निर्भया के दोषियों को भले ही फांसी मिल गई हो, लेकिन लगता है समाज को इससे कोई सबक ही नहीं मिला. दिल्ली के पश्चिम विहार इलाके में 12 साल की एक बच्ची को एक बार फिर से वही सब झेलना पड़ा है. हालांकि इस बार वारदात सड़क पर नहीं बच्ची के घर पर हुई, जब वह बिल्कुल अकेली थी. उसके माता-पिता और उसकी बड़ी बहन रोज की तरह अपने-अपने काम पर गए हुए थे.
आरोपियों को शायद इस बात की जानकारी थी कि लड़की पूरे दिन घर में अकेले रहती है. इसी का फायदा उठाकर उन्होंने नाबालिग के साथ दुष्कर्म किया. इतना ही नहीं दुष्कर्म के बाद उन्होंने लड़की के शरीर पर कैंची से कई वार भी किए. फिलहाल AIIMS में लड़की का इलाज चल रहा है. न्यूरो सर्जरी के बाद उसकी हालत स्थिर है.
अदालती आंकड़े बताते हैं कि इस साल 30 जून तक बच्चों से बलात्कार के 24,212 मुकदमे दर्ज हुए हैं. इनमें से 11,981 मामलों की जांच पेंडिंग है, जबकि 12,231 मामलों में चार्जशीट दायर कर दी गई है. सुनवाई केवल 6,449 केस में ही शुरू हुई है.
नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो का आंकड़ा कहता है कि 2016 में 64,138 मामले पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज किए गए थे, जिनमें सिर्फ तीन प्रतिशत में ही अपराध साबित हो पाया है. नाबालिग लड़कियो के साथ बलात्कार के 94 फीसदी मामलों में अपराधी पीड़िता की जान पहचान वाला ही था.
राजस्थान: पाकिस्तान से आए 11 हिन्दू शरणार्थियों को जहर का इंजेक्शन देकर मारा गया!
बाल सुरक्षा विशेषज्ञ और दिल्ली हाई कोर्ट के काउंसलर अनंत अस्थाना ने बताया कि पुलिस-प्रशासन कोरोना रोकथाम में लगा हुआ है. ज्यादातर मामलों में त्वरित कार्रवाई नहीं हो पा रही है. अदालतों में अर्जेंट मैटर ही सुने जा रहे हैं. ज्यादातर बलात्कार पीड़ितों को मुआवजा देने के मामले पेंडिंग हैं.
उन्होंने कहा कि पहले पीड़ित थाने में किसी को साथ लेकर आते थे लेकिन जब से लॉकडाउन हुआ है अब उन्हें सामाजिक मदद नहीं मिल पा रही है. सिस्टम नाकाम है, सरकारें पॉक्सो एक्ट लागू ही नहीं कर पा रही हैं.
बचपन बचाओ आंदोलन के प्रवक्ता अनिल पांडेय ने बताया कोविड में श्रम कानूनो में ढील पड़ने के बाद न केवल ट्रैफिकिंग बढ़ी है बल्कि घरों में रहने को मजबूर बच्चों के साथ यौन अपराध भी बढ़ गए हैं.
एक रिपोर्ट के मुताबिक कोरोना काल में सबसे ज्यादा संकट बुजुर्ग, महिला, बच्चों और शारीरिक रूप से अक्षम लोगों को झेलना पड़ रहा है.
जोधपुरः खेत में मिले 11 पाकिस्तानी शरणार्थियों के शव, हत्या की आशंका
क्या कहता है पॉक्सो का आकंड़ा
पूरे देश में हर साल करीब 34,000 केस दर्ज होते हैं. पिछले पांच साल में पॉक्सो केसेज की पेंडेंसी 10 गुना बढ़ी है. यानी इन मामलों में फैसले नहीं हुए हैं. बचपन बचाओ आंदोलन का आकंड़ा कहता है कि पेंडेंसी केसेज के निपटारे में और छह साल लगेंगे. एक जज पर करीब 200 से ज्यादा पेंडिंग केसेज हैं.
सुशांत सिंह राजपूत केसः जांच को लेकर दो राज्यों की पुलिस आमने-सामने, क्या कहता है कानून
पॉक्सो केसेज में बच्चो को मिलने वाले मुआवजे की भी स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं है. 2015 में तीन प्रतिशत, 2016 में चार प्रतिशत और 2017 में पांच प्रतिशत पीड़ितों को ही मुआवजा मिल सका है.