पाकिस्तान यूं ही आतंकियों का स्वर्ग के नाम से बदनाम नहीं है. अकेले इस मुल्क में 70 हज़ार से ज़्यादा लोग सिर्फ़ आतंकवादी हमलों में मारे जा चुके हैं. इन हालात के लिए पाकिस्तान के हुक्मरान चाहे लाख बहाने ढूंढें, मगर हक़ीक़त यही है कि आतंकवाद को ख़त्म करने को लेकर पाकिस्तान कभी गंभीर रहा ही नहीं. बल्कि वो तो आतंकवाद को खुलेआम बढ़ावा देता रहा है. ऐसे में पुलवामा हमले के बाद एक बार फिर दबाव में आकर ही सही पाकिस्तान ने अपने आतंकी संगठनों पर कार्रवाई का पुराना हथकंडा आज़माया है. कई आतंकी हिरासत में लिए हैं, सत्तर से ज़्यादा संगठनों पर पाबंदी लगी है. लेकिन सवाल वही पुराना है, ये भी बस ड्रामा ना हो.
13 दिसंबर 2001
भारतीय संसद भवन पर हमला हुआ. जिसमें 9 लोगों की मौत हुई. इस वारदात का इल्ज़ाम आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मौलाना मसूद अज़हर पर था. कार्रवाई के नाम पर मसूद अज़हर को हिरासत में तो लिया गया लेकिन एक साल बाद सबूतों की कमी के बहाने किया उसे आज़ाद कर दिया गया.
26 नवंबर 2008
मुंबई में आतंकी हमला हुआ. जिसमें 66 बेगुनाह लोगों की मौत हुई. इस हमले का इल्ज़ाम आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैय्यबा के ज़कीउर्र रहमान लखवी और हाफ़िज़ सईद पर था. कार्रवाई के नाम पर पाकिस्तान ने जांच का भरोसा दिया. इसके बाद दिसंबर 2008 में लखवी को गिरफ्तार भी किया गया. लेकिन 9 अप्रैल 2015 को सबूतों की कमी के बहाने उसे भी रिहा कर दिया गया.
2 जनवरी 2016
पठानकोट के एयरफ़ोर्स स्टेशन पर हमला हुआ. इस आतंकी हमले में तीन सुरक्षाकर्मी शहीद हो गए. इस वारदात को अंजाम देने का इल्ज़ाम आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मौलाना मसूद अज़हर पर ही था. पाकिस्तान ने कार्रवाई के नाम पर फिर मसूद अज़हर को हिरासत में लिया. लेकिन चंद दिनों बाद उसके खिलाफ सारे सबूतों को मांगने से इनकार कर दिया.
18 सितंबर 2016
कश्मीर में उरी के आर्मी कैंप पर हमला किया गया. इस हमले में 18 जवान शहीद हो गए. इस घटना का इल्ज़ाम भी आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मौलाना मसूद अज़हर पर था. कार्रवाई करने के लिए भारत ने फिर पाकिस्तान को डोज़ियर सौंपा. तमाम सबूत भी दिए. लेकिन नतीजा वही पुराना कि पाक सरकार ने तमाम इल्ज़ामों से इनकार कर दिया.
ये वो रिकॉर्ड है, जिसे बजा-बजा कर पाकिस्तान ने पूरी दुनिया को पका दिया है. हर बार एक नया आतंकी हमला होता है. हर बार पूरे सबूतों के साथ पाकिस्तान में फल-फूल रहे आतंकी संगठनों पर कार्रवाई की मांग की जाती है. और हर बार पाकिस्तान कुछ दिनों की तफ्तीश का ड्रामा करने के बाद सभी के सभी गुनहगारों को सबूतों की कमी के नाम पर आज़ाद कर देता है.
इस बार भी जब 14 फ़रवरी को पाकिस्तान में बैठे मौलाना मसूद अज़हर के इशारे पर जब आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर हमला किया. तो शायद उसे उम्मीद थी कि इस बार भी हिंदुस्तान वैसे ही सबूतों के साथ पाकिस्तान से आतंकियों पर कार्रवाई की मांग करेगा. लेकिन इस बार पाकिस्तान का दांव उल्टा पड़ गया. हिंदुस्तान ने पहले सबूत तो नहीं सौंपे, बल्कि पाकिस्तानी हुक्मरानों से कोई आस लगाने के बजाय सीधे जैश-ए-मोहम्मद के बालाकोट कैंप पर ही धावा बोल दिया. भारतीय वायु सेना ने एयर स्ट्राइक कर आतंकियों के अड्डे पर इतने बम मारे कि सबकुछ धुआं-धुआं हो गया. ये और बात है कि बाद में पाकिस्तान के कहने पर सबूत के तौर पर भारत ने उसे अपना डोज़ियर भी सौंप दिया. जिसमें हमले की इस साज़िश में शामिल आतंकियों के नाम पते के साथ-साथ पूरा लेखा-जोखा भी दर्ज था.
अकाट्य सबूत और एयर स्ट्राइक की वजह से पाकिस्तान की पूरी दुनिया में इतनी किरकिरी हो गई कि इस बार उसने अपनी रही-सही इज्ज़त बचाए रखने के लिए एक और ही नया शिगूफ़ा छोड़ दिया. और ये शिगूफ़ा एयर स्ट्राइक के ठीक आठवें दिन एक प्रेस कांफ्रेंस की सूरत में सामने आया. जब पाकिस्तान ने दुनिया को दिखाने के लिए अपने 40 आतंकवादियों को हिरासत में लेने और 70 आतंकी संगठनों पर प्रतिबंध लगाने का ऐलान किया.
अब इसे हिंदुस्तान का दबाव कहें या फिर कुछ और पाकिस्तान ने जिन 40 आतंकियों को हिरासत में लिया है, उनमें मसूद अज़हर के भाई अब्दुल रऊफ और साला हमाद अज़हर भी शामिल है. जिनके नाम हिंदुस्तान ने अपने डोज़ियर में लिखे हैं. जबकि प्रतिबंधित संगठनों में जैश-ए-मोहम्मद के साथ-साथ जमात-उद-दावा से लेकर फलाह-ए-इंसानियत का नाम भी शुमार है.
मगर, सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि कहीं पाकिस्तान की ये कार्रवाई भी उसी ड्रामेबाज़ी का हिस्सा तो नहीं? क्योंकि तारीख़ गवाह है कि पाकिस्तान कभी आतंकवादियों पर कार्रवाई को लेकर सही मायने में संजीदा नहीं रहा. और कुछ इतनी वजहों से साल दर साल पाकिस्तान में ना सिर्फ़ हज़ारों आतंकी लगातार फलते-फूलते, बल्कि दुनिया को लहूलुहान करते रहे. ऐसे में जब तक पाकिस्तान इन छुटभैये आतंकवादियों के साथ-साथ मसूद अजहर, हाफ़िज सईद, लखवी, सलाहुद्दीन और दाऊद इब्राहिम सरीखे लोगों को को उनके सही अंजाम यानी जेल या मौत की सज़ा नहीं सुनाता है, तब तक दुनिया में शायद ही कोई ऐसा होगा, जो पाकिस्तान के इस ड्रामे पर यकीन करेगा.