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ड्रोन से पहुंचेगा आपका खाना! जोमैटो के CEO की बात पर 'फ्यूचर ऑफ वर्क' को लेकर छ‍िड़ी बहस

दीपिंदर गोयल ने एक्स पर कहा कि अगर आगे चलकर डिलीवरी के लिए पर्याप्त लोग नहीं मिले, तो जोमैटो ड्रोन की तरफ जा सकता है. उन्होंने साफ किया कि अभी कोई ठोस योजना नहीं है, लेकिन भारत में गिग वर्क, टेक्नोलॉजी और डिलीवरी के बदलते मॉडल पर बहस तेज है.

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Representative image created using AI
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भारत में गिग इकॉनमी और क्विक कॉमर्स का दायरा जिस तेजी से बढ़ रहा है, उसने युवाओं के लिए रोजगार के नए दरवाजे तो खोले ही हैं, लेकिन क्या आने वाले 10-15 सालों में हर दूसरा युवा डिलीवरी बॉय की नौकरी ही करेगा? सोशल मीडिया पर छिड़ी इसी बहस के बीच जोमैटो के संस्थापक और सीईओ दीपिंदर गोयल का एक बड़ा बयान सामने आया है, जिसने फ्यूचर ऑफ वर्क और ऑटोमेशन की नई बहस छेड़ दी है.

दीपिंदर गोयल ने साफ संकेत दिया है कि अगर भविष्य में कंपनी को डिलीवरी के लिए पर्याप्त लोग नहीं मिले, तो जोमैटो और उसकी क्विक-कॉमर्स कंपनी ब्लिंकिट इंसानों की जगह ड्रोन आधारित डिलीवरी का रुख कर सकती हैं.

'हर कोई डिलीवरी वर्कर न बने, हमें बेहतर नौकरियां चाहिए'

दरअसल, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर एक यूजर ने सवाल उठाया था कि क्या अगले 15 सालों में हर इंसान डिलीवरी वर्कर बन जाएगा? इस सवाल का जवाब देते हुए दीपिंदर गोयल ने जोमैटो का विजन साझा किया. गोयल ने लिखा, 'उम्मीद है ऐसा नहीं होगा. हमें अपने देश के युवाओं के लिए बेहतर और गुणवत्तापूर्ण नौकरियां चाहिए. जब इस काम के लिए हमारे पास पर्याप्त लोग नहीं होंगे, तब हम ड्रोन डिलीवरी की तरफ बढ़ने की उम्मीद करेंगे.' 

कंपनी के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 (FY 2025-26) में ही 31 लाख से ज्यादा भारतीय जोमैटो और ब्लिंकिट के साथ बतौर डिलीवरी पार्टनर जुड़े हुए हैं.

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गोयल ने बताया कि जोमैटो की पैरेंट कंपनी 'इटरनल' इस वक्त कर्मचारियों, वेयरहाउस वर्कर्स और उनके परिवारों को मिलाकर देश की 1 फीसदी से ज्यादा आबादी की आजीविका को सहारा दे रही है. उनका लक्ष्य 2030 तक इस आंकड़े को 5 फीसदी तक पहुंचाने का है.

भारत में ड्रोन डिलीवरी का अब तक का क्या है स्टेटस?

भले ही दीपिंदर गोयल ने अभी तक किसी औपचारिक ड्रोन प्लान का ऐलान नहीं किया है, लेकिन भारत में टेक कंपनियों के लिए ड्रोन डिलीवरी का रास्ता इतना आसान भी नहीं रहा है. जैसे कि साल 2021 में स्विगी ने उत्तर प्रदेश के एटा और पंजाब के रूपनगर में मेडिकल पैकेज और खाने की ड्रोन डिलीवरी के ट्रायल किए थे.

फिर 2022 में स्विगी इंस्टामार्ट ने दिल्ली-एनसीआर और बेंगलुरु में ड्रोन के जरिए किराना सामान डार्क स्टोर से तय कलेक्शन प्वाइंट तक पहुंचाने का मॉडल आंका था. हालांकि, ये तमाम प्रयास अभी केवल ट्रायल तक सीमित रहे हैं और कमर्शियली पूरी तरह लागू नहीं हो पाए हैं.

ग्लोबल मार्केट का हाल: अमेरिका में शुरू हो चुकी है डिलीवरी

भारत में जहां ड्रोन से खाना पहुंचना अभी दूर की कौड़ी लगता है, वहीं ग्लोबल मार्केट में यह हकीकत बन चुका है. अमेरिका में डोरडैश ने विंग और फ्लाइट्रेक्स जैसी ड्रोन कंपनियों के साथ हाथ मिलाया है. डलास-फोर्ट वर्थ और शार्लट जैसे इलाकों में चुनिंदा रेस्तरां से ड्रोन के जरिए खाना डिलीवर हो रहा है.

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हालांकि, एक्सपर्ट्स का मानना है कि ड्रोन तकनीक की अपनी सीमाएं हैं. पैकेज का वजन, खराब मौसम और घनी आबादी वाले शहरी इलाकों में सेफ लैंडिंग जैसे मुद्दे आज भी ड्रोन डिलीवरी के रास्ते में सबसे बड़े रोड़े हैं.

युवाओं के लिए इसका क्या मतलब है?

दीपिंदर गोयल का यह बयान उन युवाओं के लिए एक बड़ा मैसेज है जो गिग इकॉनमी पर निर्भर हैं. टेक एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारत को केवल लो-स्किल डिलीवरी जॉब्स तक सीमित नहीं रहना चाहिए. एआई, ऑटोमेशन और ड्रोन टेक्नोलॉजी के आने से भविष्य में डिलीवरी पार्टनर्स की जगह ड्रोन फ्लीट मैनेजर, मेंटेनेंस इंजीनियर और लॉजिस्टिक्स डेटा एनालिस्ट जैसे हाई-पेइंग और स्किल-बेस्ड रोल्स की मांग तेजी से बढ़ेगी.

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