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UN का दोहरा चरित्रः जैश-ए-मोहम्मद पर बैन, मगर सरगना मसूद पर नहीं

कमाल की बात है कि जैश-ए-मोहम्मद तो खूनी आतंकी संगठन है, पर उसी संगठन के मुखिया को कातिल करार नहीं दिया जा सकता. क्योंकि संयुक्त राष्ट्र में शामिल सारी दुनिया एक तरफ और बस चीन एक तरफ है. चीन नहीं चाहता इसलिए मसूद अज़हर आतंकवादी नहीं है.

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मसूद अजहर भारत का मोस्ट वॉन्टेड अपराधी है, जो पाकिस्तान में रहता है
मसूद अजहर भारत का मोस्ट वॉन्टेड अपराधी है, जो पाकिस्तान में रहता है

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पुरानी कहावत है गुड़ खाते हैं पर गुलगुले से परहेज़ है. ये कहावत आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अज़हर को लेकर संयुक्त राष्ट्र के रवैए पर पूरी तरह फिट बैठ रही है. 18 साल पहले यानी 2001 में संयुक्त राष्ट्र ने जैश-ए-मोहम्मद को तो आतंकवादी संगठन करार दे दिया. मगर उसी संगठन के मुखिय़ा मसूद अज़हर को वो आतंकवादी नहीं मानता. जानते हैं क्यों? क्योंकि चीन नहीं चाहता. अब सवाल ये है कि चीन ऐसा क्यों नहीं चाहता? हालांकि य़ही चीन पुलवामा हमले के बाद भारत के साथ भी खड़ा दिखाई दे रहा है.

कांधार हाईजैकिंग सिर्फ उसकी रिहाई के लिए की गई. आतंकवादी संगठन जैश-ए-मुहम्मद का गठन सिर्फ भारत की तबाही के लिए हुआ. जम्मू-कश्मीर सचिवालय पर हमला किया गया. फिर जम्मू-कश्मीर विधानसभा पर हमला हुआ. गुजरात के गांधीनगर में अक्षरधाम मंदिर पर हमला किया गया. लोकतंत्र की दहलीज़ यानी संसद भवन पर आतंकी हमला हुआ. पठानकोट एयरबेस पर हमले को अंजाम दिया गया और अब पुलवामा में सीआरपीएफ के क़ाफ़िले पर हमला किया गया.

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पिछले 19 सालों में हिंदुस्तान में हुए 20 से ज्यादा आतंकी हमलों का गुनहगार, सैकड़ों बेगुनाहों का क़ातिल और दुनिया के सबसे घाघ आतंकवादियों में से एक है मसूद अज़हर. वही मसूद अज़हर जिसके संगठन जैश-ए-मोहम्मद को 18 साल पहले 2001 में ही संयुक्त राष्ट्र संघ ने आतंकवादी संगठन करार दे दिया था. मगर कमाल देखिए कि वही संयुक्त राष्ट्र 18 साल बाद भी ये फैसला नहीं कर पा रहा है कि जिसका संगठन आतंकवादी संगठन है, उस संगठन के मुखिया को वो आतंकवादी करार दे या ना दे?

है ना कमाल की बात कि संगठन तो खूनी है, पर उसी संगठन के मुखिया को कातिल करार नहीं दे सकते. क्योंकि संयुक्त राष्ट्र में शामिल सारी दुनिया एक तरफ और बस चीन एक तरफ है. चीन नहीं चाहता इसलिए मसूद अज़हर आतंकवादी नहीं है.

पिछले दो दशक से अगर किसी ने हिंदुस्तान को सबसे ज़्यादा खून के आंसू रुलाए हैं, तो वो यही शख्स है. पिछले दो दशकों से अगर किसी ने हिंदुस्तान के खिलाफ़ सबसे ज़्यादा साज़िशें रची हैं, तो वो यही नाम है और पिछले दो दशकों में अगर किसी ने हिंदुस्तान को सबसे ज़्यादा ज़ख्म दिए हैं, तो वो यही चेहरा है.

लेकिन इतना होने के बावजूद वो ना सिर्फ़ आतंकवादियों के चारागाह यानी पाकिस्तान में दनदनाता घूम रहा है, बल्कि चीन की पुश्तो-पनाही में लगातार ज़हर भी उगल रहा है. अब इसे आप हिंदुस्तान के खिलाफ़ चीन की कूटनीतिक साज़िश कहें, पाकिस्तान से उसकी दोस्ती का सिला या फिर हिंदुस्तान को हल्के में लेने की ग़लती. चीन ने संयुक्त राष्ट्र संघ में आतंकियों के इस सरगना के हक में बार-बार अपनी राय रख कर ये ज़ाहिर कर दिया है कि आतंकवाद के मामले पर वो कैसी दोहरी चाल चल रहा है. फिर चाहे इस चाल से हिंदुस्तान लहूलुहान ही क्यों ना होता रहे.

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दरअसल, मसूद अज़हर के खिलाफ़ बीसियों सुबूतों के साथ हिंदुस्तान ने यूएन से उसे आतंकवादी करार देने की दरख्वास्त की थी. लेकिन चीन ने ना सिर्फ़ उसे आतंकवादी मानने से इनकार कर दिया, बल्कि ये भी कहा कि किसी पर यूं ही कोई टैग चस्पा करने में ऐसी जल्दबाज़ी ठीक नहीं. चीन का कहना है कि पहले भारत के दावे की पड़ताल की जानी चाहिए.

सितम देखिए कि जिस मसूद अज़हर को आतंकवादी करार दिए जाने को लेकर यूएनओ में ये माथापच्ची का दौर चला, उसी मसूद अज़हर के संगठन यानी जैश-ए-मोहम्मद को 15 मुल्कों वाली सुरक्षा परिषद पहले ही आतंकवादी संगठन करार दे चुकी है. ऐसे में सवाल ये उठता है कि आख़िर चीन की इस चाल का क्या मतलब है? आख़िर इतना ख़ौफ़नाक आतंकवादी कैसे उसकी आंखों का तारा बना है? और आख़िर क्यों चीन ऐसी चालों से हिंदुस्तान से भी नाराज़गी मोल लेने को तैयार है?

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