22 सितंबर वो तारीख है जिस दिन भारत पर दो सौ साल तक राज करने वाली ईस्ट इंडिया कंपनी की नींव पड़ी थी. 1599 में 22 सितंबर का ही दिन था जब लंदन में इंग्लैंड के 21 बड़े कारोबारियों की एक बैठक हुई थी. इस बैठक में भारत के साथ कारोबार करने के लिए एक कंपनी के गठन पर विचार हुआ और इस तरह से ईस्ट इंडिया कंपनी बनाने पर अंग्रेज व्यापारियों की सहमति बनी.
शुरू से ही पश्चिमी देशों को इंडिया नाम लुभाता रहा है. क्योंकि भारत को किसी जमाने में सोने की चिड़ियां कहा जाता था. ऐसे में इंडिया तक कैसे पहुंचा जाए और वहां की खनिज संपदा का दोहन कर कैसे उसे अपने देशों तक लाया जाए, यह उस जमाने में यूरोपीय देशों की एक बड़ी चुनौती थी. खासकर, तब जब भारत से लौटकर इंग्लैंड और पुर्तगाल पहुंचे कुछ व्यापारियों ने यहां के वैभव का
वर्णन किया.
हमेशा से पश्चिमी देशों के लिए कौतूहल का केंद्र था भारत
ऐसे की एक वाकये के बाद कुछ अंग्रेज व्यापारियों ने भारत की यात्रा पर जाने का मन बनाया. इसके लिए एक मुहिम की जरूरत थी और उस मुहिम के संचालित करने के लिए एक संगठित कंपनी का गठन करना और भी ज्यादा जरूरी था. तब 1599 में इंग्लैंड के प्रमुख व्यापारियों और खोजकर्ताओं का एक समूह एक शाही चार्टर के तहत संभावित ईस्ट इंडीज उद्यम यानी पूर्वी क्षेत्र के वैभवशाली देश (भारत) के साथ व्यापार पर चर्चा करने के लिए मिला. इस बैठक से कई साल पहले एक वाकया हुआ था.
किसी समय भारत के वैभव ने पूरी दुनिया को किया था आकर्षित
1588 में स्पैनिश आर्मडा की हार के बाद पकड़े गए स्पैनिश और पुर्तगाली जहाजों और कार्गो ने अंग्रेजी यात्रियों को धन की तलाश में दुनिया भर में यात्रा करने में सक्षम बना दिया. लंदन के व्यापारियों ने हिंद महासागर में जाने की अनुमति के लिए महारानी एलिजाबेथ प्रथम सामने एक याचिका दी. इसका उद्देश्य सुदूर-पूर्वी व्यापार पर स्पेनिश और पुर्तगाली एकाधिकार को झटका देना था. महारानी एलिजाबेथ ने उन्हें अनुमति दे दी.
भारत के साथ व्यापार के लालच ने दिया ईस्ट इंडिया कंपनी को जन्म
1591 में जेम्स लैंकेस्टर दो अन्य जहाजों के साथ इंग्लैंड से केप ऑफ गुड होप के आसपास अरब सागर की ओर रवाना हुए, जो भारत तक पहुंचने वाला पहला अंग्रेजी अभियान बन गया. उन्होंने 1594 में इंग्लैंड लौटने से पहले स्पेनिश और पुर्तगाली जहाजों का शिकार किया. इससे पहले 13 अगस्त 1592 को फ्लोर्स की लड़ाई में सर वाल्टर रैले और अर्ल ऑफ कंबरलैंड ने एक बड़े पुर्तगाली जहाज को जब्त किया था. जब उसे डार्टमाउथ में लाया गया तो वह इंग्लैंड में अब तक देखा गया सबसे बड़ा जहाज था.
उस जहाज पर काफी गहने, मोती, सोना, चांदी के सिक्के, रेशमी कपड़े, काली मिर्च, लौंग, दालचीनी, जायफल, सुगंधित मसाले, इत्र और दवाओं से भरे बक्से मौजूद थे. जहाज का रटर (नाविक की पुस्तिका) भी उतनी ही मूल्यवान थी. इसमें चीन, भारत और जापान के व्यापार मार्गों की महत्वपूर्ण जानकारी थी.
तब भारत तक पहुंचना था काफी मुश्किल
यह देख 1596 में तीन और अंग्रेजी जहाज पूर्व की ओर रवाना हुए लेकिन सभी समुद्र में खो गए. एक साल बाद राल्फ फिच का आगमन हुआ. वो एक साहसी व्यापारी था. उसने अपने साथियों के साथ मेसोपोटामिया, फारस की खाड़ी, हिंद महासागर, भारत और दक्षिण पूर्व एशिया की नौ साल की उल्लेखनीय यात्रा की थी. फिच से भारतीय मामलों पर सलाह ली गई और उन्होंने लैंकेस्टर को और भी अधिक मूल्यवान जानकारी दी.
ऐसे ईस्ट इंडिया कंपनी बनाने का आया विचार
इसके बाद फिच और लैंकेस्टर ने मिलकर पूर्वी देश यानी की भारत जाने का मन बनाया. इसके लिए व्यापारियों का एक समूह बनाया गया. समूह में लंदन के तत्कालीन लॉर्ड मेयर स्टीफन सोमे शामिल थे. थॉमस स्मिथे, लंदन के एक शक्तिशाली राजनेता और प्रशासक थे. उन्होंने लेवंत कंपनी की स्थापना की थी. रिचर्ड हाक्लुइट, लेखक और अमेरिका के ब्रिटिश उपनिवेशीकरण के पक्षधर; और कई अन्य समुद्री यात्री जिन्होंने ड्रेक और रैले के साथ सेवा की थी.
इंग्लैंड की महारानी ने ऐसे दी रजामंदी
22 सितंबर 1599 को समूह ने अपना इरादा महारानी को बताया. इसके तहत वो ईस्ट इंडीज यानी पूर्व में स्थित वैभवशाली देश (भारत) की यात्रा पर जाना चाहते थे और वहां से एक बड़ा व्यापार स्थापित करना चाहते थे. इसके बाद ही ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना हुई. एक साल बाद व्यापारियों को शाही बुलावा आया और रानी उनके निर्णय से सहमत हुई और ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना की गई. इस तरह से 1601 में सर जेम्स लैंकेस्टर रेड ड्रैगन पर सवार होकर ईस्ट इंडिया कंपनी की पहली यात्रा की शुरुआत की.
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अन्य महत्वपूर्ण घटनाएं :
22 सितंबर 1539 गुरु नानक देव सिखों के पहले गुरु का निधन करतारपुर में हुआ था.
22 सितंबर 1922 में फिलिस्तीन के जनादेश को राष्ट्रसंघ परिषद ने मंजूरी दी थी.
22 सितंबर 1980 में सॉलिडैरिटी, पोलिश ट्रेड यूनियन और राजनीतिक पार्टी की स्थापना हुई थी. यह पार्टी सोवियत नियंत्रण के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाती थी.
22 सितंबर को विश्व राइनो दिवस मनाया जाता है. इसका मकसद पांच गैंडों की प्रजातियों के बारे में जागरूकता बढ़ाना और उन्हें विलुप्त होने से बचाना है.
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