जब सबसे बड़े त्याग की बात आती है तो पन्ना धाय का बलिदान जग प्रसिद्ध है जिन्होंने अपने बेटे का बलिदान दिया था. राजस्थान में यह मिसाल अकेली नहीं है बल्कि एक और धाय मां थी जिन्होंने राजगद्दी के वारिस को बचाने के लिए अपने मासूम बेटे की जान कुर्बान कर दी, उनका नाम गोरां धाय था. अशोक गहलोत सरकार ने राजस्थान में अनाथ बच्चों के लिए उन्हीं के नाम पर गोरां धाय पुनर्वास योजना चलाई है.
बता दें कि सन् 1679 ई. में महाराजा अजित सिंह का जन्म हुआ. इनके जन्म से पूर्व ही महाराज जसवंत सिंह की मृत्यु हो गई थी. उस समय मारवाड़ का और कोई उत्तराधिकारी नहीं होने की वजह से दिल्ली के शासक औरंगजेब ने कब्जा कर लिया था.
जब अजीत सिंह का जन्म हुआ तब राठौड़ सम्प्रदाय फिर से मारवाड़ का शासन और पद लेने के लिए औरंगजेब के पास गए. तब औरंगजेब ने शर्त रखी कि अगर युवराज अजित सिंह का लालन-पालन दिल्ली में उनके सामने हो तभी वो ऐसा करेंगे क्योंकि औरंगजेब की मंशा अजित सिंह को मुसलमान बनाने की थी.
महाराजा जसवंत सिंह जी के स्वामिभक्त रहे वीर दुर्गादास राठौड़ और अन्य राजभक्तों को यह मान्य नहीं था, इसलिए उन्होंने अजित सिंह को गुप्त तरीके से औरंगजेब के चंगुल से बचाने की योजना बनाई. तब जोधपुर के मंडोर निवासी मनोहर गहलोत की पत्नी बघेली रानी जिन्हें गोरां धाय भी कहा जाता था, ने एक सफाई कर्मी का वेश बनाकर अजित सिंह को अपने पुत्र से बदल कर उन्हें दिल्ली की सीमा से सुरक्षित बाहर निकाल लिया.
20 सालों तक उनकी परवरिश गोरां धाय ने अपने पुत्र के सामान ही की. उनकी स्वामिभक्ति और उनका यह बलिदान स्मरणीय बन गया और इसके साथ ही युवराज अजीत सिंह जी को बचाने के लिए अन्य राठौड़ों का बलिदान आज भी याद रखा जाता है.
बीस साल बाद मौका पाकर वीर दुर्गादास राठौड़ और अन्य सरदारों ने पुन: जोधपुर पर अधिकार कर लिया और अजित सिंह जी को राजगद्दी पर बैठा दिया. सन् 1704 ई. में गोरां धाय की मृत्यु हो गई.