बच्चों के भविष्य का सपना माता-पिता उसके पैदा होने के साथ ही देखने लगते हैं, जिसमें सबसे पहला कदम होता है बच्चे को स्कूल भेजना. फिर होता है कि बच्चा बड़ा होकर क्या करेगा, कौन-से कॉलेज में जाएगा, कौन-सा कोर्स करेगा. डॉक्टर बनेगा या इंजीनियर. यह आम सवाल सभी माता-पिता के मन में होते हैं लेकिन अगर आप राजधानी दिल्ली में रहते हैं तो यहां नर्सरी एडमिशन एक बड़ी चुनौती है. यहां नामी स्कूल में बच्चे के दाखिले की दौड़ बहुत कठिन है.
कॉलेज और नौकरी की तो छोड़िए यहां बच्चे को नर्सरी क्लास में भर्ती कराने के लिए पेरेंट्स को ऐड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ता है. देश में JEE NEET, इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन पाने से ज्यादा मुश्किल अब दिल्ली में नर्सरी कक्षा में भर्ती होना लग रहा है. दिसंबर माह की शुरुआत के साथ ही यह कवायद शुरू हो जाती है. आइए एक्सपर्ट से जानते हैं कि दिल्ली में कैसे होता है नर्सरी एडमिशन, क्यों इतना कठिन है नामी स्कूलों में दाखिला, क्या है प्रक्रिया.
बच्चे में एडमिशन के लिए माता-पिता का भी इंटरव्यू
दिल्ली के प्राइवेट स्कूलों में नर्सरी एडमिशन के लिए शिक्षा निदेशालय की ओर से गाइडलाइन तय की गई हैं. हर साल दाखिले के लिए दिल्ली सरकार की ओर से ये पैरामीटर जारी होते हैं. इसके अनुसार स्कूलों को तय मानदंडों का पालन करते हुए दाखिला लेना होता है.लेकिन दिल्ली में कुछ स्कूल ब्रांड बन गए हैं. यहां दाखिले की होड़ इस कदर होती है कि टॉप 20 स्कूलों में दाखिले के लिए एक सीट पर 250 से ज्यादा की दावेदारी होती है. शायद यही वजह है कि कई स्कूल अपनी मनमानी करते हैं. दाखिला मामलों के विशेषज्ञ सुमित वोहरा बताते हैं कि सरकार की तमाम गाइडलाइंस के बावजूद कई स्कूलों ने ऐसे पैमाने सेट किए हुए हैं जिन्हें पूरा करने में परेंट्स के पसीने छूट जाते हैं.
पहले ही प्राइवेट स्कूल का फॉर्म लेना, उसे भरकर जमा करने के लिए घंटों लम्बी लाइन में लगना और महंगी फीस के लिए खुद को तैयार करना पड़ता है. उस पर डोनेशन और नर्सरी क्लास के लिए बच्चे का इंटरव्यू और साथ ही माता-पिता से भी ऐसे सवाल-जवाब किए जाते हैं जैसे बच्चे का एडमिशन भी माता-पिता की योग्यता पर होगा. सुमित वोहरा कहते हैं कि अगर आपके पास अच्छी नौकरी और डिग्री है तो सही है, लेकिन अगर आपकी शैक्षणिक योग्यता स्कूल को कम लगी तो इसका असर आपके बच्चे के एडमिशन पर पड़ सकता है.
राजधानी दिल्ली के स्कूलों में प्री-प्राइमरी कक्षाओं के लिए लगभग 1,700 निजी स्कूलों में नर्सरी प्रवेश के लिए 1.25 लाख से अधिक सीटें उपलब्ध हैं. स्कूलों ने विभिन्न पूछताछ, डोनेशन, सीट बुक करने समेत अन्य चीजों के लिए पेरेंट्स को फोन करना शुरू कर दिया है. हर साल हजारों अभिभावक अपने बच्चे के एडमिशन के लिए फॉर्म भरते हैं, जिसमें से कुछ का होता है और कुछ के नाम वेटिंग लिस्ट में चले जाते हैं. एडमिशन के लिए यहां इतनी मारा-मारी है कि सीट बुक करने के लिए पेरेंट्स स्कूल को डोनेशन देने के लिए तैयार हैं जो कि सरासर एक अपराध है.
