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बलिया कांडः विधायक का संरक्षण, सत्ता की हनक, ऐसे बना धीरेंद्र दबंग

दबंगई और सियासी संरक्षण के अहसास में चूर धीरेंद्र प्रताप सिंह ने निहत्थे और बेगुनाह लोगों पर गोलियां बरसाने से भी गुरेज़ नहीं किया. वो भी चोरी-छिपे या रात के अंधेरे में नहीं, बल्कि दिन के उजाले में सैकड़ों लोगों, एसडीएम, बीडीओ, सीओ और एसओ जैसे आला अफ़सरों की मौजूदगी में.

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एसटीएफ ने धीरेंद्र प्रताप सिंह को राजधानी लखनऊ से गिरफ्तार किया
एसटीएफ ने धीरेंद्र प्रताप सिंह को राजधानी लखनऊ से गिरफ्तार किया
स्टोरी हाइलाइट्स
  • सत्ता के नशे में चूर रहता था धीरेंद्र
  • अधिकारियों को हड़काने में आगे रहा
  • वायरल ऑडियो वीडियो से खुला राज

सब वक़्त-वक़्त की बात है, जब वक़्त का पहिया घूमता है, तो अच्छे-अच्छों की हवा खराब हो जाती है. बलिया से एक ऑडियो और वीडियो वायरल हुआ. जिसमें एक ही शख्स क़ैद था. अब उस शख्स की हवा खराब है. लेकिन वीडियो और ऑडियो में दिखने वाले उस शख्स की हवा खराब होने से पहले उसका मनोबल कुछ इतना बढ़ा हुआ था कि उसने खुद बलिया की हवा खराब कर दी. 

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दबंगई और सियासी संरक्षण के अहसास में चूर उस शख्स ने निहत्थे और बेगुनाह लोगों पर गोलियां बरसाने से भी गुरेज़ नहीं किया. वो भी चोरी-छिपे या रात के अंधेरे में नहीं, बल्कि दिन के उजाले में भरी दोपहर को, सैकड़ों लोगों, एसडीएम, बीडीओ, सीओ और एसओ जैसे इलाके के आला अफ़सरों की मौजूदगी में, उनकी आंखों के सामने. उस गोलीकांड में एक शख्स की मौत हो गई और इसी के साथ सूबे में सियासी भूचाल आ गया.

लेकिन अब सवाल ये है कि आख़िर बलिया में ये सबकुछ हुआ कैसे? ऐसे दंबग और सिरफिरे शख्स के सिर पर आख़िर किसका हाथ था? आख़िर उसमें इतनी हिम्मत या फिर यूं कहें कि बुजदिली कहां से आई कि उसने निहत्थे और बेगुनाह लोगों के सीने पर संगीन तानने से भी गुरेज़ नहीं किया? और सबसे अहम ये कि अब इस वारदात को कई रोज़ गुज़रने के बावजूद ये शख्स आख़िर कहां फरार था? क्यों लाख सरकारी दावों के बावजूद वो पुलिस और क़ानून के शिकंजे से दूर था? और क्यों सबकुछ गुज़र जाने के बाद पुलिस-प्रशासन सिर्फ गुबार ही देख रहा था? 

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हम आपको इन सारे सवालों का जवाब एक-एक कर देंगे, लेकिन सबसे पहले बलिया के दुर्जनपुर गांव में दबंगई दिखा कर खून की होली खेलने वाले उस शख्स का नाम है धीरेंद्र प्रताप सिंह. जो गांव दुर्जनपुर, बलिया, यूपी का रहने वाला है. उसे इलाके के बीजेपी विधायक सुरेंद्र सिंह का दायां हाथ माना जाता है. सत्ता की हनक उसके सिर चढ़कर बोल रही थी. लेकिन अब वो कानून की नज़र में बलिया कांड का मुख्य आरोपी है.

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ये है बलिया कांड की इनसाइड स्टोरी
असल में धीरेंद्र की उस इलाक़े की राशन दुकान में खास रुचि थी. बलिया के दुर्जनपुर गांव में दो सस्ते गल्ले की दुकान को लेकर पिछले 4 साल से तनाव था. मुख्य आरोपी धीरेंद्र प्रताप सिंह उर्फ डब्लू लगातार इसे लेकर शिकायतें कर रहा था. चूंकि सिर पर सियासी हाथ था, तो अक्सर अफ़सरों से बात करते हुए तेवर भी तीखे हो जाते थे. लेकिन इसी अहंकार में एक रोज़ वो लोगों को गोलियों से भूनने लगा, ये किसी ने सोचा नहीं था. बलिया के दुर्जनपुर गांव में राशन दुकानों के आबंटन को लेकर ये गोलियां अचानक ही नहीं चली. इसकी ज़मीन काफी पहले ही तैयार हो चुकी थी. और सिस्टम ने वक्त-वक्त पर इसी खूनी खिलौने में खूब चाबी भरी. 

