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IPC Section 99: इस काम के खिलाफ नहीं है प्राइवेट प्रतिरक्षा का कोई अधिकार

आईपीसी की धारा 99 (IPC Section 99) उस कार्य के बारे में बताती है, जिनके विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का कोई अधिकार नहीं है. आइए जान लेते हैं कि आईपीसी की धारा 99 इस बात को लेकर क्या प्रावधान किया गया है?

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इस धारा के तहत ऐसे काम के खिलाफ नहीं है निजी प्रतिरक्षा का अधिकार
इस धारा के तहत ऐसे काम के खिलाफ नहीं है निजी प्रतिरक्षा का अधिकार
स्टोरी हाइलाइट्स
  • ऐसे काम के खिलाफ नहीं निजी प्रतिरक्षा का अधिकार
  • अंग्रेजी शासनकाल में लागू हुई थी आईपीसी
  • अपराध और उनकी सजा का प्रावधान बताती है IPC

Indian Penal Code: भारतीय दंड संहिता में (धारा 96 Sction 96) से लेकर धारा 106 (Section 106) तक आत्मरक्षा के अधिकारों (Self defense rights) की विधिपूर्ण परिभाषा मौजूद है. इसी प्रकार आईपीसी की धारा 99 (IPC Section 99) उस कार्य के बारे में बताती है, जिनके विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का कोई अधिकार नहीं है. आइए जान लेते हैं कि आईपीसी की धारा 99 इस बात को लेकर क्या प्रावधान किया गया है? 

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आईपीसी की धारा 99 (Indian Penal Code Section 99)
भारतीय दंड संहिता 1860 की धारा 99 (Section 99) में उस कार्य (Act) को परिभाषित (Define) किया गया है, जिनके विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा (Right of private defence) का कोई अधिकार नहीं है. IPC की धारा 99 के मुताबिक-

यदि कोई कार्य (Act), जिससे मृत्यु या घोर उपहति की आशंका (Apprehension of death or grievous hurt) युक्तियुक्त रूप से कारित नहीं होती, सद्भावपूर्वक अपने पदाभास में कार्य करते हुए लोक सेवक (Public Servant) द्वारा किया जाता है या किए जाने का प्रयत्न (Attempted) किया जाता है तो उस कार्य के विरुद्ध (Against the act) प्राइवेट प्रतिरक्षा का कोई अधिकार नहीं है, चाहे वह कार्य विधि अनुसार सर्वथा न्यायानुमत (Strictly justifiable by law) न भी हो.
 
यदि कोई कार्य, जिससे मृत्यु या घोर उपहति की आशंका (Apprehension of death or grievous hurt) युक्तियुक्त रूप से कारित नहीं होती, सद्भावपूर्वक अपने पदाभास में कार्य करते हुए लोक सेवक के निदेश (On the direction of public servant) से किया जाता है, या किए जाने का प्रयत्न किया जाता है, तो उस कार्य विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का कोई अधिकार नहीं है, चाहे वह निदेश विधि अनुसार सर्वथा न्यायानुमत (Strictly justifiable by law) न भी हो.

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उन दशाओं में, जिनमें संरक्षा (Protection) के लिए लोक प्राधिकारियों (Public authorities) की सहायता प्राप्त करने के लिए समय है, प्राइवेट प्रतिरक्षा का कोई अधिकार (Right of private defence) नहीं है.

इस अधिकार के प्रयोग (Exercise of right) का विस्तार- किसी दशा में भी प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार (Right of private defence) का विस्तार उतनी अपहानि से अधिक अपहानि (Harm) करने पर नहीं हैं, जितनी प्रतिरक्षा के प्रयोजन (Purpose of defence) से करनी आवश्यक है.

इसे भी पढ़ें--- IPC Section 98: विकृतचित्त व्यक्ति के कार्य से जुड़ी है आईपीसी की धारा 98 

क्या होती है आईपीसी (IPC)
भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) IPC भारत में यहां के किसी भी नागरिक (Citizen) द्वारा किये गये कुछ अपराधों (certain offenses) की परिभाषा (Definition) और दंड (Punishment) का प्रावधान (Provision) करती है. आपको बता दें कि यह भारत की सेना (Indian Army) पर लागू नहीं होती है. पहले आईपीसी (IPC) जम्मू एवं कश्मीर में भी लागू नहीं होती थी. लेकिन धारा 370 हटने के बाद वहां भी आईपीसी लागू हो गई. इससे पहले वहां रणबीर दंड संहिता (RPC) लागू होती थी.

अंग्रेजों ने लागू की थी IPC
ब्रिटिश कालीन भारत (British India) के पहले कानून आयोग (law commission) की सिफारिश (Recommendation) पर आईपीसी (IPC) 1860 में अस्तित्व में आई. और इसके बाद इसे भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) के तौर पर 1862 में लागू किया गया था. मौजूदा दंड संहिता को हम सभी भारतीय दंड संहिता 1860 के नाम से जानते हैं. इसका खाका लॉर्ड मेकाले (Lord Macaulay) ने तैयार किया था. बाद में समय-समय पर इसमें कई तरह के बदलाव किए जाते रहे हैं.

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