हिंदुस्तान का मोस्ट वॉन्टेड आतंकी मसूद अज़हर एक बार फिर बच गया. बच गया क्योंकि उसके सामने चीन की दीवार खड़ी थी. पिछले 10 सालों में ये चौथी बार है जब चीन ने जैश के सरगना मसूद अज़हर को अंतर्राष्ट्रीय आतंकी बनने से बचा लिया. सवाल ये है कि आखिर चीन एक आतंकी को बार बार क्यों बचा रहा है. मसूद अज़हर से आखिर उसका ऐसा क्या लगाव है? तो इसका जवाब है पैसा और पॉवर. चीन ने पाकिस्तान में खरबों रुपये का निवेश कर रखा है. इसलिये पाकिस्तान को नाराज नहीं कर सकता और भारत में शांति हो ये चीन के हित में नहीं है. लिहाज़ा वो पाकिस्तान के ज़रिए भारत को बस उलझाए रखना चाहता है.
भारत में एक बड़ी पुरानी कहावत है. एक हाथ दे. एक हाथ ले. मगर ये कहावत चीन के रास्ते पाकिस्तान पहुंचते पहुंचते बदलने लगती है. पाकिस्तान के साथ चीन इस कहावत को थोड़ा बदलकर इस्तेमाल करता है. यानी एक हाथ दे और कई हाथ ले. हिंदुस्तानी कहावत के इस चीनी स्टाइल को थोड़ा आसान लफ्ज़ों में समझिए. इसका मतलब ये है कि आतंक के मामले में तो चीन दुनिया के पटल पर पाकिस्तान की बेइज़्ज़ती होने से बचा लेगा. मगर पाकिस्तान को उसके इस एहसान का बदला चुकाना होगा. और ये बदला थोड़ा चीनी स्टाइल में होगा.
चीनी स्टाइल का बदला होता क्या है ये हम आपको एक एक करके समझाएंगे. मगर पहले ये जानिए चीन ने अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी के सामने कैसे रख ली पाकिस्तान की लाज. चीन ने फिर की आतंकी मसूद अज़हर की मदद. यूएन में ग्लोबल आतंकी घोषित होने में डाला रोड़ा. मसूद अजहर पर 10 साल में चीन ने चौथी बार ये चाल चली है. और मसूद अजहर को बचाने के लिए वीटो लगाया.
पिछले 18 सालों से.. यानी 2001 के संसद हमलों से 2019 के पुलवामा हमले तक. पाकिस्तान का ये खूंखार आतंकी एक के बाद एक भारत को कई ज़ख्म दे चुका है. दुनिया के तमाम देशों ने माना की जैश का ये सरगना पूरी इंसानियत के लिए खतरा है. लिहाज़ा इसे ग्लोबल टेरेरिस्ट घोषित किया जाना चाहिए ताकि आतंक पर नकेल कसी जा सके. मगर पिछले 10 सालों से चीन आतंक के इस सरगना की ढाल बना बैठा है. और जब-जब भारत ने इसे ग्लोबल टेररिस्ट लिस्ट में डालने की कोशिश. तब-तब चीन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अड़ंगा डाल दिया.
हालांकि पुलवामा हमले के बाद इस बार 27 फरवरी को ये प्रस्ताव फ्रांस, ब्रिटेन और अमेरिका लाया था. 10 से ज़्यादा देशों ने प्रस्ताव का समर्थन किया. तय किया गया कि अगर सुरक्षा परिषद के किसी सदस्य को इस पर ऐतराज़ ना हुआ तो. जैश के सरगना मसूद अज़हर को अंतर्राष्ट्रीय आतंकी घोषित कर दिया जाएगा. इस लिहाज़ से प्रस्ताव की समय सीमा बुधवार यानी 13 मार्च रात 12:30 बजे खत्म हो रही थी. लगा इस बार तो मसूद को उसके किए की सज़ा मिल ही जाएगी. मगर प्रस्ताव की समय सीमा खत्म होने से ठीक एक घंटे पहले. चीन ने इस पर अड़ंगा लगा दिया.
चीन ने कहा कि वो पहले भी कह चुका है कि बिना सबूतों के कार्रवाई ग़लत है. जिस पर अमेरिका ने चीन से गुजारिश की थी कि वो समझदारी से काम लें. क्योंकि भारत-पाक में शांति के लिए मसूद को वैश्विक आतंकी घोषित करना जरूरी है. चीन के अड़ंगे के बाद मसूद अज़हर को अंतर्राष्ट्रीय आतंकी घोषित किए जाने की एक और कोशिश नाकाम हो गई. हालांकि इस प्रस्ताव पर अड़ंगे के बाद सुरक्षा परिषद के सदस्यों ने चीन को साफ चेतावनी दी है कि अगर वो मसूद अज़हर को लेकर अपने रुख को नहीं बदलेगा तो कार्रवाई के दूसरे विकल्प भी खुले हैं.
कुल मिलाकर पिछले 10 सालों में चीन मसूद अजहर को बचाने के लिए चार बार चाल चल चुका है. 2009 में भारत खुद ये प्रस्ताव लेकर आया था. वहीं 2016 में भारत ने पी-3 यानी अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन ने मिलकर प्रस्ताव पेश किया था. 2017 में पी-3 देशों ने ही ये प्रस्ताव पेश किया था. और इस बार भी पुलवामा आतंकी हमले के बाद ये प्रस्ताव फ्रांस, ब्रिटेन और अमेरिका लेकर आया.
हालांकि इस बार चीन ने इस प्रस्ताव को गिराने के लिए वीटो पॉवर का इस्तेमाल नहीं किया है, बल्कि सूत्रों के मुताबिक चीन ने प्रस्ताव को ‘टेक्निकल होल्ड’ पर रखा है. टेक्निकल होल्ड का मतलब है कि उसे प्रस्ताव पर विचार करने के लिए कुछ और वक्त चाहिए. इस लिहाज़ से ऐसा नहीं है कि मसूद अज़हर के सिर पर लटकी अंतर्राष्ट्रीय आतंकी घोषित होने की तलवार हट गई है. मगर चीन का इतिहास देखते हुए लगता है कि वो भारत को कमज़ोर करने के लिए पाकिस्तान का साथ दे सकता है.
सवाल ये है कि आखिर चीन एक आतंकी को बार बार क्यों बचा रहा है.. मसूद अज़हर से आखिर उसका ऐसा क्या लगाव है? तो इसका जवाब है पैसा और पॉवर. चीन ने पाकिस्तान में खरबों रुपए निवेश कर रखे हैं. इसलिये पाकिस्तान को नाराज नहीं कर सकता और भारत में शांति हो ये चीन के हित में नहीं है. लिहाज़ा वो पाकिस्तान के ज़रिए भारत को बस उलझाए रखना चाहता है.