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...इस तरह बीच सड़क पर इंसानियत ने तोड़ दिया दम

करीब पौने दो करोड़ की आबादी वाली दिल्ली में बीस साल का एक नौजवान पूरे दस मिनट तक पथरीली सड़क पर पड़ा बस एक मददगार हाथ के लिए तड़पता रहा. पर मदद का हाथ किसी ने नहीं बढ़ाया.

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करीब पौने दो करोड़ की आबादी वाली दिल्ली में बीस साल का एक नौजवान पूरे दस मिनट तक पथरीली सड़क पर पड़ा बस एक मददगार हाथ के लिए तड़पता रहा. इस दौरान उसके पास से 129 मोटरसाइकिल सवार गुजरे, 67 कारें गुजरीं. उनमें सवार सैकड़ों लोग गुजरे. खुद उसके इर्द-गिर्द पचासों तमाशबीन खड़े रहे. पर मदद का हाथ किसी ने नहीं बढ़ाया.

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आखिर में उसी पथरीली सड़क पर पत्थरदिल इंसानों के सामने तड़प-तड़प कर उसने दम तोड़ दिया . वैसे भी इस शहर में शायद ही किसी की मदद के लिए कोई अपने दरवाजे या खिड़कियां खोलता हो. पर यहां तो बीच सड़क पर आंखों के सामने पड़ा था वो. पथरीली सड़क लगातार उसके रिसते खून से लाल हो रही थी. हर गुजरता लम्हा उसकी सांसों की डोर काट रहा था. पर किसी ने उसकी मदद नहीं की...और फिर हारकर उसने इसी पथरीली सड़क पर दम तोड़ दिया.

क्या कहें इंसानियत को? क्या नाम दूं इन इंसानों को? कायदे से तो इन्हें इंसान कहते हुए भी शर्म आ रही है. तस्वीरें झूठ नहीं बोलतीं, वरना शायद सुनने वाले इसे भी सच नहीं मानते और देखने वाले साफ मुकर जाते.

हम सब खुद को इंसान कहते हैं. खुद के इंसान होने पर फख्र भी करते हैं. पर हम इंसानों के बीच से ही चंद ऐसे लोग वो हरकत कर बैठते हैं, जिन्हें देखकर हैवान भी हमसे जल जाए. वाह रे तमाशबीन इंसान!

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देखिए ना, भला कैसे कोई इंसान इतना पत्थरदिल हो सकता है? इतना कि बीच सड़क पर एक बच्चा पड़ा तड़प रहा हो. बीस साल की ही तो उम्र थी. मां के लिए बच्चा ही था अब तक. सड़क पर पड़ा घिसटता रहा, तड़पता रहा, सिसकता रहा. पर एक भी इंसान उसकी मदद के लिए आगे नहीं आया.

क्या खूब तरक्की की है हमने. घरों से निकल कर फ्लैट में पहुंच गए. मोहल्लों को अलविदा कहकर कॉलोनी तक आ गए. अपनों और पड़ोसियों को छोड़ अपने इर्द-गिर्द खुद की सोसायटी खड़ी कर ली. अपने आसपास ऊंची-ऊंची इमारतों की दीवारें तान दीं. फिर फख्र से कहना शुरू कर दिया कि हम शहर में रहते हैं. हम दिल्ली में रहते हैं. पर क्या वाकई हम सब जिंदा हैं? क्या सचमुच हम सब जी रहे हैं या फिर मुर्दों की भीड़ के बीच हम सब खुद मुर्दा बन चुके हैं?

माफ कीजिएगा. इतनी कड़वी बातें हम हरगिज न कहते. पर क्या करें जब हमारे और आपके शहर के बीचोंबीच किसी पथरीली सड़क पर बीस साल का एक नौजवान यूं घिसट-घिसट और सिसक-सिसककर दम तोड़ दे और उसकी मदद के लिए दो हाथ भी न उठें, तो फिर खुद के जिंदा होने पर शक न हो तो क्या हो?

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'कहां तो तय था चिरागां हरेक घर के लिए
कहां चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए'

तो आपने एक सभ्य समाज के सभ्य इंसानों की सभ्यता तो देख ली. अब आपको ये भी बता देते हैं कि एक भरे-पूरे शहर से अचानक सारे इंसान कहां गुम हो गए? दरअसल बेचैन कर देने वाली ये तस्वीरें दिल्ली के विवेक विहार इलाके की हैं. तारीख थी 20 जुलाई और वक्त रात के ठीक साढ़े ग्यारह बजे. मां के लिए दवा लेने उसका इकलौता लाडला स्कूटी पर बाहर निकलता है. इसी के बाद हुआ वह हादसा, जो काश बस कहानी ही होती, ताकि इंसानियत शर्मिंदगी से बच जाती.

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