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जानें- नोबेल पुरस्कार विजेता वीएस नायपॉल के बारे में...

त्रिनिडाड में पले-बढ़े भारतीय मूल के वीएस नायपॉल ने ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की थी. लेखन की दुनिया में उन्होंने काफी प्रसिद्धि हासिल रही. ए बेंड इन द रिवर' और 'अ हाउस फ़ॉर मिस्टर बिस्वास' उनकी चर्चित कृतियों में हैं.

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वीएस नायपॉल
वीएस नायपॉल

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साहित्य का नोबल पुरस्कार जीतने वाले भारतीय मूल के प्रसिद्ध लेखक वीएस नायपॉल का जन्म आज की रोज 17 अगस्त 1932 को ट्रिनिडाड के चगवानस में हुआ था. ये बेहद दुख ही बात है उनके जन्मदिन से 6 दिन पहले (11 अगस्त 2018) को उनका निधन हो गया था. उन्होंने 85 साल की उम्र में लंदन स्थित अपने घर में आखिरी सांस ली थी. आइए जानते हैं उनके बारे में ..

त्रिनिडाड में पले-बढ़े नायपॉल ने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्याल से पढ़ाई की थी. लेखन की दुनिया में उन्हें काफी प्रसिद्धि हासिल है. ए बेंड इन द रिवर और अ हाउस फॉर मिस्टर बिस्वास उनकी चर्चित कृतियां हैं. नायपॉल को 1971 में बुकर प्राइज़ और साल 2001 में साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक उनके निधन के बाद उनकी पत्नी ने बताया कि उन्होंने रचनात्मकता और उद्यम से भरी ज़िंदगी जी. आखिरी वक्त में वे तमाम लोग जिन्हें वह प्यार करते थे, उनके साथ थे.' नायपॉल ने अपने साहित्य जीवन में 30 से ज्यादा किताबों का लेखन किया था.

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वीएस नायपॉलः आजीवन करते रहे लेखन, जीवन में नहीं चुना दूसरा काम

साहित्य की दुनिया में योगदान

साहित्‍य के क्षेत्र में योगदान के लिए उन्‍हें अब तक कई पुरस्‍कर मिल चुके हैं. वर्ष 2008 में द टाइम्‍स ने 50 महान ब्रिटिश लेखकों की सूची में नायपॉल को 7वां स्‍थान दिया था. खास बात तो यह थी कि इस लिस्‍ट में 1945 से बाद की कृतियों को जगहों दी जानी थी. नायपॉल की कुछ उल्‍लेखनीय कृतियां हैं: इन ए फ्री स्‍टेट (1971), ए वे इन द वर्ल्‍ड (1994), हाफ ए लाइफ (2001), मैजिक सीड्स (2004).

भारतीय मूल के नोबेल पुरस्कार विजेता वीएस नायपॉल का निधन

एक रिपोर्ट के मुताबिक 1950 में उन्होंने एक सरकारी स्कॉलरशिप जीती. इसके जरिये उन्हें मनचाही कॉमनवेल्थ यूनिवर्सिटी में दाखिला मिल सकता था लेकिन उन्होंने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में दाखिला लेना उचित समझा. नायपॉल की पहली किताब 'द मिस्टिक मैसर' साल 1951 में प्रकाशित हुई थी. अपने सबसे चर्चित उपन्यास ए हाउस फॉर मिस्टर बिस्वास को लिखने में उन्हें तीन साल से ज़्यादा वक्त लगा था..

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