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जब मामला हाथ से निकलने लगा, तो दुर्जनपुर से सस्ते गल्ले की दोनों दुकानों को निरस्त कर दिया गया. फिलहाल ये दोनों ही दुकानें हाईकोर्ट में लंबित हैं. लेकिन इसी बीच अब दुर्जनपुर में नए सिरे से सस्ते गल्ले की दुकानों की चयन प्रक्रिया शुरू की गई. 15 अक्टूबर की दोपहर को दुर्जनपुर में इन्हीं नई दुकानों के लिए एसडीएम और सीओ की मौजूदगी में बैठक चल रही थी. जहां ग्राम पंचायत और गांव के के सैकड़ों लोग मौजूद थे. इन दुकानों के लिए चार महिला समूहों ने आवेदन किया था, लेकिन फैसला ना होने की वजह से दो समूहों के बीच वोटिंग की नौबत आ गई. 

एसडीएम सुरेश कुमार पाल, सीओ चंद्रकेश सिंह, और एसओ प्रवीण कुमार सिंह ने व्यवस्था बनाई कि जिसके पास आधार कार्ड अथवा अन्य कोई पहचान पत्र होगा, वही वोट कर पाएगा. एक पक्ष के लोग आधार कार्ड लेकर आए थे. दूसरे पक्ष के लोगों के पास पहचान पत्र नहीं था. इसी बात पर हंगामा हो गया. हालात यूं बिगड़े कि बीडीओ बैरिया को बैठक स्थगित करनी पड़ी, प्रशासन के खिलाफ़ नारेबाज़ी होने लगी और देखते ही देखते ईंट पत्थर चलने लगे. बस इसी दौरान सिरफिरे धीरेंद्र उर्फ डब्ल्यू ने फायरिंग कर दी. 

धीरेंद्र की गोलीबारी में दुर्जनपुर के निवासी जयप्रकाश पाल को 4 गोलियां लगीं और उसकी जान चली गई. लेकिन बात इससे आगे भी है. भीड़ के बीच अंधाधुंध फायरिंग के फ़ौरन बाद इसी मोस्टवांटेड धीरेंद्र को वहां मौजूद पुलिसवालों ने दबोच भी लिया था. लेकिन वाह री यूपी पुलिस, जिसे सबकी आंखों के सामने दबोचा, जिसे दबोचते हुए वहां मौजूद लोगों ने ना सिर्फ़ देखा बल्कि अपने-अपने मोबाइल फ़ोन के कैमरों में क़ैद भी कर लिया. लेकिन वो पुलिस की मेहरबानी से अफसरों की मौजूदगी में फरार हो गया. घटना के बाद शासन ने उस पर 25 हज़ार रुपये के इनाम भी रखा. 

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लेकिन आरोपी धीरेंद्र नहीं मिला. वो पुलिस के आगे आगे चल रहा था. आपको जानकर हैरानी होगी कि धीरेंद्र प्रताप सिंह ने सूबे की राजधानी लखनऊ में शरण ली. वो घटना के बाद लखनऊ जा पहुंचा था. बताया जाता है कि वो बिहार भागने की तैयारी में था. लेकिन उससे पहले ही उसे राजधानी के गाजीपुर थाना क्षेत्र के पॉलिटेक्निक इलाके से गिरफ्तार कर लिया गया. इंटेलिजेंस के आधार पर उसकी गिरफ्तारी हुई.

एसटीएफ के अनुसार उसकी लोकेशन पहले बिहार थी. उसके पास न तो मोबाइल था और न ही कोई असलहा. धीरेंद्र प्रतार सिंह की गिरफ्तारी का न तो कोई विरोध हुआ और न ही बल प्रयोग करना पड़ा. एसटीएफ के मुताबिक वह अपने किसी विश्वास पात्र के घर जाना चाहता था, जहां वह कुछ दिन गुजार सके, लेकिन इसी बीच वह पकड़ा गया. अब जब सिस्टम ही ऐसा हो, तो तारीफ़ क्यों ना हो? बाकी आप समझदार हैं.

 

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