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30 सितंबर: पहले न्यूक्लियर सबमरीन के बनने की कहानी, समुद्र की गहराइयों पर है जिसका राज 

आज 30 सितंबर है. कैलेंडर के अनुसार वर्ष का 274वां (लीप वर्ष) दिन है. आज का दिन एक ऐसी घटना से जुड़ा हुआ है, जिसके बाद से दुनिया के तमाम देशों सैन्य शक्ति को आंकने का नजरिया बदल गया. क्योंकि इस दिन ही दुनिया का पहला परमाणु पनडुब्बी ( न्यूक्लियर सबमरीन)बनाया गया था. इसके बाद से पूरी दुनिया में न्यूक्लियर सबमरीन विकसित करने की होड़ शुरू हो गई.

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दुनिया का पहला परमाणु पनडुब्बी
दुनिया का पहला परमाणु पनडुब्बी

आज शक्तिशाली और संपन्न देश की नौसेना परमाणु पनडुब्बियों से लैस है. ये आधुनिक न्यूक्लियर सबमरीन किसी भी देश के सैन्य शक्ति को आंकने का एक पैमाना बन गया है. क्या आपको पता है कि पहले परमाणु पनडुब्बी का नाम क्या था? कब दुनिया को पहला न्यूक्लियर सबमरीन मिला? किस देश ने यह कमाल कर दिखाया? इस सभी सवाले को जवाब यहां हैं. आज 30 सितंबर के दिन ही पहली बार समुद्र की गहराईयों में पहला परमाणु पनडुब्बी उतरा था. 

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पहली परमाणु पनडुब्बी का नाम था नॉटिलस. परमाणु पनडुब्बी की तकनीक सबसे पहले अमेरिका ने विकसित की और सबसे पहला न्यूक्लियर सबमरीन बनाया. इसका नाम रखा यूएसएस नॉटिलस. नॉटिलस का निर्माण अमेरिकी नौसेना के कैप्टन हाइमन जी. रिकोवर ने किया था, जो एक शानदार रूसी मूल के इंजीनियर थे.रिकोवर 1946 में अमेरिकी परमाणु कार्यक्रम में शामिल हुए थे. 1947 में उन्हें नौसेना के न्यूक्लियर प्रॉप्लशन कार्यक्रम का प्रभारी बनाया गया और उन्होंने एक परमाणु पनडुब्बी पर काम शुरू कर दिया. 

30 सितंबर 1954 को कमीशन हुआ था पहला न्यूक्लियर सबमरीन
रिकोवर ने तय समय से कई साल पहले दुनिया की पहली न्यूक्लियर सबमरीन विकसित करने में सफलता प्राप्त कर ली. 1952 में नॉटिलस के निर्माण की नींव राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमैन द्वारा रखी गई थी. 21 जनवरी 1954 को पहली महिला मैमी आइजनहावर ने ग्रोटन, कनेक्टिकट में टेम्स नदी में लॉन्च किए जाने पर इसके अग्रभाग पर शैंपेन की एक बोतल तोड़ी थी और 30 सितंबर, 1954 को यूएसएस नॉटिलस को कमीशन किया गया. यह पहली बार 17 जनवरी, 1955 की सुबह परमाणु ऊर्जा के तहत चला.

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डीजल और इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों से कई गुणा ज्यादा ताकतवर था नॉटिलस
न्यूक्लियर सबमरीन नॉटिलस डीजल और इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों से कहीं ज़्यादा बड़ी थी. नॉटिलस की लंबाई 319 फीट थी और यह  3,180 टन का था.  यह लगभग असीमित अवधि तक पानी में डूबी रह सकती थी, क्योंकि इसके परमाणु इंजन को हवा की जरूरत नहीं थी और इसमें बहुत कम मात्रा में परमाणु ईंधन की जरूरत थी. यूरेनियम से चलने वाले परमाणु रिएक्टर से भाप बनती थी जो प्रॉप्लशन टर्बाइनों को चलाती थी. इससे नॉटिलस 20 नॉट से ज़्यादा की रफ्तार से पानी के अंदर चल  सकता था.

वह समुद्र के अंदर 8 लाख किलोमीटर चला यूएसएस नॉटिलस
अपनी सेवा के शुरुआती वर्षों में यूएसएस नॉटिलस ने कई पनडुब्बी यात्राओं के रिकॉर्ड तोड़े और अगस्त 1958 में उत्तरी ध्रुव की  पहली यात्रा पूरी की. 25 साल के करियर और लगभग 500,000 मील यानी की आठ लाख किलोमीटर चलने के बाद, नॉटिलस को 3 मार्च, 1980 को सेवामुक्त कर दिया गया. 1982 में एक राष्ट्रीय ऐतिहासिक स्थल के रूप में दुनिया की पहली परमाणु पनडुब्बी 1986 में कनेक्टिकट के ग्रोटन में पनडुब्बी बल संग्रहालय में ऐतिहासिक जहाज नॉटिलस के रूप में प्रदर्शित हुई.

काफी पुरानी है पनडुब्बियों की अवधारणा
पानी के नीचे चलना और हवा में उड़ना हमेशा से इंसानों के लिए कौतूहल का विषय रहा. इसलिए मनुष्यों ने हवाई जहाज और पनडुब्बियों का आविष्कार किया. खासकर पनडुब्बियों की बात करें तो इसका इतिहास तो काफी पुराना है. इसने कांच और चमड़े एक खाली बैरल से लेकर डीजल और परमाणु ऊर्जा से चलने वाली स्टील की विशालकाय आधुनिक सबमरीन तक का सफर तय किया है. 

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पनडुब्बियों के इतिहास की चर्चा करें तो कहा जाता है कि 332 ईसा पूर्व  सिकंदर महान ने मछली का अध्ययन करने के लिए कांच के बैरल में बैठकर समुद्र के अंदर डुबकी लगाई थी. पहली बार किसी यान में पानी के अंदर जाने की यही शुरुआत थी. वैसे डच वैज्ञानिक ने साल 1602 में दुनिया की पहली पनडुब्बी बनाई थी. इसके बाद साल 1775 में अमेरिकी डेविड बुशनेल ने टर्टल नाम की पहली सैन्य पनडुब्बी बनाई थी. यह हाथ से चलने वाली बलूत के आकार की डिवाइस थी. 

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प्रमुख घटनाएं

30 सितंबर 1687 में औरंगजेब ने हैदराबाद के गोलकुंडा के किले पर कब्जा किया.
30 सितंबर 1947 में पाकिस्तान और यमन संयुक्त राष्ट्रसंघ में शामिल हुए.
30 सितंबर 1984 में उत्तरी एवं दक्षिणी कोरिया के बीच 1945 के बाद पहली बार सीमाएं खोली गईं.
30 सितंबर 1993 में भारत के महाराष्ट्र राज्य के औरंगाबाद में भूकम्प के कारण 10,000 हजार से अधिक लोग मारे गए एवं लाखों बेघर हो गए.
30 सितंबर 2001 में इस्रायल की आतंरिक मंत्रिपरिषद ने फ़िलिस्तीन के साथ हुए समझौते को मंजूरी दी.
30 सितंबर 2001 में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता माधव राव सिंधिया का निधन.

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