साल 2019 में एक साल की मासूम बच्ची का अपहरण कर उसके साथ बलात्कार करने के जुर्म में एक व्यक्ति को 10 साल सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई है. इसके साथ ही अदालत ने पीड़ित बच्ची के परिवार को 13.5 लाख रुपए का मुआवजा देने का आदेश दिया है. अदालत ने कहा कि यौन अपराधियों के प्रति समाज की घृणा अदालतों के फैसलों में झलकनी चाहिए.
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश मनोज कुमार आरोपी के खिलाफ सजा पर बहस सुन रहे थे. उसे पिछले साल दिसंबर में बलात्कार और अपहरण के आरोप में बीएनएस और पॉक्सो एक्ट की संबंधित धाराओं के तहत यौन उत्पीड़न के लिए दोषी ठहराया गया था. अपने फैसले में अदालत ने कहा कि बच्चों के खिलाफ अपराधों में खतरनाक बढ़ोतरी देखते हुए पॉक्सो एक्ट बनाया गया था.
न्यायाधीश ने कहा, "बच्चों को निशाना बनाने वाले यौन अपराधियों के प्रति समाज में जो घृणा है, वो न्यायालयों के निर्णयों में भी झलकनी चाहिए." उन्होंने कहा कि इस मामले में सजा कम दिए जाने की वजह ये है कि अपराधी युवा है और उसे सुधारा जा सकता है. इसके अलावा उसका पिछला इतिहास साफ सुथरा है. वो समाज के लिए खतरा बनने की स्थिति में नहीं दिख रहा है.
न्यायालय ने इसके बाद अपराधी को पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत 10 साल के कठोर कारावास और अपहरण के अपराध के लिए तीन साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई. दोनों सजाएं एक साथ चलेंगी. अदालत ने कहा कि आपराधिक न्याय प्रणाली का उद्देश्य न केवल अपराधी को आनुपातिक दंड देकर उसे राहत पहुंचाना है, बल्कि पीड़ित को हमेशा के लिए पुनर्वासित करना भी है.
बताते चलें कि 18 फरवरी को रेप के एक मामले में अदालत ने अपराधी को 25 साल की सजा सुनाई है. साल 2012 में 2 साल की एक बच्ची से बलात्कार के जुर्म में अपराधी पर पांच हजार का जुर्माना भी लगाया गया है. अदालत में बचाव पक्ष ने दलील दी थी कि अपराध करते समय वो शराब के नशे में था. इस पर न्यायाधीश ने कहा कि नशे की हालत में होना अपराध को बचा नहीं सकता.
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश बबीता पुनिया 26 वर्षीय आरोपी के खिलाफ सजा पर दलीलें सुन रही थीं. इसके बाद उन्होंने आईपीसी और पॉक्सो एक्ट की संबंधित धाराओं के तहत उसे दोषी ठहराया. विशेष लोक अभियोजक श्रवण कुमार बिश्नोई ने कहा कि दोषी इस जघन्य कृत्य के लिए किसी भी तरह की नरमी का हकदार नहीं है. अदालत ने अपने फैसले में कहा की दोषी को 25 साल की सजा सुनाई जाती है.
अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा कि सजा की अवधि समाज को उचित प्रतिशोध और पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करेगी. दोषी को उसके कृत्य की गंभीरता का एहसास कराएगी. अदालत ने बचाव पक्ष के वकील के इस तर्क पर ध्यान दिया कि अपराध पूर्व नियोजित नहीं था. अदालत ने कहा, "बेशक अपराध के समय दोषी नशे में था. लेकिन यह कोई सजा को कम करने वाला कारक नहीं है.''