
Anand Mohan Singh: वो आजाद भारत का पहला ऐसा नेता है, जिसे एक कत्ल के लिए फांसी की सजा दी गई थी. ये कत्ल भी किसी आम शख्स का नहीं बल्कि एक जिले के डीएम का था. हालांकि बाद में उस नेता की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया गया था. मगर उसी नेता को वक्त से पहले ही रिहा करने के लिए बिहार की सरकार ने अपने सारे कायदे कानून बदल डाले और उसे वक्त से पहले रिहा कर दिया गया. अब देश की सबसे बड़ी अदालत ने बाहुबली नेता आनंद मोहन सिंह की वक्त से पहले रिहाई को लेकर बिहार सरकार से जवाब तलब किया है.
11वें नंबर पर है आनंद मोहन सिंह का नाम
बिहार के 26 ऐसे मुजरिम हैं, जिन्हें सरकार की ओर से की गई कानून की एक तब्दीली ने रातों-रात जेल की सलाखों से बाहर ला दिया. ये 26 कोई मामूली कैदी नहीं हैं, जिन्हें अचानक से आजादी मिली है. बल्कि ये सभी के सभी अपने-अपने गुनाहों की सजा काटते हुए पिछले कई सालों से राज्य की अलग-अलग जेलों में बंद थे. इन सभी पर बिहार में सरकारी अफसरों या कर्मचारियों की हत्या का जुर्म साबित हो चुका है. और इसी लिस्ट में 11वें नंबर पर एक नाम है आनंद मोहन सिंह का.
आजीवन कारावास में बदली फांसी की सजा
जी हां, उस आनंद मोहन सिंह का जिसे इस देश के इतिहास में पहली बार एक विधायक रहते हुए किसी अदालत ने फांसी की सजा सुनाई थी. लेकिन फांसी की वो सजा पहले आजीवन कारावास की सजा में बदली और अब आजीवन कारावास की सजा होने के बावजूद बिहार सरकार के एक फैसले से उसे रिहाई मिल गई. यानी इस एक आनंद मोहन को रिहा करने के लिए सरकार ने पूरा का पूरा कानून ही बदल डाला.
जी कृष्णैया के परिवार ने जताया विरोध
रिहाई के बाद आनंद मोहन सिंह का जश्न हुआ. जेल में रहते हुए पैरोल पर पहले बेटी की शादी, फिर पैरोल पर ही बेटे की सगाई और अब रिहाई के बाद बेटे की शादी. जाहिर है कत्ल के एक मुजरिम की इस रिहाई ने उस परिवार को एक बार फिर से सदमे में ला दिया है, जिसके सदस्य की हत्या के जुर्म में आनंद मोहन को ये सजा हुई थी. यानी बिहार के आईएएस अफसर रहे जी कृष्णैया का परिवार. ऐसे में कृष्णैया के घरवाले और आईएएस एसोसिएशन के विरोध के बाद अब एक बार फिर से ये सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या आनंद मोहन की ये आजादी आनेवाले दिनों भी बरकरार रह पाएगी? या फिर उसे एक बार फिर से वहीं जाना होगा, जहां रहना अदालत ने उसके लिए तय किया था, यानी जेल.
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब
असल में आनंद मोहन की रिहाई के लिए सरकार के अपने ही कानून को बदल डालने के इस फैसले को जी कृष्णैया के घरवालों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है और अब सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर बिहार सरकार के साथ-साथ आनंद मोहन सिंह को भी नोटिस जारी कर दो हफ्तों में जवाब देने को कहा है. जाहिर है दो हफ्तों के बाद सुप्रीम कोर्ट एक बार फिर से इस मामले की सुनवाई करेगा और फिर इस पर फैसला सुनाएगा. लेकिन आइए इससे पहले कि सुप्रीम कोर्ट में लंबित इस मामले के बारे में आपको तफ्सील से बताएं, आइए पहले समझ लेते हैं कि आखिर इस मामले की शुरुआत कहां से हुई?
