आमतौर पर लोग जुर्म करने के बाद जेल जाते हैं. मगर वो जुर्म करने के लिए जेल जाता है. पर जेल के अंदर जुर्म करने के लिए पहले जेल के बाहर जुर्म करना जरूरी था. लिहाज़ा वो जेल के बाहर पहला कत्ल करता है. कत्ल भी ऐसे कि पुलिस उसे आसानी से पकड़ ले. होता भी यही है. अब वो तिहाड़ के अंदर था. अब तिहाड़ जेल के अंदर उसे दूसरा कत्ल करना था. वो कत्ल जिसके लिए वो पिछले छह साल से इंतजार कर रहा था. तिहाड़ के अंदर कत्ल और इस कत्ल की जो वजह है उसे जिसने भी सुना वही दंग रह गया.
जेल नंबर 8, सोमवार 29 जून सुबह का वक्त
तिहाड़ में तय वक्त पर प्रार्थना सभा शुरू होने वाली थी. लिहाज़ा कैदियों के बैरक खुलने शुरू हो गए. एक-एक कर कैदी जेल सुरक्षाकर्मियों की निगरानी में अपने-अपने बैरक से बाहर निकलने लगे. बाकी बैरकों की तरह आठ नंबर जेल की बैरक नंबर 4 में बंद कैदी भी अब बाहर आने लगे थे. और ठीक उसी वक्त अचानक एक चीख जेल की खामोशी को तोड़ देती है. चीखने की ये आवाज़ बैरक नंबर चार की पहली मंजिल से आ रही थी. चीख सुनते ही सुरक्षाकर्मी तेजी से पहली मंजिल की तरफ भागते हैं.
सामने का मंजर देख कर एक पल के लिए वहां मौजूद बाकी कैदी और सुरक्षाकर्मियों तक के कदम ठिठक जाते हैं. एक कैदी धारधार हथियार से एक दूसरे कैदी पर बेतहाशा वार कर रहा था. जबकि खून से लथपथ जख्मी कैदी खुद को बचाने की कोशिश कर रहा था. किसी तरह सुरक्षाकर्मियों ने हमलवार कैदी को काबू में किया. इसके बाद घायल कैदी को फौरन जेल के अंदर अस्पताल ले जाया जाता है. पर हालत गंभीर थी. लिहाज जेल के डाक्टर उसे फौरन दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल भेज देते हैं. मगर इलाज के दौरान अगले चंद घंटों में ही वो दम तोड़ देता है.
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तिहाड़ जेल के अंदर तमाम कैदियों और सुरक्षाकर्मियों के बीच एक कैदी का कत्ल हो चुका था. और आरोपी कातिल कैदी पहले से ही जेल में था. पर उसने ऐसा क्यों किया? जेल के अंदर ही इस तरह खुलेआम कत्ल करने की वजह क्या थी? तो इस कत्ल की असली कहानी और कत्ल की वजह जब आप जानेंगे तो शायद पल भर को आपको यकीन भी ना हो कि कोई बदला लेने के लिए इस हद तक भी जा सकता है. अमूमन लोग कत्ल ऐसी जगह करते हैं जहां कोई देख ना पाए. कोई सबूत, कोई गवाह ना हो. मगर यहां एक शख्स तिहाड़ जैसी जेल जाता ही सिर्फ इसलिए है क्योंकि उसे जेल के अंदर एक कत्ल करना है. और इस कत्ल के लिए वो पूरे छह साल से इंतजार कर रहा था. छह साल से साजिश बुन रहा था.
साल 2014 अंबेडकरनगर, दिल्ली
दिल्ली के निज़ामुद्दीन इलाक़े के रहने वाला मोहम्मद महताब और जाकिर दोस्त भी थे और रिश्तेदार भी. 2014 में एक रोज़ जब महताब ज़ाकिर के घर गया तो घर पर जाकिर की 14 साल की नाबालिग बहन अकेली थी. महताब उस बच्ची के जबरदस्ती करता है और फिर मौके से भाग जाता है. बाद में बच्ची ये बात घर वालों को बताती है और फिर शर्म की वजह से खुदकुशी कर लेती है. जाकिर अपनी छोटी बहन से बेइंतहा प्यार करता था. अब उसकी जिंदगी का एक ही मकसद था बहन की मौत के जिम्मेदार महताब से बदला लेना. मगर बच्ची की खुदकुशी के बाद बाद ही पुलिस ने महताब को गिरफ्तार कर लिया था. बाद में उसे रेप और खुदकुशी के लिए मजबूर करने के मामले में तिहाड़ भेज दिया गया.
महताब का जेल जाना जाकिर को खटकने लगा, क्योंकि वो उसे अपने हाथ से सजा देना चाहता था. शुरू में कुछ वक्त तो जाकिर ने इंतजार किया कि शायद महताब जमानत पर बाहर आ जाए. मगर दो साल पहले दिल्ली में निर्भया के साथ जो कुछ हुआ था, उसके बाद से रेप के मामलों को लेकर अदालत ज्यादा सख्त हो गई थी. लिहाज़ महताब की जमानत अर्जी लगातार खारिज होती गई और जाकिर का इंतजार लंबा होता गया.
