चंबल की रानी फूलन देवी. कभी चंबल उसके नाम से जाना जाता था. बीहड़ में उसकी दहशत थी. फिर किस्मत ने ऐसी पलटी खाई कि चंबल से निकल कर वह जेल पहुंची और जेल से सीधे संसद भवन. एक डाकू अब सांसद थी. मगर किस्मत फिर पलटी खाती है. 25 जुलाई 2001 को संसद भवन से घर लौटते हुए ठीक उसके सरकारी घर के बाहर उसे गोली मार दी जाती है. 13 साल बीत जाते हैं. अब 13 साल बाद दिल्ली की एक अदालत ने अपना फैसला सुनाया है. फैसला यह कि फूलन देवी का कातिल कोई और नहीं बल्कि वही शेर सिंह रणा है जिसने कत्ल के बाद खुद ही सामने आकर एलानिया कहा था कि 'हां, मैंने फूलन को मारा है...'
फूलन देवी ने फांसी न दिए जाने की शर्त पर साल 1983 में सरेंडर किया था. 1994 में फिल्म 'बैंडिट क्वीन' की शक्ल में फूलन की रॉबिनहुड छवि रुपहले पर्दे पर उतरी थी. समाजवादी पार्टी ने फूलन के नाम को भुनाया और मिर्जापुर से लोकसभा का चुनाव लड़वाया. चनाव जीतकर फूलन देवी संसद भवन जा पहुंची. लेकिन चंबल की परछाई ने फूलन का पीछा नहीं छोड़ा.
25 जुलाई 2001 को संसद का सत्र चल रहा था. दोपहर के भोजन के लिए संसद से फूलन 44 अशोका रोड के अपने सरकारी बंगले पर लौटीं. बंगले के बाहर सीआईपी 907 नंबर की हरे रंग की एक मारुति कार पहले से खड़ी थी. जैसे ही फूलन अपने घर की दहलीज पर पहुंची, पहले से उनका इंतजार कर रहे तीन नकाबपोश अचानक कार से बाहर आए और फूलन पर ताबड़तोड़ पांच गोलियां दाग दी. एक गोली फूलन के माथे पर जा लगी. गोलीबारी में फूलन देवी का एक गार्ड भी घायल हो गया. इसके बाद हत्यारे उसी कार में बैठकर फरार हो गए. यह एक राजनीतिक हत्या थी या कुछ और पुलिस के हाथ कोई सुराग नहीं लग पा रहा था.
कातिल के कबूलनामे से पुलिस भी हैरत में थी...
पुलिस फूलन के कातिल की तलाश में मारी मारी फिर रही थी कि तभी 27 जुलाई 2001 को शेर सिंह राणा ने बाकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सबको सकते में डाल दिया. उसने कबूल किया कि उसी ने फूलन को गोलियों से उड़ाया है. एक सनसनीखेज वारदात को अंजाम देने के बाद राणा के इस सरेआम इकबालिया बयान ने पुलिस को भी हैरत में डाल दिया.
पहले खुद किया सरेंडर, फिर हो गया फरार
गिरफ्तारी के बाद करीब ढाई साल राणा ने तिहाड़ जेल में गुजारे. इसी दौरान एक बार उसने बयान दिया कि तिहाड़ की सलाखें उसे ज्यादा देर तक नहीं रोक पाएंगी. और हुआ भी ठीक वैसा ही. सुबह 6.55 मिनट का वक्त था. तिहाड़ की जेल नंबर एक के बाहर एक ऑटो आकर रुका. तमाम सुरक्षाकर्मियों की मौजूदगी में पुलिस की वर्दी में एक आदमी ऑटो से उतरकर जेल के अंदर पहुंचा. अपना नाम अरविंद बताते हुए उसने शेर सिंह राणा को हरिद्वार कोर्ट में पेशी के लिए ले जाने की इजाजत मांगी. जरूरी कागजात को ध्यान से देखे बिना ड्यूटी पर तैनात तिहाड़ के सुरक्षाकर्मियों ने राणा को नकली पुलिस के हवाले कर दिया. इस तरह 7.05 मिनट पर फूलन देवी की हत्या का मुख्य आरोपी राणा तिहाड़ की कैद से फरार हो गया.
पूरे 40 मिनट बाद जेल प्रशासन की नींद टूटी, यानी पौने आठ बजे. इसके बाद तो जैसे जेल समेत पूरे पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया. आनन फानन में जेल प्रशासन ने आसिस्टेंट सुपारिटेंडेंट और गार्ड को सस्पेंड कर दिया. राणा की फरारी ने सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ा दी थी. उसकी गिरफ्तारी के लिए हरिद्वार, रुड़की और मुजफ्फरनगर इलाके में पुलिस की टीमों ने जबरदस्त छापामारी की. राणा का सुराग देने वाले को 50 हजार रुपये इनाम देने की भी घोषणा कर दी गई. लेकिन पुलिस नाकामयाब रही. फिर तभी अचानक एक वीडियो सामना आता है. इधर पुलिस शेर सिंह राणा को हिन्दुस्तान में ढूंढ़ रही थी और उधर राणा हरेक को चकमा देकर अफगानिस्तान पहुंच गया था.
अस्थियां लेने गया था अफगानिस्तान
फूलन देवी हत्याकांड के आरोपी शेर सिंह राणा ने दावा कि वह अफगानिस्तान में पृथ्वीराज चौहान की असली समाधि पर गया और समाधि की मिट्टी लेकर वापस आ गया. राणा ने अफगानिस्तान में गजनी शहर तक के अपने सफर की बाकायदा वीसीडी तैयार की. तिहाड़ जेल से भागने के पूरे दो साल बाद शेर सिंह राणा 2006 में कोलकाता में पकड़ा गया. उसके बाद उसे वापस दिल्ली के उसी तिहाड़ जेल में लाया गया. तब से अब तक यानी पिछले आठ साल से राणा तिहाड़ में ही कैद है.
तिहाड़ से भागने और अफगानिस्तान से लौटने के बाद शेर सिंह राणा ने 'आज तक' से संपर्क किया था. तब उसने कहा था कि वह अपने केस की सुनवाई दिल्ली से बाहर चाहता है. उसने अपनी ज़िंदगी पर एक किताब लिखने की इच्छा भी जताई थी. शेर सिंह राणा ने बाद में 'तिहाड़ से कंधार तक' नाम की एक किताब भी लिखी और अब इस किताब पर एक फिल्म भी बन रही है.