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जयपुर राजमहल पैलेस में ताला लगाना पड़ा महंगा, कोर्ट ने किया अधिकारियों को तलब

जयपुर के पूर्व राजपरिवार के राजमहल पैलेस में तोड़फोड़ करना और तालाबंदी करना अधिकारियों को भारी पड़ गया है. जयपुर विकास प्राधिकरण के तत्कालीन कमिश्नर शिखर अग्रवाल और सचिव पवन अरोड़ा को मजिस्ट्रेट कोर्ट में तलब किया गया है.

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राजमहल पैलेस मामले में पहले भी हुई है राज्य सरकार की किरकिरी
राजमहल पैलेस मामले में पहले भी हुई है राज्य सरकार की किरकिरी

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जयपुर के पूर्व राजपरिवार के राजमहल पैलेस में तोड़फोड़ करना और तालाबंदी करना अधिकारियों को भारी पड़ गया है. जयपुर विकास प्राधिकरण के तत्कालीन कमिश्नर शिखर अग्रवाल और सचिव पवन अरोड़ा को मजिस्ट्रेट कोर्ट में तलब किया गया है.

अदालत ने पूर्व राजपरिवार की शिकायत के बाद राजमहल पैलेस में तोड़फोड़ और तालाबंदी की कार्रवाई पर नाराजगी जताते हुए दोनों अधिकारियों के खिलाफ जमानती वारंट निकाल उन्हें अदालत में हाजिर होने के आदेश दिए हैं. अदालत ने इन अधिकारियों के साथ-साथ जयपुर विकास प्राधिकरण के पांच अन्य अधिकारियों को भी जमानती वारंट से तलब किया है.

अदालत ने सभी अधिकारियों को बीस-बीस हजार के वारंट के साथ 25 नवंबर तक तलब होने के आदेश दिए हैं. बता दें कि अदालत ने सभी अधिकारियों पर आपराधिक षड्यंत्र, लोक सेवक के विरूद्ध कार्य, गलत नीयत से दस्तावेज तैयार करना, जानबूझकर नुकसान पहुंचाना, अवैध रूप से काम करना और मौके पर अभद्र भाषा के प्रयोग करने जैसे गंभीर आरोपों के तहत संज्ञान लिया है.

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पूर्व राजपरिवार की ओर से दर्ज की गई शिकायत में कहा गया है कि 24 नवंबर 2011 को कोर्ट ने जयपुर के पूर्व राजपरिवार को राजमहल पैलेस का मालिक माना था. साथ ही कोर्ट ने संपत्ति के उपभोग संबंधी फैसलों पर पूर्व राजपरिवार को सभी हक दिए थे.

शिकायत के मुताबिक, 24 अगस्त 2016 को राज्य सरकार के कथित अधिकारी भारी संख्या में पुलिस बल लेकर राजमहल पैलेस पहुंचे. वहां अधिकारियों ने पुलिस की मौजूदगी में जबरन राजमहल पैलेस में घुसकर तोड़फोड़ की. इतना ही नहीं, अधिकारियों ने वहां मौजूद लोगों से गाली-गलौज करते हुए पैलेस के गेट पर ताला लगा दिया था.

गौरतलब है कि इस मामले में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की पहले भी किरकिरी हो चुकी है. सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए राजपूत समाज ने जयपुर में राजपरिवार के समर्थन में बड़ी रैली निकाली थी. वहीं मामले के तूल पकड़ते ही राजघराने से जुड़े इस मामले में केंद्र के हस्तक्षेप के बाद मजबूरन राज्य सरकार को पैलेस का ताला खोलना पड़ा था. राजनीतिक रूप से मात खाने के बाद अब सरकार को कोर्ट की कार्रवाई का चाबुक भी सहना पड़ रहा है.

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