G-20 शिखर सम्मेलन के जरिये दुनिया सदियों पुरानी भारतीय संस्कृति, ज्ञान, बुद्धिमत्ता और प्राचीन भारत के योगदान से रूबरू हो रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन और ब्रिटिश प्रधानमंत्री ऋषि सुनक समेत कई देशों के राष्ट्रध्यक्षों और प्रतिनिधियों को आधुनिक व प्राचीन भारत के योगदान के महत्व के बारे में बता रहे हैं. इसी कड़ी में, कोणार्क चक्र, प्राचानी नालंदा विश्वविद्यालय और साबरमती आश्रम के बारे में भी बताया गया. आइए जानते हैं इनका इतिहास और महत्व.
नालंदा यूनिवर्सिटी का इतिहास
आधुनिक बिहार में भागलपुर के करीब स्थित नालंदा यूनिवर्सिटी का इतिहास करीब 1500 साल पुराना है. नालंदा यूनिवर्सिटी दुनिया के सबसे शुरुआती अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों में से एक है. नालंदा 5वीं से 12वीं सदी तक वजूद में थी. इसकी नींव गुप्त राजवंश के कुमारगुप्त प्रथम ने रखी थी. पांचवीं सदी में बने प्राचीन विश्वविद्यालय में करीब 10 हजार छात्र पढ़ते थे, जिनके लिए 1500 अध्यापक हुआ करते थे. छात्रों में अधिकांश एशियाई देशों चीन, कोरिया और जापान से आने वाले बौद्ध भिक्षु होते थे. इतिहासकारों के मुताबिक, चीनी भिक्षु ह्वेनसांग ने भी सातवीं सदी में नालंदा में शिक्षा ग्रहण की थी. उन्होंने अपनी किताबों में नालंदा विश्वविद्यालय की भव्यता का जिक्र किया है. यह बौद्ध के दो सबसे अहम केंद्रों में से एक था. यह ज्ञान और बुद्धिमत्ता के प्रसार की दिशा में प्राचीन भारत के योगदान का गवाह है.
भारत के जी 20 प्रेसीडेंसी थीम ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की तरह ही नालंदा विश्वविद्यालय सामंजस्यपूर्ण विश्व समुदाय बनाने की प्रतिबद्धता का जीवित प्रमाण है. राष्ट्रपति मुर्मू ने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ऋषि सुनक सहित G20 के नेताओं को नालंदा यूनिवर्सिटी के महत्व के बारे में समझाया. नालंदा विश्वविद्यालय प्राचीन भारत की प्रगति को दर्शाता है. राष्ट्रपति मुर्मू ने कहा कि यह बताता है कि ज्ञान और बौद्धिकता के प्रसार में प्राचीन भारत कितना आगे था. नालंदा की विरासत हमें उस समृद्ध लोकतंत्र की निरंतर याद दिलाती रहती है, जो न सिर्फ हमारे देश के अतीत का अभिन्न अंग रही है, बल्कि वर्तमान और भविष्य को भी आकार देती रही है.
क्या है कोणार्क चक्र की कहानी?
कोणार्क चक्र को 13वीं सदी में राजा नरसिंहदेव-प्रथम के शासन में बनाया गया था. कोणार्क चक्र सूर्य के विशालकाय रथ की तरह बनाया गया है. जिसे सात घोड़े खींचते हैं. इस रथ में कुल मिलाकर 24 पहिये लगे हैं. चक्र में प्रदर्शित सात घोड़े यानी हफ्ते के सात दिन. 12 पहिये यानी साल के बारह महीने. जबकि इनका जोड़ा यानी 24 पहिये मतलब दिन का 24 घंटा. इसके अलावा 8 मोटी तीलियां 8 प्रहर यानी हर तीन घंटे के समय को दर्शाती हैं.
इसे जीवन का पहिया (Wheel of Life) कहा जाता है. यह चक्र लगातार बढ़ते समय की गति, कालचक्र के साथ-साथ प्रगति और निरंतर परिवर्तन का प्रतीक है. यह लोकतंत्र के पहिये के एक शक्तिशाली प्रतीक के रूप में कार्य करता है. कुछ मान्यताओं के अनुसार कोणार्क चक्र की 24 तीलियां भगवान विष्णु के 24 अवतारों को भी दिखाती हैं. कुछ इन 24 तीलियों को 24 अक्षर वाले गायत्री मंत्र से भी जोड़कर देखते हैं.
ये भी पढ़ें: G20 Summit: संस्कृति ही नहीं, साइंस भी समाया है कोणार्क चक्र में, जिसे PM मोदी ने वैश्विक नेताओं को दिखाया
साबरमीत आश्रम का इतिहास
1915 में गांधीजी के दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद भारत में उनका पहला आश्रम 25 मई 1915 को अहमदाबाद के कोचरब क्षेत्र में स्थापित किया गया था, लेकिन गांधीजी रहने के लिए ऐसी जगह की तलाश कर रहे थे जहां वे खेतीबाड़ी, पशु पालन, गौशाला, खादी का काम आदि कर सकें. करीब दो साल बाद 17 जून 1917 को साबरमती के किनारे उनका आश्रम स्थांतरित कर दिया गया. साबरमती नदी के किनारे होने की वजह से उनके आश्रम को साबरमती आश्रम कहा गया. इसे हरिजन आश्रम भी कहा जाता है. 1917 से 1930 तक मोहनदास गांधी का घर था जो भारत की स्वतंत्रता के आंदोलन के मुख्य केंद्रों में से एक था. इस आश्रम में रहते समय गांधीजी ने ऐसी पाठशाला बनाई जो मानव श्रम, कृषि और साक्षरता को केंद्रित करके उन्हें आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर कर सकें. 12 मार्च 1930 को गांधीजी ने इसी आश्रम से दांडी यात्रा शुरू की थी.
ये भी पढ़ें: G20 का हर बैकड्रॉप कुछ कहता है... पहले कोणार्क चक्र, फिर नालंदा और अब साबरमती आश्रम
दांडी यात्रा के दौरान ब्रिटिश अधिकारियों ने 60 हजार से ज्यादा स्वतंत्रता सेनानियों को जेल में डाल दिया था और उनकी संपत्ति जब्त कर ली थी. तब गांधीजी ने अंग्रेजों से साबरमती आश्रम भी जब्त करने करने के लिए कहा लेकिन ऐसा नहीं हुआ. हालांकि 22 मार्च 1933 को गांधीजी ने खुद ही साबरमती आश्रम छोड़ दिया और प्रण लिया की जबतक देश स्वतंत्रता नहीं हो जाता है तबतक वे वापस इस आश्रम में नहीं लौटेंगे. 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र देश बना और जनवरी 1948 में गांधीजी की हत्या कर दी गई और वे यहां कभी वापिस नहीं लौट सके.