नक्सल प्रभावित राज्यों के युवाओं को लेकर यदि यह सोच है कि वह विचारधारा और अपनी जमीन के लिए नक्सली आंदोलन में शामिल हो रहे हैं, तो गलत भी साबित हो सकती है. इन क्षेत्रों में हुए अध्ययन के मुताबिक नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के नवयुवक सैनिकों की तरह पोशाक, वेशभूषा और हथियार के मोहवश नक्सल आंदोलन में शामिल हो रहे हैं. कुछ को तो नक्सल विचारधारा तक का पता नहीं है.
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर स्थित शासकीय विज्ञा महाविद्यालय के रक्षा विज्ञान विभाग के प्रमुख गिरीश कांत पांडेय के नेतृत्व में शोधार्थियों का एक दल शोध कर रहा है. वे यह जानने का प्रयास कर रहे हैं कि युवा वर्ग नक्सली आंदोलन के प्रति क्यों आकर्षित हो रहे हैं. आखिर क्या वजह है कि युवा आधुनिक जिंदगी को दरकिनार करके जंगलों में जी रहे हैं.
गिरीश कांत पांडेय ने बताया कि पिछले कुछ समय में उनके दल ने लगभग 25 आत्मसमर्पित माओवादियों से बातचीत की है. उनसे यह जानने का प्रयास किया कि उन्होंने करीब 12 वर्ष तक नक्सलियों का साथ क्यों दिया और किन कारणों से उनका साथ छोड़ दिया. उनसे बातचीत के दौरान चौंकाने वाली बात सामने आई, जिसे जानकर सभी हैरान रह गए.
नक्सल विचारधारा से हैं अनभिज्ञ
आत्मसमर्पित नक्सलियों को नक्सलियों के विचारधार के बारे में जानकारी नहीं है. वे न ही इस आंदोलन में शामिल होने के कारणों को बेहतर तरीके से बता पाए. शोध दल ने पिछले वर्ष दिसंबर महीने में महाराष्ट्र के नक्सल प्रभावित गढ़चिरौली जिले का दौरा किया था. वहां 13 नक्सलियों और उनके परिजनों से बातचीत की थी. इस वर्ष छत्तीसगढ़ के 12 आत्मसमर्पित नक्सलियों से बातचीत की गई.
सुराग देने पर एक करोड़ का इनाम
बताते चलें कि सरकार ने शीर्ष नक्सली नेताओं के ठिकाने के बारे में सुराग देने वाले को एक करोड़ रूपये इनाम देने की घोषणा की है. सीआरपीएफ प्रमुख दिलीप त्रिवेदी ने बताया कि ऐसी नीतिगत निर्णयों से वित्तीय समझदारी होती है. एक नक्सली नेता को दबोचने पर एक करोड़ रुपये खर्च होने की तुलना में सुरक्षा बलों की तैनाती में करोड़ों रुपये खर्च होते हैं.