
देश की आजादी की लड़ाई में नेताजी सुभाष चंद्र बोस, सरदार वल्लभभाई पटेल ऐसे नाम थे जिन्होंने अपने दम पर स्वतंत्रता संग्राम की धारा बदल दी. हालांकि अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध में पटेल और बोस दोनों ने एक स्वर में हुंकार भरी थी, लेकिन निजी जीवन में इन दोनों नेताओं के बीच कई बार बार टकराव हुए. ये टकराव कांग्रेस के नेतृत्व को लेकर हुआ, तो कभी आजादी हासिल करने के तरीकों को लेकर. और एक बार तो आजादी के ये दोनों पुरोधा धन-संपत्ति के विवाद को लेकर कोर्ट में आमने-सामने थे.
जायदाद को लेकर सुभाष चंद्र बोस और सरदार वल्लभभाई पटेल के बीच टकराव की कहानी हम आपको बताएं, इससे पहले इस विवाद की पृष्ठभूमि जानना जरूरी है. आखिर क्या थी वो संपत्ति, असल में किसकी थी वो संपत्ति? जिस पर सरदार पटेल और नेताजी दोनों अपना हक जता रहे थे, आखिरकार मामला ब्रिटिश अदालत में गया और वहां साल भर मुकदमे की सुनवाई होती रही, और जब फैसला आया तो...
सरदार पटेल के भाई की संपत्ति पर दावा क्यों कर रहे थे बोस?
जिस जायदाद को लेकर पटेल और बोस के बीच मुकदमेबाजी हुई वो संपत्ति थी विट्ठलभाई पटेल की. विट्ठलभाई पटेल सरदार पटेल के बड़े भाई थे.
सुनने में ये थोड़ा अजीब लग सकता है कि ICS पास सुभाष चंद्र बोस सरदार पटेल के भाई की जायदाद पर दावा क्यों कर रहे थे? पर सच्चाई यही थी. इस जायदाद के लिए कोई मामूली बहस नहीं हुई थी. सरदार पटेल खुद चोटी के वकील थे, उन्होंने सुनिश्चित किया कि बोस को उनके भाई की संपत्ति में से एक फूटी कौड़ी भी नहीं मिल पाए.
आइए इस कहानी को थोड़ा विस्तार से जानते हैं. देश के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल पांच भाई होते थे. विट्ठलभाई पटेल सरदार पटेल से बड़े थे. दोनों ही भाई बैरिस्टर थे. अपनी विधा के महारथी. 1917 से 1922 के बीच का साल भारत में अंग्रेजों के खिलाफ बड़े पैमाने के विद्रोह का काल था. प्रथम विश्व युद्ध खत्म होते ही अंग्रेज भारत में रौलेट एक्ट लेकर आए और निजी आजादी को और भी कुचल दिया. इसके बाद खिलाफत आंदोलन, फिर पंजाब में बड़े पैमाने पर दमन. इसी दौरान गांधी जी और कांग्रेस ने असहयोग आंदोलन शुरू करने का फैसला किया. वल्लभभाई पटेल ने उसी वक्त वकालत के अपने चमकते पेशे को तिलांजलि दे दी और आजादी के आंदोलन में कूद पड़े.
अब थोड़ा पीछे चलते हैं. बात विट्ठलभाई पटेल की. 27 सितंबर 1873 को जन्मे विट्ठलभाई की पढ़ाई स्थानीय स्तर पर हुई. आजकल सॉफ्टवेयर की नौकरी के लिए जो क्रेज सिलिकॉन वैली का है, उन दिनों यही क्रेज लंदन में बैरिस्टर की पढ़ाई को लेकर रहता था. इंग्लैंड जाकर वकालत पढ़ना वल्लभ-विट्ठल दोनों का सपना था. लेकिन ब्रिटिश भारत का ये साधारण मध्यवर्गीय परिवार अपने बच्चों को लंदन भेजने में समर्थ नहीं था. लिहाजा विट्ठलभाई ने वकालत की एक छोटी सी डिग्री ली और गोधरा की अदालत में बतौर जूनियर वकील प्रैक्टिस करने लगे.
