एजेंडा आजतक 2023 के सेशन 'ताकत वतन की' में परमवीर चक्र विजेता कैप्टन योगेंद्र यादव ने बताया कि हमारी सेना पूर्व, पश्चिम और उत्तर तीनों सीमाओं पर बेहद मजबूत है. हमारे सैनिक लगातार नई तकनीक सीख रहे हैं. नई टैक्टिक्स सीख रहे हैं. हम दुश्मन पर हमेशा नजर रख रहे हैं. किसी भी समय उन्हें बर्बाद कर सकते हैं. सबसे बड़ी बात ये है कि हमारे सैनिकों के पास जिगर है. जिनके पास जिगर होता है, वो किसी भी दुश्मन से लड़ने के लिए तैयार रहते हैं.
हमारे युवा और सैनिकों की ताकत और क्षमता असीम है. जहां पूरी दुनिया फेल हो जाती है. वहां हमारे सैनिक तिरंगा फहराते हैं. सिर्फ भारत का सैनिक 72 घंटे तक बिना कुछ खाए-पिए जी सकता है. दुनिया के किसी देश का कोई सैनिक ऐसा नहीं कर सकता. फौज ने मुझे ताकत दी. देश की ताकत बने. सुपरपावर बनाए. समृद्ध बनाएं. स्वस्थ बनाएं. देश हमारा जरूर सुपर पावर बनेगा.
जब योगेंद्र यादव से पूछा गया कि आप अब क्या कर रहे हैं? वर्दी टांग दी है. तब उन्होंने कहा कि वर्दी टंगी नहीं है. ये हमारी सोच में है. विचार में है. मैं देश के युवाओं के साथ जुड़ रहा हूं. देश की ऊर्जा के साथ बातें कर रहा हूं. सैनिक स्कूल हनुमानगढ़ का मेंटर हूं. एक कोचिंग सेंटर के साथ जुड़ा हूं. हाल ही में 1.60 लाख बच्चों के लिए मोटिवेशनल सेशन किया है. देश की सेना ने इस योग्य बनाया. ताकि इस तरह के कुछ सकारात्मक काम कर सकूं.
करगिल की कहानी... दाहिने हाथ की हड्डी झूल गई, बाएं पैर में मांसपेशियां नहीं बची
परमवीर चक्र विजेता योगेंद्र यादव ने कहा कि उन्हें 17 गोलियां लगी थीं. कुछ गोलियां तो पाकिस्तानी सैनिकों ने चेक करने के लिए मारी थीं. ये जांचने के लिए जिंदा है या मर गया. भारत की जो भौगेलिक स्थिति है, वो हमारे सैनिकों को हर तरह के युद्ध और परिस्थितियों के हिसाब से ढाल देती है. उसकी ट्रेनिंग और लीडरशिप उसे बहुत कुछ सिखाती है.
भौगोलिक स्थिति सैनिक का सर्वांगीण विकास करती है.
माइनस 20 डिग्री सेल्सियस टेंपरेचर था. मेरे सारे साथी शहीद हो गए थे. पाकिस्तानी सैनिक डबल चेक करने के लिए दोबारा गोली मार रहे थे. बूट मार रहे थे. पत्थर मार रहे थे कि कहीं भारतीय सैनिक जिंदा तो नहीं है. पर सब सह लिया. फिर जैसे वो पलटे ग्रैनेड से हमला किया. फिर उनकी राइफल से उन पर गोलियां बरसाईं. घायल होने का बावजूद पांच को मारा.
अलग पैशन था. उस समय मुझे गोली मार रहे थे, दर्द नहीं हो रहा था. इस जख्मी हालत में भी टाइगर हिल की सूचना नीचे मुझे अपने कमांडिंग ऑफिसर को देना था. आपने फिल्मों में देखा होगा कि गर्दनें कटती हैं. धड़ चलता रहता है. मैंने ये नजारा करगिल युद्ध में अपनी आंखों से देखा था. आर्टिलरी के बम से हमारे साथी का सिर अलग हो जाता है लेकिन शरीर गिरने से पहले आगे बढ़ता रहता है.
ईश्वर में आस्था रखी... उन्होंने रास्ता दिखाया, तब टाइगर हिल से नीचे आ पाया
योगेंद्र कहते हैं कि अगर आप रोते हैं तो आप अपनी शक्ति को पहचानते हैं. करगिल युद्ध के समय 19 साल की उम्र थी. ढाई साल की सर्विस थी. जहां तक नजर जा रही थी, सिवाय बर्फ और पहाड़ के कुछ नहीं था. जिन साथियों के साथ रात भर चले थे, अब उनकी लाशें पड़ी हैं. उस समय मैं बहुत रोया था. रोता रहा. ईश्वर से कहता रहा कि मुझे नीचे पहुंचा दें.
