दिल्ली में जहांगीरपुरी (Jahangirpuri) की घटना के संबंध में जहांगीरपुरी थाने में 16 अप्रैल को एफआईआर (FIR) संख्या 0440 दर्ज की गई है. उस एफआईआर में आरोपियों के खिलाफ मारपीट, बलवा करना और फैलाना, हत्या का प्रयास जैसी संगीन धाराएं लगाई गई हैं. आइए आपको बताते हैं दिल्ली पुलिस (Delhi Police) की अलग-अलग उन 2 एफआईआर (FIR) में आरोपियों के खिलाफ कौन कौन जो इस मामले में दर्ज की गई हैं.
आईपीसी (IPC) की धारा 147, 148
इस घटना को लेकर दर्ज की गई पहली एफआईआर (FIR) में दिल्ली पुलिस ने आईपीसी (IPC) की धारा 147 और 148 का इस्तेमाल किया है. जिसके मुताबिक अगर कोई भीड़ में शामिल होकर हिंसा करता है और वो उपद्रव करने का दोषी है, तो उसे 2 से 3 साल की अवधि के लिए कारावास की सजा का प्रावधान है. जिसे दो वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है या उस पर आर्थिक जुर्माना भी लगाया जा सकता है. या फिर दोनों ही प्रकार से उसे दंडित किया जा सकता है.
आईपीसी (IPC) की धारा 149, 186
भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 149 के अनुसार, अगर कानून के खिलाफ जनसमूह में शामिल कोई व्यक्ति या सदस्य किसी लक्ष्य को पूरा करने के लिए कोई अपराध करता है या कोई ऐसा अपराध किया जाता है, जिसे उस जनसमूह के सदस्य जानते थे तो उसमें शामिल हर व्यक्ति उस अपराध का दोषी होगा. जबकि धारा 186 के अनुसार, जो भी कोई किसी लोक सेवक के सार्वजनिक कृत्यों के निर्वहन में स्वेच्छा पूर्वक बाधा डालेगा तो उसे किसी एक अवधि के लिए कारावास की सजा होगी. जिसे तीन महीने तक बढ़ाया जा सकता है या उस पर आर्थिक दंड लगाया जा सकता है. या फिर दोनों ही तरह से उसे दण्डित किया जाएगा.
आईपीसी (IPC) धारा 353
लोक सेवक को अपने कर्तव्य के निर्वहन से भयोपरत करने के लिए हमला या आपराधिक बल का प्रयोग करना. जो कोई किसी ऐसे व्यक्ति पर, जो लोक सेवक हो, उस समय जब वैसे लोक सेवक के नाते वह उसके अपने कर्तव्य का निष्पादन कर रहा हो, या इस आशय से कि उस व्यक्ति को वैसे लोक सेवक के नाते अपने कर्तव्य के निर्वहन से निवारित करे या भयोपरत करे या ऐसे लोक सेवक के नाते उसके अपने कर्तव्य के विधिपूर्ण निर्वहन में की गई या की जाने के लिए प्रयतित किसी बात के परिणामस्वरूप हमला करेगा या आपराधिक बल का प्रयोग करेगा. दोनों ही हालात में वो दो वर्ष तक के लिए कारावास की सजा का पात्र होगा. या उर पर जुर्माना भी लगाया जाएगा. या फिर दोनों ही तरह से उसे दंडित किया जाएगा.
आईपीसी की धारा 332
इस धारा के मुताबिक जो भी कोई किसी लोक सेवक को, उस समय जब वह लोक सेवक के नाते अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रहा हो अथवा इस आशय से कि उस व्यक्ति को या किसी अन्य लोक सेवक को, लोक सेवक के नाते अपने कर्तव्य के निर्वहन, अथवा लोक सेवक के नाते उस व्यक्ति द्वारा अपने कर्तव्य के विधिपूर्ण निर्वहन में की गई या किए जाने वाली किसी बात के परिणाम से निवारित या भयोपरत कर स्वेच्छापूर्वक गंभीर चोट पहुंचाता है तो उसे किसी एक अवधि के लिए कारावास की सजा हो सकती है. जिसे तीन वर्ष तक के लिए बढ़ाया जा सकता है. या उस पर आर्थिक दंड भी लगाया जा सकता है, या फिर उसे दोनों ही तरह से दंडित किया जाएगा.
आईपीसी की धारा 436
भारतीय दंड संहिता की इस धारा के अनुसार, जो भी कोई किसी ऐसे निर्माण का, जो मामूली तौर पर उपासनास्थान के रूप में या मानव-विकास के रूप में या संपत्ति की अभिरक्षा के स्थान के रूप में उपयोग में आता हो, नाश कारित करने के आशय से, या यह सम्भाव्य जानते हुए कि वह तद्द्वारा उसका नाश कारित करेगा. अग्नि या किसी विस्फोटक पदार्थ द्वारा कुचेष्टा करेगा, तो उसे आजीवन कारावास की सजा मिलेगी. या किसी भी अवधि के लिए कारावास की सजा होगी. जिसे दस वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है. साथ ही वह आर्थिक दण्ड के लिए भी उत्तरदायी होगा.
