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2435 करोड़ रुपए के बैंक फ्रॉड केस में CBI को कोर्ट की फटकार, जज ने कहा- जानबूझकर बातें छिपाई गईं

दिल्ली की एक अदालत ने 2435 करोड़ रुपये के बैंक फ्रॉड केस की जांच कर रही सीबीआई को जमकर फटकार लगाई है. अदालत का कहना है कि जांच एजेंसी कुछ महत्वपूर्ण बातें छिपा रही है, जो कि अवज्ञा और अड़ियलपन है. इतना ही नहीं जांच भी ठीक से नहीं की गई है.

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बैंक फ्रॉड केस की जांच कर रही सीबीआई को जमकर फटकार लगाई है.
बैंक फ्रॉड केस की जांच कर रही सीबीआई को जमकर फटकार लगाई है.

दिल्ली की एक अदालत ने 2435 करोड़ रुपये के बैंक फ्रॉड केस की जांच कर रही सीबीआई को जमकर फटकार लगाई है. अदालत का कहना है कि जांच एजेंसी कुछ महत्वपूर्ण बातें छिपा रही है, जो कि अवज्ञा और अड़ियलपन है. इतना ही नहीं जांच भी ठीक से नहीं की गई है. इसमें घोर लापरवाही दिख रही है. अदालत ने कहा कि जांच निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से की जानी चाहिए.

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विशेष न्यायाधीश संजीव अग्रवाल ने सीजी पावर एंड इंडस्ट्रियल सॉल्यूशंस और इसके पूर्व प्रमोटर गौतम थापर के खिलाफ भारतीय स्टेट बैंक, औद्योगिक वित्त शाखा, मुंबई के साथ 2435 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी के मामले में प्रथम दृष्टया यह टिप्पणी की है. न्यायाधीश ने कहा, "जांच एजेंसी के पास अदालत से छिपाने के लिए कुछ सामग्री है, जिस पर वे गोपनीयता का पर्दा डालना चाहते हैं.''

अदालत का कहना था कि जांच एजेंसी सच्चाई सामने आने नहीं देना चाह रही है. 3 फरवरी को पारित आदेश में स्पष्ट निर्देशों के बावजूद सीबीआई क्राइम फाइलों को उसके अवलोकन के लिए पेश करने में विफल रही. यह भी कहा कि आदेश पारित करने के बाद सीबीआई के पास इसकी जांच करने और यदि वे चाहें तो इसे चुनौती देने के लिए पर्याप्त समय था. लेकिन ऐसा नहीं किया गया.

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न्यायाधीश ने कहा कि ऐसा करने से ये प्रतीत होता है कि जांच एजेंसी अदालत के आदेश की परवाह नहीं करती, जो गंभीर चिंता का विषय है. यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 की भावना के भी विपरीत है, जो निष्पक्ष जांच और सुनवाई सुनिश्चित करता है. अदालत ने सीबीआई प्रमुख को सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि अधिकारी 21 फरवरी तक बिना चूक के रिपोर्ट पेश करें. 

न्यायालय ने कहा कि मुख्य और पूरक आरोपपत्र को पहली नजर में पढ़ने पर पता चलता है कि जांच ठीक से नहीं की गई थी, बल्कि अनावश्यक और लापरवाही से की गई थी. न्यायाधीश ने कहा, ''जांच पूरी होने के बाद अंतिम रिपोर्ट न्यायालय में दाखिल की जाती है, फिर उसको यह देखने का पूरा अधिकार है कि एफआईआर दर्ज होने से लेकर आरोपपत्र के समापन तक क्या हुआ था.''

सीबीआई ने आरोपपत्र में कहा कि आरोपी संस्थाओं द्वारा संबंधित पक्षों को भारी मात्रा में बैंक लोन दिया गया, जिसके लिए खाता बही में समायोजन प्रविष्टियां की गईं. जांच से पता चला है कि आरोपियों ने अन्य बैंकों से प्राप्त लोन सुविधाओं का खुलासा किए बिना प्रतिभूतियों के बदले लोन लिया. रिपोर्ट के अनुसार, एसबीआई ने 2435 करोड़ रुपये की राशि में 12.81 प्रतिशत का जोखिम उठाया है.

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