Hama Massacre 1982: सीरिया से भागकर रूस में शरण ले चुके राष्ट्रपति बशर अल असद के पिता हाफिज अल असद ने साल 1982 में हमा नरसंहार को अंजाम दिया था. जिसके तहत शहर में लगभग 30,000 से ज्यादा लोगों की हत्या कर दी गई थी. उस नरसंहार को असद के खिलाफ सुन्नियों के सीरियाई मुस्लिम ब्रदरहुड के विद्रोह के बाद अंजाम दिया गया था. हमा नरसंहार आधुनिक मध्य पूर्वी इतिहास की एक अहम और दुखद घटना थी, जिसकी वजह से सीरिया में भारी हिंसा और राजनीतिक उठापटक देखने को मिली थी.
सरकार और विपक्ष के बीच तनाव
इतिहास के काले पन्नों पर दर्ज ये नरसंहार वर्तमान राष्ट्रपति बशर अल-असद के पिता हाफ़िज अल-असद के राष्ट्रपति काल में हुआ था. हाफ़िज़ अल-असद बाथ पार्टी के नेता थे और 1971 से ही वे सीरिया पर तानाशाह के तौर पर शासन कर रहे थे. यह घटना सुन्नी-प्रभुत्व वाले विपक्ष, विशेष रूप से सीरियाई मुस्लिम ब्रदरहुड और धर्मनिरपेक्ष, अलावी-प्रभुत्व वाली बाथिस्ट सरकार के बीच तनाव से उत्पन्न हुई थी.
फरवरी 1982 में शुरू हुआ था विद्रोह
1970 के दशक के अंत और 1980 के दशक की शुरुआत में, सुन्नी मुस्लिम ब्रदरहुड द्वारा सरकार और सुरक्षा बलों को निशाना बनाकर विरोध किया गया था और विद्रोह की घटनाएं बढ़ रही थीं. संघर्ष सुन्नी विपक्ष के गढ़, हमा शहर में बड़े पैमाने पर विद्रोह के बिंदु तक बढ़ गया था. फरवरी 1982 में, ब्रदरहुड ने हमा में बड़े पैमाने पर विद्रोह शुरू कर दिया था, जिसमें सरकारी अधिकारियों और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाकर हमला किया गया था.
27 दिनों का खूनी खेल
इसके जवाब में, हाफ़िज़ अल-असद ने विद्रोह को दबाने के लिए अपने भाई, रिफ़ात अल-असद के नेतृत्व में एक सैन्य अभियान का आदेश दिया था. इस अभियान के तहत शहर पर अंधाधुंध गोलाबारी और हवाई बमबारी की गई थी. सीरियाई अरब सेना ने टैंकों और भारी तोपखाने का इस्तेमाल किया था, 2 से 27 फ़रवरी, 1982 तक यानी लगभग 27 दिनों तक हमा की घेराबंदी करके पूरे इलाके तबाह कर दिए गए थे और बड़ी संख्या में नागरिक हिंसा के बीच फंस गए थे.
जनरल रिफ़ात अल-असद ने संभाली थी कमान
असल में, सीरियाई अरब सेना और रक्षा कंपनियों के अर्धसैनिक बल ने राष्ट्रपति हाफ़िज़ अल-असद के आदेश पर, बाथिस्ट सरकार के खिलाफ़ मुस्लिम ब्रदरहुड द्वारा किए गए विद्रोह को दबाने के लिए 27 दिनों तक हमा शहर की घेराबंदी की थी. मुस्लिम ब्रदरहुड सहित सुन्नी मुस्लिम समूहों ने 1976 में एक अभियान शुरू किया था, जिसे जनरल रिफ़ात अल-असद की कमान में सीरियाई अरब सेना और अलावी मिलिशिया द्वारा हमा में किए गए सुन्नी विरोधी नरसंहार में बेरहमी से कुचल दिया गया था.
3 महीने बंद थे संचार, बिजली और खाद्य आपूर्ति
ऑपरेशन शुरू होने से पहले, हाफ़िज़ अल-असद ने हमा को बाहरी दुनिया से अलग करने के आदेश जारी किया था. वहां प्रभावी रूप से मीडिया ब्लैकआउट लागू किया गया, शहर में महीनों तक संचार, बिजली और खाद्य आपूर्ति को भी पूरी तरह से बंद कर दिया गया था. पश्चिमी देशों की शुरुआती कूटनीतिक रिपोर्टों में कहा गया कि 1,000 लोग मारे गए. लेकिन बाद के अनुमान अलग-अलग थे. इस नरसंहार के दौरान हमा में मौजूद रॉबर्ट फिस्क के मुताबिक मरने वालों की संख्या 20,000 के आसपास थी. जबकि सीरियाई मानवाधिकार समिति और एसएनएचआर ने यह तादाद 40,000 थी.
