Madrasa Teacher Murder Case: केरल के कासरगोड की सेशन कोर्ट ने एक मदरसा टीचर की हत्या के आरोपी तीन आरएसएस कार्यकर्ताओं को बरी कर दिया. साल 2017 में जिले की एक मस्जिद के अंदर एक मदरसा शिक्षक की हत्या कर दी गई थी. इस मामले में तीन आरएसएस कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया था. तीनों आरोपी केलुगुडे के रहने वाले हैं.
जेल में बंद थे तीनों आरोपी
कासरगोड के प्रधान सत्र न्यायालय के न्यायाधीश केके बालाकृष्णन ने मदरसा टीचर की हत्या के मामले में आरोपी अखिलेश, निधिन और अजेश को लंबी सुनवाई के बाद बरी कर दिया. तीनों आरोपी मदरसा टीचर के कत्ल की इस सनसनीखेज वारदात के बाद से ही जेल में बंद थे.
कमरे में मिली थी खून से सनी लाश
इस वारदात में चूरी के 34 वर्षीय मदरसा टीचर मोहम्मद रियास मौलवी को कातिलों ने अपना शिकार बनाया था. रियास मौलवी एक मुअज़्ज़िन भी थे, जो प्रार्थना करने के लिए इस्लामी आह्वान करता है. 20 मार्च 2017 को उनकी खून से सनी लाश मस्जिद में बने एक कमरे में मिली थी. पुलिस के मुताबिक, वहीं उनका कत्ल किया गया था.
गला काट कर किया गया था मौलवी का मर्डर
पुलिस अधिकारियों ने बताया था कि चूरी की मुहयुद्दीन जामा मस्जिद के परिसर में घुसे एक गिरोह ने मदरसा टीचर का तेजधार हथियार से गला काट दिया था. जिसकी वजह उनकी दर्दनाक मौत हो गई थी.
आरोप साबित करने में नाकाम रहा अभियोजन पक्ष
कासरगोड की अदालत ने अपने आदेश में कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि आरोपियों की मुस्लिम समुदाय से किसी तरह की दुश्मनी थी. अदालत ने कहा कि इसके अलावा, अभियोजन पक्ष आरोपियों का आरएसएस के साथ किसी भी तरह का संबंध स्थापित करने में नाकाम रहा.
जांच अधिकारियों के तरीके पर शक
सेशन कोर्ट ने कहा कि आरोपियों और अभियोजन पक्ष के गवाहों से जब्त किए गए फोन का विश्लेषण किया गया लेकिन कुछ भी उपयोगी नहीं मिला. उपरोक्त फोन की सामग्री और डेटा के संबंध में जांच करने में जांच अधिकारियों की विफलता जांच शुरू करने और नतीजे पर पहुंचने के तरीके पर गंभीर शक पैदा करती है. कोर्ट ऑर्डर में कहा गया है कि अभियोजन पक्ष ने यह जानने का सर्वोत्तम अवसरों में से एक को बर्बाद कर दिया कि मृतक ने किसके साथ बातचीत की थी.
आरोपी संदेह का लाभ पाने के हकदार
अदालत ने कहा कि इस मामले में चुप्पी ही अभियोजन पक्ष के आरोपों को खारिज करने के लिए पर्याप्त है. इसलिए, यह सुरक्षित रूप से निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि जांच मानक के अनुरूप और एकतरफा नहीं है. इसलिए, आरोपी संदेह का लाभ पाने के हकदार हैं. उनके द्वारा किए गए अपराध उचित संदेह से परे साबित नहीं हुए. इसलिए अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि पीड़ित की हत्या आरोपियों ने की थी.
अभियोजन पक्ष फैसले से निराश
अदालत ने अपने आदेश में कहा, इसलिए आरोपियों के खिलाफ आईपीसी की धारा 449, 302, 153ए, 295, 201 आर/डब्ल्यू 34 के तहत अपराध उचित संदेह से परे साबित नहीं हुआ है और इसलिए वे इन अपराधों के लिए दोषी नहीं हैं. इस बीच, अभियोजन पक्ष ने फैसले पर निराशा व्यक्त की और कहा कि वे आदेश के खिलाफ आगे अपील करेंगे.
आरोपी के कपड़ों पर मिला था मौलवी का खून
पीटीआई के मुताबिक, इस मामले के अभियोजक ने कहा कि मामले में मजबूत सबूत थे. एक आरोपी के कपड़ों पर मौलवी का खून पाया गया था. आरोपियों द्वारा इस्तेमाल किए गए चाकू पर मौलवी के कपड़े का एक टुकड़ा पाया गया था. हमने सभी सबूत जमा कर दिए थे. अदालत ने इस मामले में 97 गवाहों, 215 दस्तावेजों और 45 भौतिक साक्ष्यों की जांच की, जिसमें 90 दिनों के भीतर आरोप पत्र दायर किया गया था.
अदालत में रो पड़ीं मृतक की पत्नी
इस मामले की सुनवाई के दौरान मदरसा टीचर मोहम्मद रियास मौलवी की विधवा पत्नी अदालत में मौजूद थीं. जब अदालत ने फैसला सुनाया तो वह मीडिया के सामने रो पड़ीं और उन्होंने कहा कि अदालत का आदेश निराशाजनक था. पीड़िता के परिवार के सदस्यों ने कहा कि उन्होंने इस मामले में इस तरह के फैसले की कभी उम्मीद नहीं की थी.
सांप्रदायिक अशांति पैदा कराना चाहते थे कातिल
इस मामले में, अदालतों ने पिछले सात वर्षों से आरोपियों को एक बार भी जमानत नहीं दी. आरोपी किसी भी तरह से मौलवी से जुड़े नहीं थे. यहां तक कि पुलिस की चार्जशीट में भी साफ तौर पर उल्लेख किया गया है कि मौलवी का कत्ल इलाके में सांप्रदायिक अशांति पैदा करने की एक कोशिश था. मृतक के एक रिश्तेदार ने वहां मौजूद मीडियाकर्मियों से कहा कि आरोप पत्र और रिमांड रिपोर्ट में कहा गया है कि आरोपी क्षेत्र में सांप्रदायिक अशांति फैलाने की कोशिश कर रहे थे.