पर कहते हैं न कि अगर कोई किसी चीज को शिद्दत से चाहता है तो पूरी कायनात उसे हासिल करने में उसका साथ देती है. एक मजेदार वाकया हुआ. वरिष्ठ पत्रकार और पुस्तक 'नेहरू मिथक और सत्य' के लेखक पीयूष बबेले इस घटनाक्रम को समझाते हुए कहते हैं, "इंग्लैंड में बैरिस्टरी पढ़ने के लिए वल्लभभाई पटेल बड़ी मेहनत से पैसे जमा कर रहे थे, आखिर एक दिन उनके पास ठीक-ठाक रुपये हो गए, उन्होंने एक प्राइवेट एजेंसी से अपने लिए पासपोर्ट और टिकटों का इंतजाम करवाया."
डाक विभाग की गलती और वल्लभ के पासपोर्ट पर लंदन गए विट्ठल
उन दिनों पासपोर्ट और टिकट डाक से भेजा जाता था. वल्लभभाई लंदन जाने की तैयारी कर रहे थे और रोजाना डाक का इंतजार करते. लेकिन इसे भाग्य का फेर कहे या फिर एक मामूली गलती. इस डाक की डिलीवरी हुई बंबई में विट्ठलभाई पटेल के घर. वरिष्ठ पत्रकार पीयूष बबेले बताते हैं, "दरअसल दोनों भाइयों का नाम अंग्रेजी के V अक्षर से शुरू होता था. बड़े भाई का नाम था विट्ठलभाई झावेरीभाई पटेल, जबकि छोटे का नाम था वल्लभभाई झावेरीभाई पटेल. पासपोर्ट और टिकटों की डिलीवरी के लिए जो पता दिया गया था वो था Mr V J Patel, pleader. अब इसे नियति का फैसला कहें या कुछ और इस डाक की डिलीवरी विट्ठलभाई के घर हुई. जब ये डाक विट्ठलभाई को मिला तो वे चौंके भी और मुस्कुराए भी, लंदन जाने का सपना तो उनका भी था."
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वो सामाजिक मर्यादाओं के दिन थे. वल्लभभाई अपने बड़े भाई की बड़ी इज्जत करते थे. विट्ठलभाई ने अपने छोटे भाई को तलब किया, और कहा कि क्या ये सामाजिक प्रतिष्ठा के अनुकूल रहेगा कि बड़ा भाई घर में बैठा रहे और छोटा भाई बैरिस्टर बनने लंदन चला जाए. बड़े भैया का तर्क सुन वल्लभभाई चुप रह गए. उन्होंने लंदन जाने का सपना छोड़ दिया और इस तरह वल्लभभाई के पासपोर्ट पर विट्ठलभाई लंदन के मिडिल टेंपल वकालत पढ़ने पहुंचे.
पीयूष बबेले कहते हैं कि लंदन जाने के लिए वल्लभभाई को एक बार फिर से पैसे जोड़ने पड़े और वे लगभग 5 साल बाद लंदन पहुंचे और वकालत की पढ़ाई की.
मेधावी छात्र रहे विट्ठलभाई ने लंदन में 36 महीने का कोर्स 30 महीने में पूरा किया और क्लास में टॉप आए. 1913 में वे गुजरात लौटे. देखते ही देखते वे बंबई के नामी वकील बन गए. इस बीच 1915 में उनकी पत्नी का निधन हो गया, फिर उन्होंने शादी नहीं की. लेकिन वकालत के पेशे में उन्होंने खूब नाम और धन कमाया.
गांधी से वैचारिक मतभेद रहने के बाद भी विट्ठलभाई कांग्रेस में शामिल हुए और आजादी की लड़ाई में कूद पड़े. लेकिन 1922 में जब गांधीजी ने चौरा-चौरी कांड के बाद असहयोग आंदोलन बंद कर दिया तो विट्ठलभाई बड़े निराश हुए. उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और चितरंजन दास और मोतीलाल नेहरू के साथ स्वराज पार्टी बनाई.