10 अप्रैल 2023 पटना, बिहार
राज्य के गृह विभाग ने 10 अप्रैल को अचानक अपने जेल के नियमों में बदलाव कर दिया. जिसके मुताबिक नियमावली से ड्यूटी पर तैनात सरकारी कर्मचारी की हत्या वाली लाइन को हटा दिया गया और इसी के साथ पिछले 16 सालों से बिहार के सहरसा जेल में बंद बाहुबली आनंद मोहन की जेल से रिहाई का रास्ता साफ हो गया. असल में सरकार ने सरकारी कर्मचारियों की हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे कैदियों को एक तय सीमा के बाद रिहा करने के लिए कानून में ये बदलाव किया, जिसका फायदा आनंद मोहन समेत 26 कैदियों को मिला और वो जेल से छूट गए. लेकिन सरकार का ये फैसला जहां आनंद मोहन और उसके परिवार के लिए एक लॉटरी साबित हुआ, वहीं जी कृष्णैया के परिवार के लिए ये फैसला एक सदमा लेकर आया. वो सदमा जिसने 29 साल पुराने जख्म को एक बार फिर कुरेद डाला.
सुप्रीम कोर्ट ने बढ़ाई सरकार की परेशानी
लेकिन सवाल ये है कि आखिर बिहार सरकार को जेल नियमावली में अचानक इस बदलाव की ज़रूरत क्यों पड़ी? इस बदलाव के मायने क्या हैं? सरकारी कर्मचारियों के हत्यारों पर सरकार की इतनी रहमदिली की वजह क्या है? कहीं ऐसा तो नहीं कि सरकार के इस फैसले के पीछे कोई राजनीतिक मकसद छुपा हुआ है? जैसा कि विपक्ष सवाल कर रहा है. आनंद मोहन जैसे बहुबली को रिहा कर कहीं सरकार चुनाव में इसका फायदा तो नहीं उठाना चाहती है? जाहिर है जेल नियमावली में बदलाव और आनंद मोहन की रिहाई के साथ ही इस मामले को लेकर बिहार में सियासी सरगर्मी तेज हो गई है. लेकिन अब जिस बात ने बिहार सरकार की परेशानी बढ़ा दी है, वो है इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट का सरकार को नोटिस जारी करना.
जी कृष्णैया की पत्नी ने दाखिल की अर्जी
असल में बाहुबली आनंद मोहन बिहार के डीएम रहे जी कृष्णैया के कत्ल का गुनहगार है और इसी जुर्म में उसे आजीवन कारावास की सजा मिली है. और सरकार के इस फैसले के बाद जी कृष्णैया के घरवाले खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं. ऐसे में जी कृष्णैया की पत्नी ने सरकार के इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल की है. सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने जी कृष्णैया की पत्नी को ओर से बिहार सरकार के इस फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए बिहार सरकार और आनंद मोहन को नोटिस जारी कर दिया और दो हफ्ते बाद फिर से इस मामले पर सुनवाई करने की बात कही. जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जेके माहेश्वरी की बेंच ने बिहार सरकार से रिहाई की पूरी प्रक्रिया की जानकारी और उसका रिकॉर्ड भी मांगा.
आईएएस एसोसिएशन का दखल
सबसे बड़ा सवाल यही है कि कानून में लाया गया कोई बदलाव आखिर पहले सुनाई गई सज़ा पर कैसे लागू हो सकता है? क्योंकि आम तौर पर कोई भी नियम या कानून उसके बनने के बाद ही लागू होता है, बनने से पहले नहीं. इस मामले में जिस कानूनी तब्दीली के बाद आनंद मोहन की रिहाई की गई है, आनंद मोहन उससे 16 साल पहले ही गुनहगार करार दिया जा चुका है. वैसे इस मामले में सिर्फ जी कृष्णैया के घरवाले ही सुप्रीम कोर्ट नहीं पहुंचे हैं, बल्कि आईएएस एसोसिएशन ने भी दखल दिया है. जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर एसोसिएशन चाहे तो वो इस केस में उन्हें दखल की इजाजत दे सकते हैं. जाहिर है सुप्रीम कोर्ट के इस स्टैंड से इस मामले में अब बिहार सरकार के लिए खुद को सही साबित करने की एक बड़ी चुनौती आ खड़ी हुई है.