आईपीसी की धारा 307
दिल्ली पुलिस ने अपनी एफआईआर में आरोपियों के खिलाफ धारा 307 भी लगाई है. जिसके तहत कत्ल करने का प्रयास जैसी संगीन धाराओं का भी इस्तेमाल किया है. जो कोई किसी कार्य को ऐसे आशय या ज्ञान से और ऐसी परिस्थितियों में करेगा कि यदि वह उस कार्य द्वारा मृत्यु कारित कर देता तो वह हत्या का दोषी होता, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा, और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा, और यदि ऐसे कार्य द्वारा किसी व्यक्ति को उपहति कारित हो जाए, तो वह अपराधी या तो आजीवन कारावास से या ऐसे दण्ड से दण्डनीय होगा. जैसा एतस्मिनपूर्व वर्णित है. आजीवन सिद्धदोष द्वारा प्रयत्न-जबकि इस धारा में वर्णित अपराध करने वाला कोई व्यक्ति आजीवन कारावास के दण्डादेश के अधीन हो, तब यदि उपहति कारित हुई हो, तो वह मृत्यु से दण्डित किया जा सकेगा.
आईपीसी की धारा 188
वहीं दूसरी तरफ 16 अप्रैल को फसाद होने के बाद एफआईआर (FIR) नंबर 0441 में दिल्ली पुलिस ने सिर्फ धारा 188 के तहत मामला दर्ज किया है. जिसके तहत बिना इजाजत जुलूस निकालने के लिए बजरंग बजरंग दल के नेता और विश्व हिंदू परिषद के नेताओं के नाम का जिक्र किया गया है. जिसमें प्रेम शर्मा और ब्रह्म प्रकाश बजरंग दल से जुड़े हुए हैं जिसमें साफ लिखा है कि आयोजकों ने बिना परमिशन लोगों को इकट्ठा करके अपनी मर्जी से गैरकानूनी तरीके से जुलूस निकाला जिस पर दो समुदाय का आपसी संघर्ष होने की संभावना थी. FIR में यह भी कहा गया है कि इन संगठनों के पास किसी भी तरह की पुलिस परमिशन मौजूद नहीं थी. प्रेम शर्मा और ब्रह्म प्रकाश ने अपने तौर पर लोगों को नाजायज इकट्ठा करके गैर कानूनी तरीके से बिना परमिशन के जुलूस निकालकर नियमों का उल्लंघन किया है.
जिसके बाद दिल्ली पुलिस के डीसीपी उषा रंगनानी की तरफ से सोमवार को 5 बजकर 23 मिनट पर इस संबंध में जानकारी देते हुए बताया कि आरोपी विश्व हिंदू परिषद के जिला सेवा प्रमुख प्रेम शर्मा को अरेस्ट कर लिया गया है.
लेकिन कुछ ही देर बाद डीसीपी नॉर्थ वेस्ट की तरफ से भेजा गया यह मैसेज व्हाट्सएप ग्रुप से डिलीट कर दिया गया. लगातार तीन मैसेज डिलीट करने के बाद दिल्ली पुलिस ने एक संदेश जारी करते हुए बताया कि एफआईआर नंबर 0441 में बिना इजाजत के जुलूस निकाला गया था. जिन आरोपियों को पहले गिरफ्तार बताया गया था. दूसरे संदेश में लिखा गया कि इन आरोपियों को पूछताछ के लिए जांच में शामिल किया गया है. दिल्ली पुलिस ने यह भी साफ किया कि उन्होंने दो शोभायात्रा निकालने की इजाजत दी थी, लेकिन जिस तीसरी शोभायात्रा के दौरान हंगामा और बलवा हुआ, उसकी इजाज़त दिल्ली पुलिस ने नहीं दी थी.
दिल्ली पुलिस की तरफ से दर्ज की गई दूसरी FIR और लगातार मैसेज डिलीट करने को लेकर दिल्ली पुलिस की कार्यप्रणाली पर ही सवाल उठ रहे हैं. सवाल यह है कि अगर पहली FIR में दिल्ली पुलिस ने संगीन धाराओं में आरोपियों की गिरफ्तारियां की है, तो दूसरी FIR में इतनी हल्की धारा का इस्तेमाल क्यों किया गया? क्या दिल्ली पुलिस एफआईआर नंबर 0441 में बनाए गए आरोपियों के खिलाफ भी संगीन धाराओं का इस्तेमाल करेगी या फिर पहली वाली एफआईआर में ही इन आरोपियों के नाम शामिल किए जाएंगे?