दिल्ली की एक अदालत ने 10 वर्षीय लड़की से बलात्कार के जुर्म में एक नाबालिग लड़के को 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है. इसके साथ ही अपने आदेश में अदालत ने कहा है कि नाबालिग अपराधी को वर्तमान चरण में रिहा नहीं किया जा सकता है. उसे सुधार की आवश्यकता है. इसके साथ ही पीड़िता को 10.50 लाख रुपए का मुआवजा भी देने का आदेश दिया गया है.
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सुशील बाला डागर इस मामले में नाबालिग लड़के के खिलाफ सजा पर दलीलें सुन रहे थे, जिसे पहले यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण अधिनियम (पॉक्सो एक्ट) की धारा 6 (गंभीर यौन उत्पीड़न) के तहत दोषी ठहराया गया था. उसे पीड़िता के अपहरण के लिए भी दोषी ठहराया गया था. इन दोनों ही मामलो में सुनवाई के बाद अदालत ने सजा सुनाई है.
अभियोजन पक्ष के अनुसार, वारदात के वक्त अपराधी की उम्र 17 साल थी. 4 जून, 2017 को वो पीड़िता को जबरन अपने साथ लेकर घर गया. वहां उसे अपनी हवस का शिकार बनाया. मंगलवार को सुनाए गए अपने फैसले में न्यायालय ने अपराध को कम करने वाली और गंभीर परिस्थितियों पर विचार करने के बाद पॉक्सो एक्ट के तहत 10 साल की सश्रम कारावास की सजा सुनाई है.
इसके साथ ही अपहरण के अपराध के लिए सात साल की सजा सुनाई है. न्यायालय ने कहा कि दोनों सजाएं साथ चलेंगी. इस बीच, न्यायालय ने संबंधित अधिकारियों को फटकार लगाते हुए कहा कि नाबालिग के 79 दिनों तक सुधार गृह में रहने के बावजूद, उसकी आईसीपी और पुनर्वास कार्ड तैयार नहीं किया गया और न ही जमानत पर रिहा होने के बाद परिवीक्षा अधिकारी ने काम किया.
अदालत ने कहा, "यह किशोर न्याय (जेजे) प्रणाली की विफलता, जेजे अधिनियम और जेजे मॉडल नियमों के कानूनी प्रावधानों का पालन न करने को दर्शाता है. आईसीपी और आवधिक समीक्षा के नाम पर समय-समय पर औपचारिक रिपोर्ट प्रस्तुत की गई हैं. उनका सीमित मूल्य है, क्योंकि वे किसी पुनर्वास प्रक्रिया का हिस्सा नहीं हैं." अदालत ने इस मुद्दे संबंधित दिल्ली सरकार को आदेश दिए हैं.