अब आइए पहले 29 साल पहले बिहार में हुए आईएएस अधिकारी जी कृष्णैया के कत्ल के मामले को समझ लेते हैं, जिसमें आनंद मोहन सिंह गुनहगार है.
5 दिसंबर 1994, मुजफ्फरपुर, बिहार
बिहार पिपुल्स पार्टी से जुड़े गैंगस्टर छोटन शुक्ला का कत्ल हो चुका था. छोटन के कत्ल से गुस्साए समर्थक जुलूस की शक्ल में उसकी लाश का अंतिम संस्कार करने जा रहे थे. समर्थकों के इस गुस्से बेखबर पड़ोसी जिले गोपालगंज के तत्कालीन डीएण जी कृष्णैया एक मीटिंग के बाद नेशनल हाई वे से गोपालगंज की ओर लौट रहे थे. वो एक मीटिंग में शामिल होने हाजीपुर गए थे. लेकिन मुजफ्फरपुर में छोटन शुक्ला के समर्थकों ने अचानक ही उनकी गाड़ी को घेर लिया और फिर इस काफिले में आईएएस अधिकारी जी कृष्णैया ऐसे फंसे कि फिर जिंदा निकल ही नहीं पाए. भीड़ ने जी कृष्णैया और उनकी गाड़ी पर हमला कर दिया.
आनंद मोहन ही था भीड़ को उकसाने वाला
कृष्णैया इस वाकये से अंजान थे. उन्होंने खुद को ना सिर्फ बेकसूर बताया बल्कि ये भी कहा कि उनका मुजफ्फरपुर से कोई ताल्ल्कु नहीं है, बल्कि वो तो गोपालगंज के डीएम हैं. लेकिन सिरफिरी भीड़ ने उनकी एक ना सुनी और जब तक बीएचक्यू 777 नंबर की उनकी एंबेसेडर कार से उन्हें बाहर निकाला गया, उनकी जान चुकी थी. उन्हें छोटन शुक्ला के समर्थकों ने मौत के घाट उतार दिया था और उनकी लाश सड़क के किनारे खाई में पत्थरों से कुचली पड़ी थी. और तो और उनके सिर में गोलियां भी दागी गई थी. तब खुद आनंद मोहन ने मौके पर मौजूद रह कर भीड़ को ऐसा करने के लिए उकसाया था.
3 गवाहों का अहम रोल
इस मामले के तीन चश्मदीद थे. पहला डीएम जी कृष्णैया के बॉडीगार्ड टीएम हेंब्रम, दूसरा एक फोटोग्राफर पीएल टांगरी और तीसरा डीएम के ड्राइवर दीपक कुमार. बाद में इस मामले की सुनवाई के बाद साल 2007 में आनंद मोहन को तमाम सबूतों और गवाहों की रौशनी में दोषी पाया गया और उसे फांसी की सजा सुनाई गई. इस मामले में उसकी बीवी लवली आनंद समेत कुल 6 आरोपी थे. हालांकि एक साल बाद पटना हाई कोर्ट ने इस मामले में आनंद मोहन की फांसी की सजा को कम करते हुए उसे आजीवन कारावास यानी ताउम्र कैद में तब्दील कर दिया था. जिसके बाद आनंद मोहन लगातार जेल में बंद रहा लेकिन अब अचानक बिहार सरकार के नए फैसले से उसकी किस्मत रातों-रात पलट गई.
कौन है आनंद मोहन सिंह?