तब एक आवाज सुनाई दी कि इस नाले से नीचे की तरफ चला जा. हाथ को बांधने की चेष्टा करने लगा. हाथ अलग करने की कोशिश की. लेकिन फेल रहा. दोबारा से आवाज आई. योगेंद्र बेटे इस नाले से नीचे चला जा. वो आवाज ईश्वर की थी. सबको ये लग रहा था कि ये मर जाएगा. मुझे इतना याद है कि इंजेक्शन लगाया. सीओ साब से बात हुई थी. नर्सिंग असिस्टेंट बूट निकालने की कोशिश की. नहीं निकला. क्योंकि जूते और पैर में ग्रैनेड की कील फंसी थी. तीन दिन बाद होश आया. उसी रात टाइगर हिल पर जीत दर्ज हुई.
मेरे पिता फौजी, भाई फौजी, मैं फौजी... अब मेरे बेटे भी जल्द ही वर्दी पहनेंगे
योगेंद्र यादव ने कहा कि ये सब काम करने के लिए इस धरती से ताकत मिलती है. ये धरती 84 लाख योनियों की धरती है. भारत माता की धरती पर जन्म लेना सौभाग्य की बात है. वर्दी और भारत का प्यार मेरे पिता को मिला, मेरे भाई को मिला. फिर मुझे मिला. अब मेरे बेटे भी वर्दी पहनेंगे. हाथ ही हड्डी नहीं थी. पैर की मांसपेशियां नहीं थीं. नीचे आकर कमांडर को बताना था. आस्था रखी भगवान पर. ईश्वर को समर्पित कर दिया था मैंने. फिर मुझे वो ताकत मिली. जैसे द्रौपदी ने खुद को समर्पित किया तब भगवान ने चीर बढ़ा दी.
हमारे देश के युवा सुसाइड करके देश बर्बाद नहीं कर सकते, इसलिए कोटा गया
मैं कोटा भी गया था. हमारे देश का युवा सुसाइड कर रहा है. वो हताश कैसे हो सकता है. मैं उसे ऐसे नष्ट होने नहीं दे सकता था. इसलिए उनसे मिलने गया. पैरेंट्स को अपने बच्चों से ज्यादा अपेक्षाएं नहीं रखनी चाहिए. मेरे पड़ोस का बेटा इंजीनियर बन रहा है, तो मैं भी अपने बच्चे को इंजीनियर बना दूं. एक बच्ची मिली, उसने कहा कि मैं एथलीट हूं. 2024 में ओलंपिक जाना था. लेकिन पापा ने मेडिकल की तैयारी के लिए यहां भेज दिया. तब उसे कहा आप नीट की तैयारी करो. स्टेडियम में जाओ प्रैक्टिस करो. अभी डॉक्टरी की तैयारी कर रही है. डॉक्टर बन गई तो सेना की सेवा कर सकती है. सेना में आ गई तो फिर उसे बहुत कुछ सीखने और करने को मिलेगा.
पूरे गांव में तीन दिन खाना नहीं बना था, न ही किसी को भरोसा था मेरे जिंदा रहने का
श्रीनगर में इलाज के बाद मुझे दिल्ली लाया गया. मां अस्पताल आई मिलने. तो पहचान नहीं पाईं. ढाढ़ी बढ़ी हुई थी. चारों तरफ पट्टियां थी. मां को आवाज लगाई तब वो पहचान पाईं. फिर मेरी पत्नी आईं. मैंने पत्नी से कहा कि रो क्यों रही हो. 25 लाख नहीं मिले इसलिए. ये मैंने परिवार को गम से बाहर निकालने के लिए कहा था.
पूरा गांव एक कन्फ्यूजन की वजह से ये सोच रहा था कि योगेंद्र यादव शहीद हो गया. मेरे भाई ने गांव जाकर लोगों को बताया लेकिन किसी को भरोसा नहीं था. पूरे गांव ने तीन दिनों तक खाना नहीं खाया था. किसी के घर में खाना नहीं बना था. मेरे पिता ने 65-71 की जंग लड़ी. उन्हें मुझपर फक्र है. 42 साल की उम्र में रिटायरमेंट. क्या ये ठीक किया है आपने अपने साथ. मैंने 16.5 साल में सेना ज्वाइन की थी. 21 साल की उम्र सुबेदार मेजर बना. फिर रिटायरमेंट. काम करने का टेन्योर होता है.