानी सामूहिक प्रतिरोधक क्षमता. इसका मतलब ये है कि भविष्य में लोगों को बचाने के लिए फिलहाल आबादी के एक तय हिस्से को वायरस से संक्रमित होने दिया जाए. इससे उनके जिस्म के अंदर संक्रमण के खिलाफ सामूहिक इम्यूनिटी यानी प्रतिरोधक क्षमता पैदा होगी. इससे शरीर में वायरस के खिलाफ एंटीबॉडीज़ बनेंगी. जिसे उनके जिस्म से निकालकर वैक्सीन तैयार करने की कोशिश की जा सकती है. क्योंकि इससे फिर दोबारा कभी ये वायरस ना तो उन्हें संक्रमित करेगा और ना ही दूसरों को. कोरोना की वैक्सीन बनाने का वैज्ञानिकों को यही सबसे तेज़ तरीका समझ आ रहा है. वरना वैक्सीन बनते बनते इतनी देर ना हो जाए कि दुनिया की आधी आबादी काल के गर्त में समा जाए.
शुरुआत में इंग्लैंड ने और अब स्वीडन हर्ड इम्यूनिटी पर काम कर रहा है. अमेरिका जैसे देशों में जहां कोरोना तबाही मचा रहा है. उनके मना करने के बावजूद स्वीडन अपने देश में हर्ड इम्यूनिटी लागू कर रहा है. इसका तरीका ये है कि लोगों को इन्फ़ेक्शन हो और उनका शरीर उसके ख़िलाफ़ इम्यूनिटी डेवलप कर ले. जैसे खसरा-पोलिया के लिए होता है. एक बार इसका टीका लगाने के बाद ये हमें दोबारा कभी नहीं होता. वैसे ही कोरोना वायरस के खिलाफ एक बार हर्ड इम्यूनिटी डेवलेप हो गई. तो फिर कोरोना का वायरस बिना ज़हर वाला सांप बनकर रह जाएगा.
दुनिया इस बात को भी बारीकी से परख रही है कि बिना वैक्सीन के भी कोरोना के कुछ केसेज़ को छोड़कर किसी ठीक हुए मरीज़ में इस वायरस ने दोबारा अटैक नहीं किया. वैज्ञानिकों का मानना है कि जब सब लोग घरों में क़ैद ही हैं. तो कोरोना से ठीक हुए मरीज़ों पर रिसर्च होना चाहिए. स्वीडन का मानना है कि वो इसी आधार पर कोरोना से लड़ेगा. जिन मरीज़ों को ज़रूरत होगी उन्हें भर्ती करके इलाज किया जाएगा. लेकिन पूरा देश या शहर के शहर बंद नहीं होंगे. हालांकि फ़िलहाल ज़्यादातर देशों में वुहान का लॉकडाउन मॉडल ही अपनाया जा रहा है. मगर ये देखना दिलचस्प होगा कि स्वीडन में हर्ड इम्यूनिटी मॉडल क्या नतीजा निकलता है.
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हिंदुस्तान में जहां ज़्यादातर लोगों को मलेरिया और बीसीजी के टीके लगे हुए. ऐसा माना जा रहा है कि इस लिहाज़ से भी भारत में हर्ड इम्यूनिटी कारगार साबित हो सकती है. क्योंकि भारतीयों की इम्यूनिटी पश्चिमी देशों के मुकाबले स्ट्रांग है. आंकड़े बताते हैं कि जिन देशों में मलेरिया फैल चुका है. वहां कोविड-19 का असर या तो नहीं है या फिर बेहद कम है. दरअसल, ये इसलिए है क्योंकि जिस शरीर में मलेरिया एक बार एक्सपोज़ हो जाता है. उसके अंदर पॉथ वे डेवलेप होकर ज़िंक आयनोस्फेयर पैदा हो जाता है. जिससे ये वायरस कमज़ोर पड़ने लगता है. मगर ये वायरस भारतीयों पर असर नहीं ही करेगा. ये अभी साबित नहीं हो सका है.
जानकारों का मानना है कि चूंकि ये वायरस एक बड़ी आबादी से होते हुए यहां तक पहुंचा है. इसलिए मुमकिन है कि उसने अपना स्वरूप बदल लिया हो और वैसा ना हो जैसा हम सोच रहे हैं. लिहाज़ा एहतियात ज़रूरी है. अभी तक की रिपोर्ट के मुताबिक इस वायरस में बाकी देशों के मुकाबला कुछ बदलाव देखा भी गया है. हालांकि फिर भी वैज्ञानिक ये मान रहे हैं कि भारत में जितनी जल्दी लॉकडाउन खुलेगा. उतनी जल्दी लोगों के शरीर में इससे लड़ने की इम्यूनिटी बढ़ेगी. वैज्ञानिकों की सलाह है कि भारत नंबर पर ना जाएं. बल्कि वायरस के रवैय्ये पर जाएं.
भारत में कोरोना से संक्रमित होने वाले 80 फीसदी वो लोग हैं, जिन्हें पहले से बीमारियां थी. जिसकी वजह से उनके इम्यून सिस्टम में कमीं थी. ज़्यादातर स्वस्थ्य लोग इससे चंगुल में आने के बावजूद ठीक हो गए. दरअसल, भारतीय उपमहाद्वीप में आने वाले देशों के लोगों की इम्यूनिटी कुदरती तौर पर स्ट्रांग है. इसमें हमारे खान-पान की आदत का बड़ा रोल है. ज़्यादा तादाद में मिर्च मसाला खाने की वजह से हमारे शरीर का सिस्टम इन वायरस से पार पाने के लिए मज़बूत है.