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एंटीलिया केसः फर्जी रजिस्ट्रेशन प्लेट, ना चेसिस ना इंजन नंबर, ऐसे खुला था स्कॉर्पियो का राज

एंटीलिया के बाहर 25 फरवरी की देर शाम जिलेटिन की छड़ों के साथ खड़ी की गई स्कॉर्पियो का पता चला था. जानकारी मिलते ही बम निरोधक दस्ते और फॉरेंसिक टीम मौके पर पहुंच गई थी. फिर स्कॉर्पियो की जांच की गई. जिलेटिन की छड़ें, कुछ नंबर प्लेट और धमकीभरा पत्र बरामद किया गया.

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स्कॉर्पियो कार का खुलासा होने के कुछ दिन बाद ही मनसुख की हत्या की गई थी
स्कॉर्पियो कार का खुलासा होने के कुछ दिन बाद ही मनसुख की हत्या की गई थी
स्टोरी हाइलाइट्स
  • येलो गेट पुलिस कंपाउंड में खड़ी थी स्कॉर्पियो
  • पुलिस और एजेंसी कर रही थी मालिक की तलाश
  • एक अधिकारी ने गाड़ी के कांच पर देखा था अहम सुराग

मुंबई के एंटीलिया केस में बरामद की गई स्कॉर्पियो का खुलासा बहुत छोटे से सुराग से हुआ था. हालांकि इस साजिश को अंजाम देने के मकसद से आरोपी सचिन वाज़े ने स्कॉर्पियो का चेसिस और इंजन नंबर भी मिटवा दिया था. उस पर फेक नंबर प्लेट लगी हुई थी. लेकिन इसके बावजूद पुलिस कुछ ही घंटों में कार के असली मालिक तक पहुंच गई थी.

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एंटीलिया के बाहर 25 फरवरी की देर शाम जिलेटिन की छड़ों के साथ खड़ी की गई स्कॉर्पियो का पता चला था. जानकारी मिलते ही बम निरोधक दस्ते और फॉरेंसिक टीम मौके पर पहुंच गई थी. फिर स्कॉर्पियो की जांच की गई. जिलेटिन की छड़ें, कुछ नंबर प्लेट और धमकीभरा पत्र बरामद किया गया. जांच खत्म हो जाने के बाद उस स्कॉर्पियो को एंटीलिया से हटाकर येलो गेट पुलिस के कंपाउंड में खड़ा कर दिया गया था. 

पुलिस और जांच एजेंसी पता लगाना चाहती थी कि उस स्कॉर्पियो का मालिक कौन है? उस कार का नंबर कहां रजिस्टर्ड है. इसी तरह के कई सवाल थे जिनका जवाब पुलिस, क्राइम ब्रांच और एटीएस तलाश कर रही थी. मुंबई क्राइम ब्रांच और एटीएस की कई अलग-अलग टीमें स्कॉर्पियो का जायज़ा लेने पहुंचीं. तभी एक अधिकारी की नजर स्कॉर्पियो के एक कांच पर पड़ी. जिस पर बहुत ही छोटे-छोटे अक्षरों में उस स्कॉर्पियो गाड़ी का असली रजिस्ट्रेशन नंबर लिखा हुआ था. उस अधिकारी ने फौरन उसका फोटो खींचा और फिर उस रजिस्ट्रेशन नंबर के मालिक की डिटेल निकाली.

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अधिकारी को जांच में पता चला कि गाड़ी डॉक्टर पीटर न्यूटन के नाम रजिस्टर्ड है. जब उनकी जांच टीम गाड़ी के मालिक तक पहुंची तो बताया गया कि कुछ पैसों के लेन-देन की वजह से वो गाड़ी तो पिछले तीन साल से मनसुख हिरेन के पास थी. फिर जांच टीम मनसुख हिरेन तक जा पहुंची. मनसुख ने पुलिस को बताया कि उनकी गाड़ी 17 फरवरी को विक्रोली से चोरी हो गई थी और उन्होंने लोकल पुलिस स्टेशन में 18 फरवरी को एफआईआर भी दर्ज करवाई थी.

इसके बाद जांच टीम विक्रोली पहुंची और एफआईआर दर्ज करने वाले सब इंस्पेक्टर, उस वक्त के डयृटी अधिकारी और जांच अधिकारी से पूछताछ शुरू की गई. उधर, मनसुख हिरेन के परिवार वालों का कहना है कि ये स्कॉर्पियो नवंबर से 5 फरवरी तक सचिन वाज़े के पास थी. मनसुख के परिवार वालों का ये भी कहना है कि खुद मनसुख भी उस गाड़ी को पिछले तीन साल से यूज कर रहे थे. 

लेकिन कमाल ये है कि न तो मनसुख तीन साल में और न ही सचिन वाज़े चार महीने में स्कॉर्पियो के एक कांच पर बहुत बारीक से लिखा मूल नंबर पढ़ पाए. इसलिए वाज़े ने गाड़ी के नीचे आगे-पीछे तो फर्जी नंबर प्लेट लगा दिए. लेकिन कांच पर लिखे असली नंबर का सुराग छोड़ दिया. इसी सुराग ने इस मामले की जांच को अंजाम तक पहुंचाने का काम किया.

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विक्रोली पुलिस स्टेशन में 18 फरवरी को दर्ज उस एफआईआर में स्कॉर्पियो के चोरी होने की शिकायत दर्ज हुई थी. लेकिन अभी तक जो फैक्ट सामने आए हैं, वो बताते हैं कि वो गाड़ी कभी चोरी हुई ही नहीं. मनसुख ने 17 फरवरी की रात ये गाड़ी विक्रोली में खड़ी की. वहां से एक कैब बुक की. जिसमें बैठकर वो सीएसटी आए. वहां मर्सिडीज गाड़ी में बैठे. सचिन वाज़े को स्कॉर्पियो की चाबी दी. वाज़े ने ये चाबी अपने सिपाही को दी. वो सिपाही विक्रोली से गाड़ी को उठाकर ठाणे की साकेत बिल्डिंग के बाहर ले गया. जहां सचिन वाज़े रहता था. वहां ये गाड़ी दो दिन खड़ी रही. 

इसके बाद वाज़े का सिपाही वहां से इस गाड़ी को पुलिस मुख्यालय लाया. 19 से 21 फरवरी तक गाड़ी वहां खड़ी रही. बाद में फिर से उस गाड़ी को वाज़े की सोसाइटी में पहुंचाया गया. और फिर वहां से 25 फरवरी को ये गाड़ी ले जाकर एंटीलिया के बाहर खड़ी कर दी गई थी. 

इससे पहले विक्रोली में जहां स्कॉर्पियो खड़ी की गई थी. वहां पांच किलोमीटर तक कोई सीसीटीवी कैमरा नहीं है. इसका मतलब ये है कि गाड़ी चोरी की कहानी प्लांट करने से पहले इस बात की पहले से रेकी कर ली गई थी कि गाड़ी कहां और किस इलाके में पार्क की जाए. जहां सीसीटीवी कैमरे न हों. ताकि चोरी की असली कहानी का भंडाफोड़ न हो सके.

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(रिपोर्ट- आजतक ब्यूरो)

 

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