Nurseryadmission.com पोर्टल के संस्थापक सुमित वोहरा ने बताया कि स्कूलों ने एडमिशन की फाइनल लिस्ट जारी होने से पहले ही अभिभावकों को डोनेशन के लिए फोन करना शुरू कर दिया गया है. ऐसे में बच्चों के माता-पिता को कहा जा रहा है कि वह वेटिंग लिस्ट और फाइनल लिस्ट का इंतजार करें. अगर आपके बच्चे का नाम इन लिस्ट में नहीं आता है तो आप स्कूल से लिखित में इसका कारण मांग सकते हैं.
बच्चे का ऐडमिशन ना होने पर पूर्वी दिल्ली की सीमा ने सुनाई आपबीती
पूर्वी दिल्ली की रहने वाली सीमा बताती हैं कि दिल्ली में उन्हें अपने बच्चे के नर्सरी एडमिशन कराने के लिए काफी मशक्कतें की थीं. इसके बावजूद उनका बच्चा हाई-क्लास प्राइवेट स्कूल में एडमिशन नहीं पा पाया. सीमा ने प्राइवेट स्कूलों के कई चक्कर लगाएं. कभी उनकी शैक्षणिक योग्यता पर सावल उठाए गए तो कभी महंगी फीस देखकर वह दंग रह गईं.उन्होंने ना जाने कितने स्कूलों के फॉर्म भरे, नेता और मंत्री से बात की लेकिन कुछ ना हो सका. उनका बेटा पढ़ाई में अव्वल है और फिलहाल दिल्ली के एक स्कूल में कक्षा 2 में पढ़ता है, लेकिन उसे और उसके माता-पिता को हमेशा इस बात का अफसोस रहेगा कि प्राइवेट स्कूलों द्वारा सेट किए हुए ऐसे मानदंडों की वजह से उनका बच्चे का हाई-फाई सुविधाओं से लैस स्कूल में एडमिशन नहीं करा पाए.
ब्रांड के नाम पर पेरेंट्स स्कूल की हर मांग को तैयार
दिल्ली पेरेट्स ऐसोसिएशन की अध्यक्ष अपराजिता गौतम प्राइवेट स्कूलों की ऐसी स्थिति को देखते हुए कहती हैं कि यहां के बड़े हाई-फाई स्कूल अब लोगों की नजर में एक ब्रांड बन चुके हैं. वहीं दूसरे स्कूलों को पेरेंट्स बी या सी ग्रेड की नजर से देखते हैं. इसी होड़ में पेरेंट्स अपने बच्चे इन टॉप स्कूलों में एडमिशन कराने के लिए सारी हदें पार कर देते हैं. वो ये भी नहीं देखते कि स्कूल की मांगें वाजिब हैं भी या नहीं. ना वो कभी अपनी टॉप चॉइस में आने वाले स्कूल का जायजा लेते हैं कि स्कूल में फायर सेफ्टी कैसी है, वहां के शिक्षक कैसे हैं, वहां का परिवहन कैसा है, आदि-आदि. वो सिर्फ ब्रांड के नाम पर एडमिशन लेने को आतुर हो जाते हैं. जबकि पेरेंट्स को सबसे पहले ये देखना चाहिए कि स्कूल उनके घर से नजदीक है या नहीं और स्कूल की साख दूसरे पेरेंट्स की नजर में कैसी है.
नर्सरी क्लास की महंगी फीस देखकर पेरेंट्स परेशान
नर्सनी क्लास की फीस भी पेरेंट्स को परेशान कर रही है. माता-पिता को कुछ स्कूलों द्वारा अत्यधिक फीस वसूलने के बारे में शिकायत करते देखा जा सकता है, जबकि कुछ माता-पिता का मानना है कि स्कूल शीर्ष श्रेणी की सुविधाएं प्रदान करते हैं, यही कारण है कि उनकी फीस उचित है. शैक्षिक ऐप- यूनीअप्लाई के मुताबिक, दिल्ली के जनकपुरी में बने एक स्कूल में नर्सरी क्लास की प्रति माह 4,200 रुपये फीस है, वहीं पश्चिम विहार के एक पब्लिक स्कूल में 7,700 रुपये प्रति माह है. पंजाबी बाग के नामी स्कूल में लगभग 11,000 रुपये प्रति माह शुल्क लगता है. वहीं पटेल नगर का एक पब्लिक स्कूल प्रति माह 9,200 रुपये शुल्क लेता है. इससे यह साबित होता है कि फीस तय करने में सरकार की गाइडलाइन को कोई फॉलो नहीं करता. दिल्ली सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद स्कूल अपने मन मुताबिक फीस वसूल रहे हैं.