2014 से अब 2018 आ गया था. चार साल बीत चुके थे. जाकिर को अहसास होने लगा कि अब महताब जल्दी जेल से बाहर नहीं आने वाला. लिहाज़ा बदला लेने के लिए अब उसने साजिश बुननी शुरू की. आखिर चार साल बाद जाकिर ने फैसला किया कि वो जेल के बाहर बैठ कर इंतजार करने की बजाए बदला लेने खुद जेल जाएगा. पर जेल जाने के लिए जुर्म करना जरूरी था.
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इसी साजिश के तहत साल 2018 में दक्षिण पश्चिम दिल्ली के जैतपुर इलाक़े में एक रिक्शेवाले का क़त्ल हो जाता है. पुलिस मामले की तफ्तीश शुरू करती है और क़ातिल के तौर पर जो शख्स उसके हाथ लगता है, वो कोई और नहीं 20 साल का ज़ाकिर था. ज़ाकिर ने ये कत्ल सिर्फ इसलिए किया था ताकि पुलिस उसे गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल भेज दे और वो महताब से बदला ले सके.
हुआ भी यही. पुलिस ने ज़ाकिर को गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल भेज दिया. इत्तेफाक देखिए कि तिहाड़ में जाकिर भी उसी आठ नंबर जेल में रखा जाता है, जहां महताब पहले से बंद था. मगर अंदर एक दिक्कत थी. जेल नंबर तो एक था मगर जाकिर को आठ नंबर जेल में अलग वार्ड में रखा जाता है. उस वार्ड में जहां महताब नहीं था. जाकिर जेल की मुंडा वार्ड में बंद था. मुंडा वार्ड में सिर्फ 20 साल या फिर उससे कम उम्र के क़ैदियों को ही रखा जाता है.
अब जाकिर मुंडा वार्ड में वक्त काटना शुरू करता है. मगर इस दौरान वो महताब, उसके वार्ड, जेल की दिनचर्या, सभी के बारे में जानकारी जुटाना शुरू कर देता है. वो ये भी पता कर लेता है कि महताब किस वार्ड में बंद है? जेल में उसका रुटीन क्या है? वो कब बाहर निकलता है? कब अपने वार्ड में वापस लौटता है? इस दौरान ज़ाकिर तेज़ी से तिहाड़ के कायदे क़ानून और वहां की रवायतों से वाकिफ होने लगता है. पुराने कैदियों से दोस्ती गांठता है. और फिर जल्द ही वो जेल में खाने-पीने के लिए दी जानी वाली थाली-चम्मच या कटोरी जैसी चीज़ों से हथियार बनाने के गुर भी सीख लेता है.
लेकिन जाकिर और उसके शिकार के दरम्यान अब भी एक दीवार थी. लिहाज़ा ज़ाकिर अब जेल प्रशासन की आंखों में धूल झोंकने के लिए जेल के अंदर पहली साज़िश रचता है. वो पहले अपने ही वार्ड में कुछ क़ैदियों से ज़बरदस्ती भिड़ता है, पिटता है और फिर जेल के वार्डन को एक ख़त लिख कर अपना वार्ड बदलने की अपील करता है. जाकिर कहता है कि चूंकि उसकी अपने वार्ड में दूसरे कैदियों से नहीं बनती और छोटा होने की वजह से अक्सर दूसरे क़ैदी उसके साथ मारपीट करते हैं, इसलिए उसका वार्ड बदल कर उसे कहीं और शिफ्ट कर दिया जाए.
ज़ाकिर की चाल कामयाब हो जाती है. जेल प्रशासन को उसके दिमाग में चल रही साज़िश का पता भी नहीं चलता और उसे उसी वार्ड नंबर चार में शिफ्ट कर दिया जाता है, जहां पहले से ही उसका दुश्मन महताब बंद था. अब ज़ाकिर को बस उस एक मौके की तलाश थी, जब महताब उसे अकेला मिल जाए और जल्द ही उसे ये मौका मिल भी गया.
तिहाड़ जेल, 29 जून 2020, सुबह 6 बजे
सुबह की प्रार्थना के वक़्त जब सारे क़ैदी अपने-अपने वार्ड से बाहर आते हैं, ज़ाकिर छुप कर महताब पर नजर रखता है. इत्तेफ़ाक से वार्ड की पहली मंजिल पर रहने वाला महताब देर तक प्रार्थना के लिए नीचे नहीं आता. जबकि वार्ड के ज़्यादातर क़ैदी प्रार्थना के लिए निकल चुके थे. महताब को अकेला देखते ही जाकिर जेल की बर्तन से तैयार नुकीले हथियार के साथ उस पर टूट पड़ता है. महताब का कत्ल करने के बाद जाकिर अपने हथियार फेंक कर फौरन सरेंडर कर देता है. इसके बाद वो सुरक्षाकर्मियों और कैदियों से कहता है कि आज उसका बदला पूरा हो गया.