विट्ठलभाई बाद के सालों में अमेरिका और यूरोप की यात्रा पर गए. यहां उन्होंने काफी प्रभावशाली संपर्क बनाए. लेकिन यूरोप में उनकी सेहत बिगड़ने लगी. आजादी के आंदोलन में गांधी के नेतृत्व से उन्हें निराशा हो रही थी. इसी दौरान यूरोप में ही सुभाषचंद्र बोस भी उनके साथ थे. दोनों ही नेता आजादी पाने के लिए गांधीजी के अहिंसा के तरीके से नाखुश थे.
वरिष्ठ पत्रकार पीयूष बबेले कहते हैं कि यूरोप से ही सुभाषचंद्र बोस ने गांधीजी को एक चिट्ठी लिखी और आजादी पाने के उनके तरीके को नाकाम बताया. इस पत्र पर विट्ठलभाई पटेल ने भी हस्ताक्षर किया था. इस चिट्ठी में दोनों नेताओं ने गांधीजी से स्वतंत्रता पाने के लिए उग्र रास्ता अख्तियार करने को कहा.
मृत्युशैया पर बोस के नाम लिखी वसीयत
विट्ठलभाई पटेल ने अपना आखिरी समय ऑस्ट्रिया में बिताया. वो काफी बीमार हो चुके थे. इस वक्त सुभाष चंद्र बोस उनकी सेवा कर रहे थे. इसी दौरान विट्ठलभाई पटेल ने एक वसीयत लिखी और अपनी संपत्ति का एक हिस्सा सुभाष चंद्र बोस के नाम कर दिया. इस वसीयत में लिखा था कि इस धन का इस्तेमाल विदेशों में भारत की आजादी के आंदोलन को रफ्तार देने के लिए किया जाएगा. आखिरकार आज से 87 साल पहले स्विटजरलैंड के जेनेवा में 22 अक्टूबर 1933 को विट्ठलभाई पटेल का निधन हो गया
वसीयत पर आमने-सामने नेताजी और पटेल
सरदार पटेल ने इस वसीयत पर कई सवाल उठाए और इसे कोर्ट में चुनौती दी. उन्होंने कहा कि इसमें किसी डॉक्टर के हस्ताक्षर नहीं हैं, इसके सभी गवाह बंगाल के ही क्यों है, जबकि उस वक्त जेनेवा में कांग्रेस के कई नेता मौजूद थे. इसके बाद ये मामला कोर्ट में चला गया. वल्लभभाई पटेल खुद बैरिस्टर थे, उन्होंने इस केस तगड़ी पैरवी करवाई.
मुकदमा हार गए नेताजी
आखिरकार बॉम्बे हाईकोर्ट में जस्टिस बीजे वाडिया की अदालत में वल्लभभाई पटेल को जीत मिली. अदालत ने विट्ठलभाई के कानूनी उत्तराधिकारी को ही उनकी संपत्ति का वारिस करार दिया. पीयूष बबेले कहते हैं कि बाद में सुभाष ने फेडरल कोर्ट में भी अपील की लेकिन वहां भी वे ये मुकदमा हार गए.
ट्रस्ट के नाम की संपत्ति
मुकदमे में जीत हासिल होते ही सरदार पटेल ने विट्ठलभाई के नाम पर एक ट्रस्ट बनाया और पूरी जायदाद इस ट्रस्ट के नाम पर कर दी. ये ट्रस्ट सामाजिक कल्याण के लिए काम करता था.
अपने दम पर अर्जित की दौलत
वरिष्ठ पत्रकार पीयूष बबेले कहते हैं कि ब्रिटिश भारत में पहली पीढ़ी के जो बैरिस्टर थे वे खानदानी रईस नहीं थे. लेकिन इन्होंने अपनी प्रतिभा और वकालत के ज्ञान के दम पर बैरिस्टरी कर अच्छी खासी दौलत अर्जित की थी. इस सूची में मोती लाल नेहरू, मोहम्मद अली जिन्ना, विट्ठलभाई पटेल, वल्लभभाई पटेल शामिल थे. अपने वक्त में वल्लभभाई पटेल अहमदाबाद के सबसे ज्यादा फीस लेने वाले वकील थे.