हमास आतंकियों के हमले में तबाह हुआ इजरायल का एक इलाका. यहां एक घर में इजरायली सैनिक पहुंचते हैं. घर के सदस्य उनकी आवाज सुनकर सहमे हुए बाहर निकलते हैं. एक सैनिक महिला से हिब्रू भाषा में पूछता है, "आप कैसी हैं, क्या आप यहां किसी के साथ हैं, यह आईडीएफ है. सब कुछ ठीक है. हैप्पी हॉलिडे, हैप्पी हॉलिडे." महिला दरवाजे के पीछे जवाब देती है, " मैं यहां मेरे बेटे के साथ हूं." इसके बाद में इजरायली सेना के जवान उस महिला और उसके बेटे को लेकर बाहर चले जाते हैं. आईडीएफ यानी इजरायल डिफेंस फोर्सेस ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर लिखा है, "हमास नरसंहार के दौरान घंटों बंद रहने के बाद हमारी स्पेशल यूनिट 'ओकेट्ज' ने इस मां और बेटे को खबर दी कि वे सुरक्षित हैं."
अब सवाल उठता है कि इजरायल डिफेंस फोर्सेस के स्पेशल यूनिट 'ओकेट्ज' क्या है, ये क्या काम करती है, हमास के खिलाफ युद्ध में इस यूनिट की भूमिका क्या है? इन सवालों के जवाब जानने से पहले ये समझ लीजिए कि ये यूनिट इंसान की नहीं है. बल्कि इंसानों के सबसे वफादार जानवर कुत्तों की है. इसे इजरायली सेना की कैनाइन या के-9 यूनिट भी कहा जाता है. 'ओकेट्ज' ने इस जंग में अभी तक 200 से ज्यादा लोगों का रेस्क्यू किया है. इतना ही नहीं हमास के 10 से अधिक आतंकियों को मौत की नींद भी सुला दिया है. इनका खौफ इतना है कि आतंकी इन्हें दूर से देखते ही गोलियों की बौछार करने लगते हैं. कोई भी इनके करीब नहीं आ पाता. इस यूनिट के लड़ाके दूर से दुश्मन की आहट समझ लेते हैं.
नारो ने पेश की बहादुरी की मिसाल
हमास के आतंकियों ने सबसे ज्यादा इजरायल के शहर किबुत्ज में कत्लेआम मचाया था. यहां सैकड़ों लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया. कई लोगों को बंधक बनाकर साथ ले गए तो कई को उन्हीं के घरों में बंधक बना दिया. यहां तबाही के निशान हर जगह साफ नजर आते हैं. यही वजह है कि कैनाइन यूनिट को इस इलाके में तैनात किया गया है. ताकि लोगों को रेस्क्यू किया जा सके और जरूरत पड़ने पर आतंकियों का खात्मा भी. गाजा के करीब कफर अजा इलाके में हमास के आतंकी घात लगाकर बैठे थे. नारो नामक एक कुत्ते ने आतंकियों के मूवमेंट को भांप लिया और इजरायली सेना को अलर्ट कर दिया. नारो की मदद से सेना ने आतंकियों पर हमला बोल दिया. हालांकि, नारो इस हमले में शहीद हो गया.
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'ओकेट्ज' की स्थापना कब हुई थी
इजरायल डिफेंस फोर्सेस के स्पेशल कैनाइन यूनिट 'ओकेट्ज' की स्थापना साल 1974 में हुई थी. योसी लैबॉक इसके पहले कमांडर थे. यह यूनिट का प्रमुख काम मिलिट्री ऑपरेशन के लिए कुत्तों को ट्रेंड करना है. पहले 'ओकेट्ज' के कुत्तों को अपहरणकर्ताओं पर हमला करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता था. लेकिन अब उनकी कमांडो ट्रेनिंग होती थी, जिसमें आतंकियों से लड़ने के गुर सिखाए जाते हैं. इसमें ट्रेनिंग ले चुके कुत्ते शहरी और ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों में आसानी से अपने मिशन को अंजाम देते हैं. उन्हें हर परिस्थिति के लिए तैयार किया जाता है. इनमें कुछ कुत्तों को शिकार के लिए चयनित लक्ष्यों को ट्रैक करने और इजरायली सीमा पर उल्लंघन का पता लगाने के लिए ट्रेंड किया जाता है. इसके साथ ही उनको हथियारों की खोज करने, छिपे हुए विस्फोटकों को सूंघने और ध्वस्त इमारतों में लोगों को ढूंढने के लिए भी इन कुत्तों को ट्रेंड किया जाता है.
'ओकेट्ज' के कुत्तों के प्रमुख कार्य
'ओकेट्ज' हिब्रू भाषा का एक शब्द है, जिसे अंग्रेजी में 'स्टिंग' कहा जाता है. 'स्टिंग' से 'स्टिंग ऑपरेशन' का निर्माण हुआ है. यानी छुपकर किसी बात को पता करना. यही वजह है कि इस यूनिट का हर कुत्ता शिकारी और शातिर होता है. वो अपने दुश्मनों के छक्के छुड़ाने का मादा रखता है. इस खास यूनिट के कुत्तों का प्रमुख कार्य इस प्रकार है.
1. काउंटर टेरर
2. सर्च और रेस्क्यू
इन नस्ल के कुत्तों को करते हैं भर्ती
इजरायल की कैनाइन यूनिट 'ओकेट्ज' में जर्मन शेफर्ड और रॉटवीलर नस्ल के कुत्तों की तुलना में बेल्जियम शेफर्ड (मैलिनोइस) को प्राथमिकता दी जाती है. इस नस्ल के कुत्तों ने ही आईएसआईएस सरगना अबू बकर अल-बगदादी का पीछा करके मार गिराया था. साल 2011 में अमेरिकी नौसेना के जवानों द्वारा एक ऑपरेशन में अल कायदा सरगना ओसामा बिन लादेन को मारने के लिए इस नस्ल के कुत्तों का ही इस्तेमाल किया गया था. इन्हें मिलिट्री का पसंदीदा माना जाता है, क्योंकि फुर्तीली रफ्तार, तेज दिमाग, शानदार धीरज और आक्रामकता इनकी पहचान होती है. जर्मन शेफर्ड कुत्तों के मुकाबले ये अपने छोटे आकार के कारण जहाज से पैराशूटिंग के लिए एकदम फिट बैठते हैं.