हत्या, विनाश और लूटपाट
रॉबर्ट फिस्क ने बताया था कि अंधाधुंध बमबारी ने शहर के अधिकांश हिस्से को तहस-नहस कर दिया था और पीड़ितों में से अधिकांश नागरिक थे. द ग्लोब एंड मेल में रिपोर्ट करते हुए पैट्रिक सील ने इस ऑपरेशन को हत्या, विनाश और लूटपाट पर आधारित दो सप्ताह का तांडव करार दिया था, जिसने शहर को तबाह कर दिया और कम से कम 25,000 शहरवासियों को मार डाला.
यह नरसंहार हमा के सुन्नी समुदाय के खिलाफ सांप्रदायिक दुश्मनी से प्रेरित था. नरसंहार की स्मृति सीरियाई संस्कृति का एक महत्वपूर्ण पहलू बनी हुई है और आज भी सीरियाई लोगों के बीच मजबूत भावनाओं को जगाती है. लोग भड़क उठते हैं.
भयानक नतीजे
मृत्यु दर का अनुमान व्यापक रूप से तो नहीं लगाया जा सकता, लेकिन आम तौर पर यह कहा जाता है कि उस नरसंहार में करीब 30 हजार से ज्यादा लोग मारे गए थे, जिनमें बड़ी संख्या में आम नागरिक शामिल थे. हज़ारों लोग घायल हुए या विस्थापित हुए थे. पूरे शहर को तबाही का सामना करना पड़ा था. इस नरसंहार ने मुस्लिम ब्रदरहुड के विद्रोह को प्रभावी ढंग से कुचल दिया था और वो सीरिया में एक अहम विपक्षी ताकत थे, जिन्हें कुचल दिया गया था.
क्रूर नेता के तौर पर जाने गए हाफ़िज़ अल-असद
हमा नरसंहार ने तत्कालीन राष्ट्रपति हाफ़िज़ अल-असद की छवि को एक क्रूर नेता के रूप में स्थापित कर दिया था, जो सत्ता और देश पर कंट्रोल बनाए रखने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार थे. इस घटना ने सीरियाई लोगों में व्यापक खौफ भर दिया था, जिसकी वजह से दशकों तक असहमति और विरोध को दबाया गया. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस नरसंहार की निंदा तो की गई, लेकिन हाफिज असद के शासन के खिलाफ कोई महत्वपूर्ण कार्रवाई नहीं की गई.
1940 से चला आ रहा था टकराव
सीरिया की बाथ पार्टी बाथवाद, अरब राष्ट्रवाद और अरब समाजवाद की विचारधाराओं की वकालत करती है. इस पार्टी का साल 1940 से ही मुस्लिम ब्रदरहुड के साथ टकराव रहा है, जो एक सुन्नी इस्लामवादी विचारधारा की वकालत करने वाला समूह है. दोनों समूह मौलिक रूप से विरोधी थे. बाथ पार्टी नाममात्र धर्मनिरपेक्ष, राष्ट्रवादी थी.
सूक और ज़मीनी सत्ता पर सुन्नियों का दबदबा
मुस्लिम ब्रदरहुड, अन्य इस्लामवादी समूहों की तरह, राष्ट्रवाद को गैर-इस्लामी और धर्म को राजनीति और सरकार से अविभाज्य मानता था. बाथ पार्टी के ज़्यादातर सदस्य साधारण, अस्पष्ट पृष्ठभूमि से थे और कट्टरपंथी आर्थिक नीतियों के पक्षधर थे, जबकि सुन्नी मुसलमानों ने सीरिया के सूक और ज़मीनी सत्ता पर अपना दबदबा कायम कर रखा था. वे अर्थव्यवस्था में सरकारी दखल को अपने हितों के लिए ख़तरा मानते थे. सभी सुन्नी गणमान्य लोग कट्टरवाद में विश्वास नहीं करते थे, लेकिन जो लोग कट्टरवाद में विश्वास नहीं करते थे, वे भी ब्रदरहुड को बाथ के खिलाफ़ एक उपयोगी उपकरण के रूप में देखते थे.
सरकारी हमले से पहले हमा की कहानी
खास तौर पर हमा शहर ज़मीन पर काबिज रूढ़िवाद और मुस्लिम ब्रदर्स का गढ़ था और लंबे समय से बाथिस्ट राज्य का एक मज़बूत विरोधी रहा था. दोनों के बीच पहला पूर्ण संघर्ष 1963 के तख्तापलट के तुरंत बाद हुआ था, जिसमें बाथ पार्टी ने पहली बार सीरिया में सत्ता हासिल की थी. अप्रैल 1964 में, हमा में दंगे भड़क उठे थे, जहां मुस्लिम विद्रोहियों ने सड़कों पर अवरोध लगाए थे. खाद्य रसद और हथियारों का भंडार जमा किया था. शराब की दुकानों में तोड़फोड़ की थी.
इस्माइली बाथ मिलिशिया के एक सदस्य के मारे जाने के बाद, दंगे तेज हो गए थे और विद्रोहियों ने हमा में बाथ पार्टी के हर निशान पर हमला कर दिया था. इस विद्रोह को कुचलने के लिए टैंक लाए गए और मुस्लिम ब्रदरहुड के 70 सदस्य मारे गए थे, कई अन्य लोग घायल हो गए थे या पकड़े गए थे, और इससे भी अधिक लोग गायब हो गए थे.