जिस आनंद मोहन सिंह को लेकर इन दिनों बिहार में बवाल है, आखिर वो आनंद मोहन है कौन? तो आइए आनंद मोहन का सच जानने के लिए आपको जरा पीछे लिए चलते हैं. आनंद मोहन ने 1974 में जेपी आंदोलन के दौरान राजनीति की शुरुआत की. इस दौरान वो दो साल जेल में भी रहा और 17 साल की उम्र आते-आते उसने राजनीति शुरू कर दी. 1980 में उसने समाजवादी क्रांति सेना की शुरुआत की और लोक सभा चुनाव लड़ा. लेकिन हार मिली. बाद में 1990 में वो जनता दल यूनाइटेड के टिकट पर महिषी से चुनाव जीत गया. आगे चल कर आनंद मोहन का गैंग बिहार में पप्पू यादव के गैंग से लगातार टकराता रहा. इसके बाद आनंद मोहन ने अपनी पार्टी बिहार पीपुल्स पार्टी भी बनाई और फिर अलग-अलग वक्त पर अलग-अलग पार्टियों के टिकट पर सांसद और विधायक का चुनाव लड़ता रहा. लेकिन बाद में उसे आईएएस जी कृष्णैया के कत्ल के मामले में सजा हो गई और उसके चुनाव लड़ने पर भी रोक लग गई.
संघर्षों से भरा था जी कृष्णैया का जीवन
भीड़ के हाथों मारे गए आईएएस आधिकारी जी कृष्णैया मूल रूप से तेलंगाना के महबूबनगर जिले के रहने वाले थे. दलित समाज से आनेवाले कृष्णैया बिहार कैडर में 1985 बैच के आईएएस अधिकारी थे. लेकिन आईएएस बनने का उनका सफर आसान नहीं था. उन्होंने एक कुली के तौर पर अपनी शुरुआत की और आईएएस अफसर बन गए. कृष्णैया का जीवन संघर्षों से भरा रहा. पहले वो कुली थे लेकिन इसके बाद उन्होंने कड़ी मेहनत की और आईएएस बने. इससे पहले उन्होंने कुछ समय तक पत्रकारिता भी की. लेकिन इसके बाद वो अकैडमिक्स में आ गए. फिर उन्होंने लेक्चरर के तौर पर काम किया. लेकिन इसके बाद भी कृष्णैया नहीं रुके. उन्होंने एक क्लर्क के तौर पर भी काम किया. उन्होंने आईएएस बनने का सपना देखा और उसे पूरा करने के लिए दिन रात एक कर दिया. वो परिवार चलाने के लिए काम भी करते थे और पढ़ाई भी करते थे. 1985 में उनकी यह मेहनत रंग लाई और आईएएस अफसर बन गए. उन्हें बिहार कैडर दिया गया था.
भूमि सुधार के लिए किया था जबरदस्त काम
कृष्णैया बेहद साफ सुथरी छवि वाले ईमानदार अफसर थे. वे साल 1994 में ही गोपालगंज के डीएम बने थे. चूंकि कृष्णैया ने खुद गरीबी देखी थी, उन्हें गरीबों की तकलीफ का पता था. वो डीएम रहते हुए हर रोज़ गरीबों से मिलते थे और उनकी समस्याएं जानकर उन्हें दूर करने की कोशिश करते थे. कृष्णैया की पहली पोस्टिंग पश्चिमी चंपारण जिले में हुई थी. इस जिले को डकैतों और अपहरणकर्ताओं का गढ़ माना जाता था. कृष्णैया के साथ काम करने वाले लोग बताते हैं कि स्थानीय जमींदारों ने उनके काम में कई रुकावटें पैदा की थीं, इसके बावजूद उन्होंने भूमि सुधार के मामले पर जबरदस्त काम किया था. उन्हें 1994 में गोपालगंज का जिलाधिकारी बनाया गया था और इसी साल उनकी हत्या कर दी गई थी.