नक्सलियों ने तीर बम के बजाय देसी रॉकेट लांचर का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है. पिछले साल नक्सलियों ने सुरक्षाबलों के ऊपर हमले के तौर पर अपनी पुरानी तकनीक धनुष और तीर का इस्तेमाल करना शुरू किया था. एक रिपोर्ट से खुलासा हुआ था कि नक्सली तीर बम का इस्तेमाल कर जवानों को रेड कॉरिडोर में निशाना बना रहे हैं.
नई रिपोर्ट में इस बात का नया खुलासा हुआ है कि नक्सली तीर बम के बजाय देसी रॉकेट लांचर का इस्तेमाल कर रहे हैं. आजतक को मिली एक्सक्लूसिव जानकारी के मुताबिक, छत्तीसगढ़ के साउथ बस्तर के अबूझमाड़ इलाके में पिछले महीने नक्सलियों ने CRPF कैंप पर हमला किया, जिसमें देसी रॉकेट लांचर का इस्तेमाल किया गया था.
नक्सली अबूझमाड़ इलाके में सीआरपीएफ के नए कैंप को नहीं बनने देना चाहते थे. सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, इस तरीके के देसी रॉकेट लांचर बनाने के लिए नक्सलियों ने एक कोर टीम तैयार की है, जो ऐसे तीर बम और देसी रॉकेट लांचर बनाने में माहिर है. देसी रॉकेट लांचर को नक्सली उत्तम तकनीक का नहीं बना पाए हैं.
इसलिए अभी ऐसे देसी रॉकेट लांचर सिर्फ 50 से 60 प्रतिशत ही फेंकने के बाद फटते हैं. नई रणनीति को देखते हुए CRPF ने अलग-अलग जगहों पर सुरक्षा बलों को अलर्ट कर दिया है. पिछले साल छत्तीसगढ़ में आईईडी लगे तीर बम का इस्तेमाल नक्सलियों ने किया था. तीर-धनुष को विस्फोटक की शक्ल देकर सुरक्षाबलों के होश उड़ा दिए थे.
छत्तीसगढ़ के सुकमा में जिस तरह से सुरक्षाबलों को निशाना बनाया गया वह न सिर्फ हैरतअंगेज, बल्कि एकदम नया था. अब देसी तीर बम को लेकर सुरक्षा बल चौकन्ने हो गए हैं. तीर के अगले हिस्से पर डेटोनेटर लगाकर उसे बम बनाया गया था. जैसे ही यह तीर किसी चीज से टकराता था उससे विस्फोट हो जाता था. ऐसा ही सुकमा में नक्सलियों ने किया था.
जानकार बताते हैं कि विस्फोटक वाले तीर का इस्तेमाल पहली बार जवानों पर किया गया. इससे पहले नक्सली जहर लगे तीर का इस्तेमाल करते थे. अब साउथ बस्तर के इलाके में जिस तरीके से नक्सली देसी रॉकेट लांचर का इस्तेमाल करने में जुटे हुए हैं, यह जानने की कोशिश की जा रही है कि उनको इसका मटेरियल कहां से मिलता है.