एक ऐसा बाबा जिसके रसूख और दबदबे के आगे सरकारें कांपती हों, एक ऐसा बाबा जिसके चरणों पर बड़े-बड़े सियासतदां सजदा करते हों, एक ऐसा बाबा बलात्कारी करार दिए जाने के बाद भी राज्य का एडिशनल एडवोकेट जनरल जिसका बैग उठा कर खुद को धन्य समझता हो, वैसे बाबा से टकराना कोई मामूली बात नहीं. ऐसे बाबा को सलाखों के पीछे पहुंचाने के लिए यकीनन जिगर चाहिए. तो आइए अब आपको मिलवाते हैं, पांच ऐसे ही जिगर वाले लोगों से, जिन्होंने बाबा को उसके किले से उठा कर रोहतक जेल तक पहंचा दिया.
जिस गुरमीत राम रहीम के पास बेशुमार दौलत है. जिसके लाखों समर्थक हैं. जिसके पैरों में सत्ता लोटती है. जिसकी एक झलक भर पाकर लोग खुद को निहाल समझते हों, उस बाबा के खिलाफ़ कुछ बोलना और बोलकर उस पर कायम रहना. अदालत में उसके खिलाफ़ गवाही देना और गवाही देकर उसे सलाखों के पीछे पहुंचा देना कोई हंसी खेल नहीं है.
लेकिन वे पांच लोग ऐसे थे, जो सच और हक के साथ आखिरी वक्त तक खड़े रहे. इन्हीं पांच किरदारों की बदौलत आज बाबा गुरमीत राम रहीम सलाखों के पीछे है. बाबा के ताबूत में कील ठोंकनेवाले यही वो पांच हीरो हैं. जिन्हें आज दुनिया सलाम कर रही है.
दो साध्वी
सुरक्षा कारणों और बलात्कार पीड़िता होने की वजह से हम आपको न तो उनका नाम बता सकते हैं और ना ही इनके चेहरे दिखा सकते हैं. बाबा की करतूतों का पहला खुलासा तो ख़ैर उस गुमनाम चिट्ठी से हुआ, जिसने सबको झकझोर दिया था, लेकिन उस चिट्ठी में लिखी दर्द भरी कहानी की गवाही देने के लिए बस यही दो साध्वियां रहीं, जो अंत तक चट्टान की तरह डटी रही. इस चिट्ठी की बिनाह पर जब सीबीआई ने मामले की तफ्तीश शुरू की, तो 18 लड़कियों ने अपने साथ ज्यादती की बात कुबूल की, लेकिन सीबीआई को सिर्फ़ ऐसी दो ही लड़कियां मिलीं, जिन्होंने ना सिर्फ़ अपने साथ हुई ज़्यादती खुलकर बयान की, बल्कि ये सबकुछ अदालत में बताने का फ़ैसला किया. आज इन्हीं दो लड़कियों की बदौलत बाबा को सज़ा हुई है.
मरहूम पत्रकार रामचंद्र छत्रपति
हिसार के पत्रकार रामचंद्र छत्रपति अपने धुन के पक्के इंसान थे. उन्हें जिस ख़बर में ज़रा भी सच्चाई नज़र आती, ये अपने अंजाम की परवाह किए बग़ैर उसे फ़ौरन अपने अखबार 'पूरा सच' में छाप दिया करते थे. ये छत्रपति का जिगर ही था कि उन्होंने पहली बार गुमनाम चिट्ठियों के हवाले से बाबा की पोल खोली थी, लेकिन उन्हें इसकी क़ीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी. सीबीआई के मुताबिक बाबा के शूटर साधकों ने छत्रपति की 24 अक्टूबर 2002 को हत्या कर दी थी.
रणजीत सिंह
गुरमीत राम रहीम के खिलाफ़ चट्टान की तरह डटी रहने वाली दो बहनों में से एक का भाई था रणजीत सिंह. जिसने अपनी बहन के साथ हुई ज़्यादती से दुखी होकर बाबा का डेरा छोड़ दिया था. सीबीआई की मानें तो बाबा ने राज़ फ़ाश होने के डर से रणजीत सिंह का भी क़त्ल करवा दिया. फिलहाल, छत्रपति मर्डर केस की तरह इस मामले की सुनवाई भी सीबीआई अदालत में चल रही है.
फकीरचंद
गुरमीत राम रहीम के डेरे में फकीरचंद नामक एक साधु हुआ करता था, लेकिन वो उन लोगों में था, जिन्होंने अपने ज़मीर के साथ समझौता नहीं किया. बाबा की करतूत जानते ही उसने डेरा छोड़ दिया. वो लोगों को जगाने में लग गया. उसने बाबा की असलियत को लोगों के सामने रखा. और इसकी क़ीमत उसे अपनी गुमशुदगी से चुकानी पड़ी. फकीरचंद आज भी गुमशुदा है. वो कहां है, कोई नहीं जानता. सीबीआई राम रहीम के खिलाफ़ हाई कोर्ट में इस मामले की भी पैरवी कर रही है.